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सोमनाथ और उनकी ‘हेडमास्टर’ उपाधि

नयी दिल्ली। लोकसभा अध्यक्ष के रूप में सदन की कार्यवाही सख्ती से चलाने के कारण सोमनाथ चटर्जी को ‘हेडमास्टर’ की उपाधि मिली थी और हंगामा करने वाले सदस्यों को उनकी डांट का अक्सर जिक्र किया जाता है और यह सार्वजनिक चर्चा का मुद्दा भी बना। सदन की बैठक शुरू होने के कुछ मिनट के भीतर कार्यवाही स्थगित होने और कई बार भ्रमणकारी विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के सामने स्थगन ने उन्हें बहुत शर्मिंदा किया।

माकपा की तरफ से दस बार लोकसभा सदस्य रहे चटर्जी 2004 से 2009 तक निचले सदन के स्पीकर रहे। उनका आज सुबह कोलकाता के निजी अस्पताल में निधन हो गया। माकपा नेता ने 2010 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘‘कीपिंग द फेथ: मेम्वायर्स ऑफ ए पार्लियामेंटेरियन’’ में लिखा, ‘‘मेरे द्वारा नियमित समयावधि पर आसन से लगाई गई डांट भावपूर्ण हैं। इनसे मुझे ‘हेडमास्टर’ की उपाधि मिली, जिनसे मुझे तकलीफ नहीं हुई क्योंकि हेडमास्टर का पद सम्मानीय है।’’ उन्होंने अपनी पुस्तक में सदस्यों को डांट लगाने की कई घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि हम ज्यादा से ज्यादा दिखा रहे हैं कि हम लोकतंत्र के लायक नहीं हैं।’’ एक जगह उन्होंने कहा, ‘‘मैं जानता हूं कि आसन का इस सदन में कोई सम्मान नहीं है। हम इसके प्राधिकार को बहुत कम किया है। लोग हमें देख रहे हैं। हम अपने लिए और धन के लिए लड़ रहे हैं। मुझे लगता है कि लोग कहने लगेंगे कि ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’।’’ जब सदस्य लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास आकर वापस जाने से इंकार कर देते तो चटर्जी उन्हें चेताकर कहते, ‘‘क्या आपको खुद पर शर्म नहीं आती? आप क्या कर रहे हैं? क्या यह संसद सदस्यों के व्यवहार का तरीका है? आपको यहां रहने का कोई हक नहीं।’’

उन्होंने यह भी जिक्र किया कि किस तरह विदेशी प्रतिनिधिमंडल भारत के सांसदों के व्यवहार से खुश नहीं था। चटर्जी ने पुस्तक में लिखा कि भारत के दौरे पर आए स्वीडन के स्पीकर ने आशा जताई थी कि उनके सदस्य भारत के सदस्यों से नहीं सीखेंगे। कई बार चटर्जी सांसदों से निपटते वक्त भावुक हो जाते थे। वह उनसे कहा करते थे, ‘‘अब अगर कोई सदस्य अपनी इच्छानुसार काम करना चाहता है तो न तो आसन की जरूरत है, न कामकाज की सूची की और ना ही नियमों की।’’ उनके संभवत: सबसे कठोर शब्द थे, ‘‘मुझे लगता है कि भारत की संसद अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। पूरा देश सांसदों को लेकर शर्मसार है।’’

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