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संयुक्त राष्ट्र में भारतीय महिलाओं को सलाम

संयुक्त राष्ट्र। संयुक्त राष्ट्र की शुरुआत से अब तक इसमें भारत तथा अन्य विकासशील देशों से ताल्लुक रखने वाली अग्रणी महिलाओं द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका की यहां सराहना की गई जिनमें विजय लक्ष्मी पंडित तथा हंसा जीवराज मेहता का नाम भी शामिल है।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने यहां कहा, ‘‘एक कम जाना पहचाना तथ्य यह रहा है कि जब विकसित देश खुद को लैंगिक समानता के नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश करते हैं तो पता चलता है कि ऐसी केवल तीन महिलाएं हैं जिन्होंने महासभा की अध्यक्ष के रूप में सेवा की है। ये सभी तीनों महिलाएं विकासशील देशों से रही हैं।’’ विशेष कार्यक्रम ‘महिला एवं संयुक्त राष्ट्र का आरंभ: एक दक्षिणी विरासत’ में बोलते हुए अकबरुद्दीन ने कहा कि 1953 में महासभा के लिए अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित पहली महिला (विजय लक्ष्मी पंडित) भारत से थीं। उन्होंने कहा कि महासभा की अन्य महिला अध्यक्ष लाइबेरिया से एंजी एलिजाबेथ ब्रुक्स और बहरीन से हया रशीद अल खलीफा रही हैं। ब्रुक्स 1969 में तथा हया 2006 में महासभा की अध्यक्ष निर्वाचित हुई थीं।

अकबरुद्दीन ने कहा कि महासभा की अगली अध्यक्ष भी महिला होगी, यह एक बार फिर विकासशील देशों से होंगी। उन्होंने कहा, ‘‘संयुक्त राष्ट्र के सात दशकों से अधिक के समय में विकसित देशों में से किसी देश ने अध्यक्ष के रूप में अपने यहां की किसी महिला के नाम की सिफारिश नहीं की है।’’ अकबरुद्दीन ने उल्लेख किया कि हालांकि संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में वरिष्ठ पदों पर नियुक्तियों में लैंगिक समानता के लिए महासचिव के प्रयासों का हम स्वागत करते हैं, लेकिन ‘‘यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि वरिष्ठ पदों पर कितनी महिलाएं विकासशील देशों से हैं।’’

संयुक्त राष्ट्र की कैबिनेट सचिव मारिया लुइजा विओत्ति ने भी ब्राजील, डोमिनिक गणराज्य, भारत, मेक्सिको, पाकिस्तान, उरुग्वे और वेनेजुएला जैसे विकासशील देशों से ताल्लुक रखने वाली महिलाओं द्वारा संयुक्त राष्ट्र के शुरुआती वर्षों में निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि हालांकि विश्व निकाय आज समानता के लिए काम करता है, ऐसे में ‘‘हमें अपना इतिहास भी याद रखना चाहिए। विकासशील देशों से ताल्लुक रखने वाली महिलाओं के सम्मान ने न सिर्फ आज उन्हें देय मान्यता प्रदान की है, बल्कि उस अपूर्ण ऐतिहासिक विवरण को दुरुस्त भी किया है जो ब्राजील, डोमिनिक गणराज्य, भारत, मेक्सिको, पाकिस्तान, उरुग्वे और वेनेजुएला जैसे देशों से ताल्लुक रखने वाली महिलाओं की भूमिका को दिखाने में विफल रहा।’’ विओत्ति ने कहा कि महासचिव एंतोनियो गुतारेस और वह संयुक्त राष्ट्र संस्थापन प्राधिकार के विस्तार में विकासशील देशों की महिलाओं की भूमिका को मान्यता देते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हम ब्राजील, डोमिनिक गणराज्य, भारत, मेक्सिको, पाकिस्तान, उरुग्वे और वेनेजुएला से ताल्लुक रखने वाली महिलाओं के उल्लेखनीय प्रयासों के लिए उनके आभारी हैं।’’

अकबरुद्दीन ने कहा कि यह आयोजन संयुक्त राष्ट्र के उल्लेखनीय बहुपक्षीय फोरम के सृजन में विशेषकर विकासशील देशों की महिलाओं के ऐतिहासिक योगदान को याद करता है और उसे मान्यता प्रदान करता है। महिलाएं स्वप्नदृष्टा और प्रेरक नेता थीं। उन्होंने कहा, ‘‘शुरुआती वर्षों में संयुक्त राष्ट्र के कार्य में महती योगदान देने वाली भारत की महिलाएं ऐसी नेता थीं जो पूर्ववर्ती वर्षों में स्वतंत्रता आंदोलन में अत्यंत सक्रिय रही थीं। इसके साथ ही वे राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया में सक्रियता से शामिल थीं।’’

भारत की महिलाओं के योगदान को रेखांकित करते हुए अकबरुद्दीन ने कहा कि मेहता एक सुधारक, शिक्षाविद तथा उत्कृष्ट लेखिका थीं। उन्होंने मानवाधिकार मामलों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र आयोग में सेवा की थी और वह मानवाधिकार वैश्विक घोषणा (यूडीएचआर) में भाषा के लिहाज से अधिक लैंगिक संवेदनशीलता सुनिश्चित कराने के लिए जानी जाती हैं।

इस दौरान एक अन्य महत्वपूर्ण हस्ती लक्ष्मी मेनन का भी जिक्र हुआ जो 1949 से 1950 तक संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारतीय प्रतिनिधि तथा महिलाओं की स्थिति से संबंधित संयुक्त राष्ट्र आयोग की प्रमुख थीं। अकबरुद्दीन ने इस अवसर पर मेनन के कार्यों का जिक्र करते हुए उनकी सराहना की। इस अवसर पर बेगम शरीफाह और हामिद अली के योगदान को भी सराहा गया। अली ने अपना राजनीतिक करियर महात्मा गांधी की अनुयायी के रूप में शुरू किया था और 1935 में वह ऑल इंडिया वुमेन्स कान्फ्रेंस की अध्यक्ष बनीं। वह भारत की आजादी के वर्ष 1947 में महिलाओं की स्थिति से संबंधित संयुक्त राष्ट्र आयोग की सदस्य बनीं।

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