सनातन धर्मावलम्बी कुम्भ अवश्य जाए: अधोक्षजानन्द

मथुरा। गोवर्धन पीठाधीश्वर शंकराचार्य अधोक्षजानन्द देव तीर्थ महराज ने कहा है कि देवऋण, पितृऋण एवं रिषिऋण से मुक्ति पाने एवं जीवन के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए सनातन घर्मावलम्बियों को कुंभ स्नान के लिए अवश्य जाना चाहिए। गोवर्धन पीठाधीश्वर ने कहा कि प्रयागराज में इस बार सरकार ने अक्षयवट के दर्शन करने की व्यवस्था करा दी है। कुम्भ के समय देव दानव यक्ष किन्नर गंधर्व और तमाम विश्व भर के पुण्यात्मा वहां आते हैं और अपना प्रभाव दिखाते है। जिस भूमि में अमृत प्रकट हो रहा हो वहां पर की गयी अराधना, साधना, ध्यान और चिंतन मनुष्य जीवन को समस्त ऋणों से मुक्त कर देता है और जीवन धन्य हो जाता है।

उन्होंने कहा कि प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है। वेणीमाधव वहां के देवता हैं। वहां पर अक्षयवट के दर्शन इस कुंभ में कराने की व्यवस्था प्रधानमंत्री मोदी ने सेना से बातचीत कर कराई है। अक्षय वट के बारे में यह भी कहा जाता है उसके दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। उसके दर्शन से दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति मिल जाती है।

प्राचीन काल में ऋषि मुनि कुटिया बनाकर वहां कल्पवास किया करते थे। भारद्वाज ऋषि उनके भोजन आदि की जिस प्रकार व्यवस्था करते थे। इस बार प्रदेश सरकार ने हजारों करोड़ रूपया खर्च कर वहां पर देश और विदेश से आनेवाले लोगों के लिए बहुत अधिक व्यवस्था की है। आने जाने के लिए रेल, बस और हवाई यात्रा की भी व्यवस्था कराई है। सनातन धर्म संस्कृति के अनुकूल आधुनिक व्यवस्थाएं भी कराई गई हैं।

उन्होंने कहा कि आज विज्ञान ने बहुत विकास किया है और तरह-तरह के अनुसंधान होते जा रहे हैं। विनाशकारी परिणाम भी दिखाई पड़ रहे हैं तथा अशांति फैल रही है। इसके दमन की क्षमता केवल वैदिक संस्कृति में है।

शंकराचार्य ने बताया कि भगवान विष्णु के सलाह से समुद्र मंथन केवल देवताओं ने ही नही किया था। दानवों के साथ सागर मंथन करके अमृत निकाला गया। आज तरह तरह की भेदकारी बातें हो रही हैं। हिंदू, मुसलमान, ईसाई में भेद करके दुनिया को लड़ाया जा रहा है। विष घोला जा रहा है, सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़े जा रहे हैं लेकिन पैाराणिक युग यह बताता है कि यदि धरती में शांति चाहिये, अमृत चाहिए, मिठास चाहिए तो उसको पाने के लिए सबसे पहले हर तरह की प्रवृत्ति के लोगों को एक करना पड़ेगा। एक होकर ही मथन से अमृत निकलता है। भगवान विष्णु के पास देवताओं ने अपना दुःख दूर करने के लिए निवेदन किया था। वे बोले उनका दुख तभी दूर होगा जब सारी दुनिया का दुख दूर होगा इसलिए मित्रता करो जिनको तुम अछूत माने बैठे हो वह भी तुम्हारे भाई हैं और विष्णु जी की सलाह से उन्होंने दैत्यों से मित्रता किया और भगवान के बताए मार्ग के अनुसार समुद्र मंथन किया गया जिसमें मंदराचल को मथानी बनाया गया और शेषनाग को रस्सी बनाया गया। देवता और दैत्यों दोनों ने मिलकर के मंथन किया। दोनों का बराबर का उसमें योगदान था तभी अमृत की प्राप्ति हुई थी। यही सामाजिक एकता अमृत प्राप्ति का आधार है।

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