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भाजपा में मूड व नमो मैजिक

भाजपा चुनाव हारी है लेकिन दुखी नहीं हैं भाजपाई। हां, ढाई लोगों और सत्ता गंवाएं मंत्रियों की बात अलग है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और दोनों के बौद्विक प्रमुख अरूण जेतली निश्चित ही सदमें में होंगे। तीनों को उम्मीद थी कि मध्यप्रदेश में जरूर सरकार बनेगी। इन ढाई लोगों को छोड़े तो कथित तौर पर ग्यारह करोड़ लोगों की भाजपा में वे लोग भी दुखी नहीं हैं जो भाजपा के लिए काम कर रहे थे। जिन्होने भाजपा को वोट दिया था। मुझे इन प्रदेशों के भाजपाई व्हाट्स्अप ग्रुप से जो मैसेज आते हंै उसमें आज एक ने दिलचस्प बात कही कि क्यों नहीं कोई टीवी चैनल या नेता नहीं बोल रहा है कि फारवर्ड जातियों ने नोटा में वोट डालना पसंद किया मगर भाजपा को वोट नहीं डाला तो मोदी-शाह दोषी। एंटी एससी-एसटी एक्ट ने डुबो दिया। मोदी ने डुबो दिया। इस पोस्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में हार-जीत का अंतर आधा प्रतिशत वोटों से हुआ तो उसमें फारवर्ड जाति की बनी नई पार्टी को मिले आधे प्रतिशत और नोटा में डले डेढ़ प्रतिशत वोटो को ले कर कोई क्यों नहीं बात कर रहा है? जाहिर है जिसकी यह पीड़ा है वह आरक्षण मसले पर नरेंद्र मोदी से बुरी तरह खफा है। वह ध्यान दिलाना चाहता है कि मोदी-शाह ने फारवर्ड जातियों के साथ दगाबाजी की तो हारना ही था! सोचे यह दुख है या संतोष? 

अपना मानना है कि भाजपा के जो मुख्यमंत्री व मंत्री हारे है वे भी यह सोचते हुए संतोष में होंगे कि चलों नरेंद्र मोदी और अमित शाह का घमंड टूटेगा (हालांकि यह असंभव है।) हम तो आगे भी जननेता बने रहेगें लेकिन मोदी,शाह, जेतली का चार महीने बाद क्या होगा! 

हां, चुनाव भले हारे हों लेकिन शिवराजसिंह चौहान, रमनसिंह और वसुंधरा राजे का राजनीति से, भाजपा में अवसान नहीं हुआ है। ये बतौर विपक्षी नेता ठसके से रहेंगे और लोकसभा चुनाव में मोदी-शाह को हारता देखेंगे। उसके बाद ये अपना वक्त आया मान भाजपा की अखिल भारतीय राजनीति करेंगे। ये लोगों के बीच खलनायक बनकर नहीं हारे हंै। ये आज भी मोदी-शाह के मैनेज किए हुए मीडिया की इस तरह की हैडिग्स देख-समझ आगबबूला हुए होंगे कि मोदी-शाह एंटी इनकंबेसी को रूकवा नहीं पाएं। ( (PM Narendra Modi, Amit Shah were unable to beat anti-incumbency-TOI)  मतलब शिवराज, वसुंधरा, रमनसिंह के खिलाफ माहौल ने डुबवाया न कि मोदी राज की नोटबंदी, आर्थिक बदहाली, आरक्षण आदि की नीतियों से भाजपा हारी। 

तभी हारे हुए भाजपाई जितने गमगीन है उतने ही मोदी-शाह राज के अहंकार पर जनता की चोट से खुश भी है। आम भाजपाई का जहां सवाल है या दिल्ली और प्रदेशों के मंत्रियों, कार्यकर्ताओं की जहां बात है कोई सदमे में नहीं लगेगा। सेंट्रल हॉल में सांसद चिंता में भले दिखे लेकिन वे भी यह निरपेक्षता लिए हुए हंै कि उनके बस में क्या है! हां, भाजपा के जिन नेताओं को चार महिने बाद चुनाव में जाना है वे पांच राज्यों में हार के बाद जरूर किंकर्त्वयमूढ़ता में फंसे दिख रहे हैं। किसी को समझ नहीं आ रहा है कि मोदी, शाह, योगी तीन महीने बाद क्या जादू करेंगे जो डुबने से बचेंगे।

सवाल है क्या भाजपाईयों के कुल मूड की नरेंद्र मोदी और अमित शाह थांह ले सकने की स्थिति में है? क्या ये हारे हुए प्रदेशों में संगठन, नेताओं, कार्यकर्ताओं में जान फूंकने की स्थिति में है? इससे भी अंहम सवाल यह है कि मोदी-शाह क्या अब पार्टी के फैसले में पहले जितने समर्थ है? नहीं। अब ये हार की बेकग्राउंड में मुंह चुराते हुए पार्टी को हैंडल करेंगे और जैसे तैसे चुनावी तैयारियां होंगी। मतलब 11 दिसंबर से पहले संगठन, पार्टी नेताओं से जैसा जो संवाद, कम्युनिकेशन था वह बदला हुआ होगा। 

इसे समझते हुए क्या नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अरूण जेतली का व्यवहार बदला हुआ हो सकता है? अंहकार और चेहरे की भाव-भंगिमा क्या बदली हुई दिख सकती है?  मुश्किल है। तीनों के जैसे डीएनए है वे भला दबाव में कैसे बदल सकते है!  उलटे यह जिद्द बढ़नी है कि अब तो नरेंद्र मोदी की एकलौती तुरूप है। नरेंद्र मोदी के लिए ही एकतरफा प्रचार, नैरेटिव बने। प्रदेश के मुख्यमंत्रियों, योगी आदित्यनाथ आदि का ज्यादा मतलब नहीं है बल्कि सिर्फ और सिर्फ यह नैरेटिव बने कि प्रधानमंत्री पद के लायक अकेले नरेंद्र मोदी है। कैसे यह हो कि भाजपा-संघ परिवार फिर आस्मा को हर, हर मोदी के नारों से गूंजा दे। छोड़ो योगी को, मंदिर की बात को और सोचो सिर्फ यह कि कैसे घर-घर यह बात पहुंचे की नरेंद्र मोदी वापिस प्रधानमंत्री यदि नहीं बने तो देश बरबाद हो जाएगा। मानों साढ़े चार साल में देश कम बरबाद हुआ हो! और अभी देश की बरबादी बाकि है सो मोदी की और जरूरत है! 

कटाक्ष भरे इस वाक्य को अलग रख कर सोचंे तो तय मानें कि अगले चार महीनों को लबोलुआब केवल और केवल नरेंद्र मोदी पर वापिस फोकस लौटाने का होगा। कैसे भी हो नमों मैजिक, मोदी मैजिक के लिए तालियां बनवाई जाएं। दुखी कार्यकर्ता, मोहभंग हुए हिंदू मतदाता साढ़े चार साल की बरबादी को भूल कर फिर नरेंद्र मोदी की आरती में जुटे!

उस नाते मेरी इस बात पर विचार करें कि संघ परिवार, साधू-संत अगले चार महिनों में राम मंदिर बनवाने जुटेगें या मोदी के मंदिर में रौनक लौटाने की साधना करेंगे? जो होगा वह सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी का मंदिर फिर सजाने के लिए, दुबारा प्रधानमंत्री बनाने के लिए अभियान होगा। बावजूद इसके नरेंद्र मोदी की भाव-भंगिमा बदल नहीं सकती है। वे जैसे ंंंंंंं55 महीने रहे है वैसे ही अगले पांच महीने भी रहेंगे। न सोचंे कि जनता के बदले मूड में उनकी भाव-भंगिमा भी बदलेगी। उनकी मूर्ति मनमोहक बनेगी। 11 दिसंबर की शाम को राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेस से अपनी जो मनमोहक इमेज बनाई उसको काट सकना भी अब मुश्किल होगा। यों भी चुनाव से पहले आखिरी चार महीनों में सत्तावान के बूते कुछ संभव नहीं हुआ करता है। बस, शर्त इतनी है कि विरोधी अपने पांवों पर खुद कुल्हाड़ी न मारे। 

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