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पढ़े-लिखे, प्रबुद्ध क्या लेंगे संकल्प?

मुझे भारत के पढ़े-लिखों, प्रबुद्धों व राजनीतिक चेतना वाले मध्य वर्ग का मामला बहुत गड़बड़ लगता है। इनके चलते यदि लोकतंत्र की सिंचाई हुई है तो इनसे नुकसान भी हुआ है। इस एलीट, अभिजात्य वर्ग का रोल हर नाजुक मोड़ पर दोगला और भटकाने वाला रहा है। जनवरी 1977 में जब इमरजेंसी खत्म हुई थी तब भी इस वर्ग में राय थी कि इंदिरा गांधी तो जीत ही जाएगी। गरीब को चाहिए रोटी, कपड़ा, मकान और इंदिरा गांधी ने जब इसके टोटके किए हैं तो गरीब उन्हें ही वोट देगा। वैसा ही आज भी हो रहा है। ये लोग अनुभव के बावजूद सोचे बैठे हैं कि नरेंद्र मोदी को भला कौन हरा सकता है! काम का इतना प्रोपेगेंडा है तो गरीब नरेंद्र मोदी को ही वापिस प्रधानमंत्री बनाएगा। जनवरी 1977 में कथित ओपिनियन मेकर जमात इस चिंता में भी थी कि इंदिरा गांधी यदि नहीं रहीं तो देश का क्या होगा! 

अपनी थीसिस है कि इस एलिट और मध्य वर्ग ने सन 2000 के बाद हिंदू के बदलते मानस को नहीं बूझा। ये वामंपथी, सेकुलर ब्रिगेड के असर में इस मुगालते को पाले हुए थे कि नरेंद्र मोदी किसी सूरत में दिल्ली के तख्त पर नहीं बैठ सकते हैं। मैं तब भी इस वर्ग को मूर्ख मानता था और आज भी मानता हूं। इसी के प्रतिनिधि वे मीडिया चेहरे हैं, जो टीवी चैनलों पर यह हल्ला बनवाए हुए हैं कि भला नरेंद्र मोदी को कौन हरा सकता है। वे तो जीत ही जाएंगे। 

उस नाते प्रबुद्ध, एलिट, मध्य वर्ग सियासी तौर पर बिना समझ, बिना पैंदे का है। इनके हल्ले, इनकी चिंता से वोट कितने प्रभावित होते हैं, यह 1977 में इंदिरा गांधी की हार से जाहिर हुआ था और 2014 में नरेंद्र मोदी की जीत से भी जाहिर हुआ। इनका हाथ सवा सौ करोड़ लोगों के देश की नब्ज पर धड़कन को पकड़े हुए हो ही नहीं सकता है। मगर हां, इनका हल्ला नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया वाली नेताई जमात, वामपंथी, सेकुलर विपक्षी पार्टियों को जरूर गहरे छूता है। तभी इन्हीं के चलते ताजा विधानसभा चुनावों के बाद दिल्ली में यह माहौल बना कि मानो कांग्रेस में या सचिन पायलट में, ज्योतिरादित्य में दमखम था जो राजस्थान, मध्य प्रदेश में भाजपा हारी। जबकि हकीकत में जनता ने कांग्रेस को जितवाया था। कांग्रेस सचमुच छप्पर फाड़ जीतती यदि कांग्रेसी नेता पट्ठेबाजी नहीं करते और नेता मिल कर इस संकल्प में चुनाव लड़ते कि जैसे भी हो भाजपा को हरवाने के लिए हमें मर मिटना है। जनता छप्पर फाड़ जिताने के लिए तैयार बैठी थी लेकिन कांग्रेसियों ने ही रायता फैलाया। इस बात को प्रबुद्ध, एलिट, मीडिया एंकरों ने पकड़ा नहीं। उलटे यह थीसिस चली कि भाजपा ने बराबरी की टक्कर दी। 

सो, यह कौन बताए कि मोदी सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से से कांग्रेस जीती। इस बात को ऐसे भी समझें कि राजस्थान में जीत के बाद राहुल, सोनिया, प्रियंका ने सचिन पायलट को बुला कर ऐसे अंदाज में उनसे बात की मानो उनकी मेहनत से प्रदेश में कांग्रेस जीती और उनके साथ अन्याय हो रहा है, जो विधायकों ने उनकी बजाय अशोक गहलोत को सीएम बनाने के लिए कहा। उस घटनाक्रम से कांग्रेस की अंदरूनी सेहत में दरारें आईं तो उस चुनौती से भी ध्यान बंटा जो मई 2019 में है! अपना मानना था और है कि इमरजेंसी के बाद 1977 में जो स्थिति थी वहीं आज है। तब भी गरीब, आम जनता में इस बात का मतलब नहीं था कि इंदिरा गांधी को वोट नहीं दिया तो कौन प्रधानमंत्री बनेगा! वैसे ही जैसे हाल में छतीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जनता ने यह नहीं सोचा कि रमन सिंह को वोट नहीं दिया तो कौन मुख्यमंत्री होगा या शिवराज सिंह को हराया तो किस कांग्रेसी मुख्यमंत्री से पाला पड़ेगा? 

मगर दिक्कत प्रबुद्ध, एलिट, सेकुलर मीडिया से बनती गलतफहमियों के चलते है। कथित सेकुलरों, वामपंथी एंकरों, प्रबुद्धों से ही लोगों में यह पट्टी पढ़ाई जा रही है, सवाल हो रहे हैं कि तब तो राहुल गांधी अगले प्रधानमंत्री? कांग्रेस को तब अकेले उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ना चाहिए या यह कि मायावती और अखिलेश यूपी में कांग्रेस को दूर रखेंगे।  

उस नाते 1977 की जनवरी और 2019 की जनवरी का फर्क है कि आज संकट ज्यादा विकट है लेकिन उसे न पढ़े-लिखों, प्रबुद्धों व राजनीतिक चेतना वाले मध्य वर्ग ने बूझा हुआ है और न ममता बनर्जी, राहुल गांधी, मायावती, अखिलेश, अरविंद केजरीवाल आदि ने समझा हुआ है। 1977 में क्योंकि विरोधी नेता जेलों से रिहा हुए थे इसलिए उन्हें मिल कर, एक पार्टी बना कर चुनाव लड़ने की जरूरत की समझ थी जबकि 2019 की जनवरी में मोदी-शाह से बुरी तरह प्रताड़ित, गद्दार, देशविरोधी करार दिए जाने के बावजूद अखिलेश और मायावती इस मुगालते में हैं कि विपक्षी एकता की जरूरत नहीं है। इस बात को नोट करके रखें कि 1977 में यूपी में इंदिरा गांधी इसलिए हारी थीं क्योंकि पूरा विपक्ष एकजुट था और 2019 में नरेंद्र मोदी तभी हारेंगें जब मायावती, अखिलेश, राहुल गांधी, अजित सिंह एकजुट होंगे! 

ऐसी समझ तब बन सकती है जब पढ़े-लिखे, प्रबुद्ध व राजनीतिक चेतना वाला मध्य वर्ग अपनी बुद्धि, विवेक से संकल्प साधे कि लोकतंत्र की चिंता बनवानी है। विपक्ष को आईना दिखा कर एकजुट कराना है। इसमें सिविल सोसायटी याकि गैर-राजनीतिज्ञों का भी रोल होता है। जैसे 1977 में जेपी, गांधीवादियों, समाजसेवियों, सिविल सोसायटी, रिटायर नेताओं ने काम किया था वैसा अगले सौ दिनों में अरूण शौरी, यशवंत सिन्हा, अन्ना हजारे, बुद्धदेब भट्टाचार्य, मेधा पाटकर, योगेंद्र यादव, जगदीश भगवती, रघुराम राजन, रामदेव, फली नरीमन, कमल मुरारका, सोमपाल शास्त्री, हमारे डॉ. वेदप्रताप वैदिक, विनित नारायण, सैम पित्रोदा और किसान-मजदूर संगठनों के कर्ताधर्ताओं (बड़ा सकंट है! सवा सौ करोड़ देश में 25 नामों की लिस्ट भी नहीं बन रही!) को मिल जुल कर वह माहौल बनाना चाहिए, जिसमें विपक्ष समझे कि मई 2019 के चुनाव में भारत राष्ट्र-राज्य और लोकतंत्र का क्या–कुछ दांव पर लगा है और क्यों कर सभी नेताओं को पार्टी हित, निज हित को छोड़ कर, ऊपर उठ कर देश की शिष्ट राजनीतिक संस्कृति को बचाने की चिंता करनी है। जिस सरकार ने विरोधी नेताओं के लिए नैरेटिव पाकिस्तानी एजेंट, गद्दार, देशद्रोहियों, खानदानी चोरों का बनाया हो वह जीतने के बाद उन्हें जेल भेजेगी, खत्म करेगी या नहीं, इस बेसिक बात को मायावती, अखिलेश, राहुल, तेजस्वी, ममता के साथ सिविल सोसायटी न समझे तो यह पढ़े-लिखे, प्रबुद्धजनों का दिवालियापन है या नहीं? 

हिसाब से आज 1977 से अधिक गंभीर दशा है। आज राजनीतिक लीडरशीप, सिविल सोसायटी, गैर-राजनीतिक लीडरशीप ही खत्म हुई दिख रही है। ढाई लोगों और उनके दो-ढाई क्रोनी पूंजीवादी अरबपतियों को छोड़ें तो चौतरफा खालीपन, वैक्यूम और लीडरशीप का टोटा है। इससे भी अधिक त्रासद स्थिति बौद्धिक, प्रबुद्ध और सिविल सोसायटी, मीडिया में व्याप्त खालीपन है। इसके समाज और राजनीति में दस तरह की विकृतियां आई हुई हैं। आश्चर्य नहीं जो पूरा देश जातीय टोलों, जातीय सेनाओं, भीम सेना, पटेल सेना, मराठा सेना, कुर्मी और निषाद या सपाक्स आदि संगठनों में खदबदाहट लिए हुए है तो राष्ट्रीय संपादक, एंकर और सोशल मीडिया की फौज लोगों को यह कहते हुए भटका रहे हैं कि बदहाली, दमन छोड़ो, मंदिर दर्शन करो!  

सचमुच 1977 के मुकाबले आज बौद्धिक तौर पर पूरी तरह जीर्ण-शीर्ण दशा है। जो है उसमें यह समझ नही है कि आज विपक्ष और सिविल सोसायटी को एक-दूसरे की जरूरत है। किसानों के संगठनकर्ताओं को विरोधी नेताओं पर दबाव बनाना चाहिए कि सब एकजुट हों। विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, बार संगठनों के वकीलों को, मजदूर संगठनों, रिटायर अफसरों, दलित संगठनों याकी जातीय संगठनों को भी सभी विपक्ष को, मध्य वर्ग को समझाना चाहिए कि लोकतंत्र और उसके शिष्ट राजनीतिक आचरण, व्यवहार के बिना क्या सवा सौ करोड़ लोगों का देश चल सकता है? जरूरत है एकजुटता की और एकाधिकारी राज संस्कृति को खत्म कराने की!

जो हो, विधानसभा चुनावों में प्रदेश राजधानियों के पढ़े-लिखे, प्रबुद्धजनों, मीडियाजनों, ओपनियन मेकरों में अपने को बुद्धि, विवेक से संकल्प बना नहीं दिखा। मगर जनता की बुद्धि और विवेक ने गुल खिलाया। वैसे ही जैसे 1977 में दिखाया था। सो, एक लेवल पर अपने को लगता है कि जिसे हम गरीब, गूंगे, बहरे समझते हैं वहीं वक्त आने पर सत्ता के अहंकार को ठिकाने लगाते हैं। बावजूद इसके एक गुत्थी है। उस पर कल। (जारी) 

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