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डा. मनमोहन, डा. स्वामी तो नासमझ!

वैसे मैं भी नासमझ हूं। क्योंकि मैं भी नोटबंदी को मूर्खतापूर्ण मान तीसरे दिन से उससे भठ्ठा बैठने की थीसिस देने लगा था। तब मैं सिलसिलेवार बताता था कि दुनिया की प्रतिष्ठित आर्थिक पत्रिकाएं, अर्थशास्त्री, वित्तिय विशेषज्ञ नोटबंदी को फंला-फंला दलीलों से मूर्खतापूर्ण करार दे रहे है। बाद में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डा मनमोहनसिंह ने संसद में कहा कि यह ‘भीमकाय कुप्रबंधन’, संगठित लूट, वैधानिक लूटखसोट है। ऐसे ही डा सुब्रहमण्यम स्वामी ने भी अपने ढंग से तब जताया कि ठीक नहीं हुआ। ठीक विपरीत भारत के हिंदूओं ने, गरीब-गुरबों का उद्घोष था-जय हो!  प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी की वायलिन के तारों से तब जो भी सुर निकाला उससे जनता ऐसी मोहित हुई कि उत्तरप्रदेश में भाजपा को छप्पर फाड़ वोट मिले। हिंदुओं ने माना कि नोटबंदी से मुसलमान निपटा। उसका पैसा पहली बार बैंकों में जमा हुआ। वे भी अब टैक्स दाय़रे में आए। नकली नोट खत्म तो पाकिस्तान की टूटी कमर और आंतकियों की सप्लाई रूकी! 

तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाद में डंके की चोट हार्वड को फेल करार दिया। मूर्खों के हावर्ड पर कटाक्ष करते हुए उन्होने यह भी कहा कि यह अखिलेश यादव क्या गधे-गधे की बात करता है! मैं गधों से भी प्रेरणा लेता हूं! गधा तो बहुत मेहनती होता है। हार्वड से नहीं बल्कि हार्ड वर्क से देश बनता है। मेरा हार्डवर्क सच्चा साबित हो रहा है और हार्वड वाले फेल! 

कितनी भीमकाय बात थी वह! सवा सौ करोड़ लोगों के देश के प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर दुनिया को बताया था कि हावर्ड वाले मूर्ख होते हैं। वह भारत के प्रधानमंत्री का आक्सफोर्ड- हार्वड याकि  अर्थशास्त्र, ज्ञान-विज्ञान- बुद्वी- विश्लेषण और निर्भिकता को ऐसा थप्पड़ था कि महीनों सब सन्न रहे। भारत के प्रधानमंत्री और भारत की हिंदू जनता ने सुर में सुर मिला कर जो सुर निकाले तो उसने दुनिया में सवाल पैदा कर दिया कि यह कैसा देश है। ये कैसे लोग है जिसके खून को काला करार दिया गया और फिर भी सब के मुंह से वाह, वाह निकल रही है!

सोचे, एक तथ्य पर दिन-रात का फर्क बताता यह अंतर!  एक तरफ अर्थशास्त्रियों, जानकारों, दुनिया के टिकाकारों का नासमझी याकि ‘मूर्खता’ में नोटबंदी को काली रात मानना तो दूसरी और भारत के हिंदुओं का उसे नई सुबह का नया उजियारा समझना!

उस काले दिन की वर्षगांठ में अब कोई महीना बाकी है। काला दिन इसलिए कि 8 नवंबर के बाद से ले कर अब तक भारत की जनता, हिंदू हो या मुसलमान सब इस फितूर में, उस काले भंवर में, उस अंधियारे में फंसे हुए हंै जिसमें एक तरफ सरकार और सिस्टम का डंडा है तो दूसरी तरफ बरबाद होती आर्थिकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिद्द पकड़ी हुई है कि वे हार्वड से ऊंचे अर्थशास्त्री हैं! वे और उनका वित्त मंत्री आर्थिकी के महापंडित हंै। वे देश के व्यापारियों, कारोबारियों, उद्दमशीलता को सुधार कर दम लेंगे। वे नकदी का प्रचलन बंद करा देंगे। वे भारत को डिजिटल इंडिया बना देंगे। वे अमीर से, पेट्रोल-डीजल उड़ाने वाले लोगों से टैक्स वसूल कर गरीबों के अच्छे दिन लिवा देंगे। वे जीएसटी की क्लिनिकल ट्रायल में सबकों बंदर-चूहा बना देंगे। वे शैल कंपनियों को, कर्ज खाई कंपनियों को, धंधा करती कंपनियों सबको लाइन हाजिर करा देंगे। 

मतलब 8 नवंबर की नोटबंदी आर्थिकी के काले अध्याय की वह शुरुआत थी जो न जाने साल, दो साल, तीन, चार साल कब तक चले इसका अनुमान लग ही नहीं सकता है। क्योंकि जो होना था वह हो गया। कोई इस बात को माने या न माने अपना तर्क है कि धंधे का, काम का मामला दिमाग याकि मनौविज्ञान के उत्स से जुडा है। वह जब बुझ गया है तो सालों लगेंगे दिमाग की बत्ती के फिर लौ बनने में। एक दिमाग के लिए सबकी बत्ती बुझाना आसान है मगर सबकी बत्ती को फिर जिलाना तो तभी संभव है जब चौतरफा स्वंयस्पूर्त अंतःप्रेरणा में उत्साह बने। 

उस नाते डा सुब्रहमण्यम स्वामी और डा मनमोहनसिंह ने सोमवार को जो कहां उसे महाज्ञानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी माने, समझे या उसे गंभीरता से ले यह संभव नहीं है। इसलिए कि उन्होने यह समझा हुआ है कि वे अकेले है जो सर्वज्ञ है। और उन्हे अपनी सर्वज्ञता में यह बोध है कि उन्होने जो नींव बना दी है, उन्होने जो नया खून डाल दिया है, उसे काला न होने देने के जो सख्त बंदोबस्त कर दिए है तो अपने –आप आर्थिकी दौड़ने लगेगी। प्रधानमंत्री की थीसिस, उनकी जिद्द को उनके सलाहकारों और उनके रथ को चलाने वाले सिस्टम के अफसरों ने समझा दिया है कि इससे बनेगा ‘न्यू इंडिया’! आप अर्थशास्त्रियों के अर्थशास्त्री है! आप चक्रवर्ती राजा है! आप विकासपुरूष है तब डा मनमोहनसिंह या एक्स वाई जेड के कहे को सुनने की भला जरूरत क्या है?  

तभी डा स्वामी ने यह जो फार्मूला दिया है कि बुझे दिल-दिमाग में जोश लाने के लिए इनकम टैक्स खत्म कर दें। छोटे-मझौले कारोबारियों के लिए ब्याज दर घटाएं और फिक्स डिपॉजिट पर ब्याज 9 प्रतिशत रखवा बचत बढ़वाने का प्रबंध करें जैसे सुझाव अनसुने रहने है। ऐसे ही डा मनमोहन सिंह की यह चिंता भी नहीं समझी नहीं जानी है कि छोटे सेक्टर व अनौपचारिक धंधों को नोटबंदी व जीएसटी खा रही है और रोजगार का भारी संकट बनेगा। 

डा सुब्रहमण्यम स्वामी की चेतावनी में ब्रह्ण वाक्य है कि आर्थिकी ‘क्रेस’ होने के कगार पर है। मतलब तहस-नहस। उन्होने यह भी बताया कि पिछले साल मई में ही प्रधानमंत्री को 16 पेज का नोट लिख  कर उन्होने चेता दिया था कि आर्थिकी भंवर में फंस रही है। 

कहने वाले कह सकते है कि डा स्वामी क्योंकि अरूण जेतली को नाकाबिल वित्त मंत्री मानते है इसलिए उनके आर्थिक चिंतन में अरूण जेतली के प्रति भड़ास स्वभाविक है। 

पर अरूण जेतली सरकार का आर्थिक चेहरा तो है। यह वह चेहरा है जिस पर मैंने तीन साल पहले लिख दिया था कि हर सरकार अपने गठन के साथ पतन, बरबादी का चेहरा भी लिए होती है। सो हिंदू राष्ट्रवाद यदि आर्थिकी के ‘क्रेस’ होने से भविष्य में फंसता है तो उसका बीज चेहरा क्या होगा वह इतिहास में अनिवार्यतः दो टूक शब्दों में लिखा होगा।    

जो हो, मैं अमित शाह के हिंदू नुस्खों के कारण वहां तक नहीं पहुंचा हूं कि आर्थिकी ‘क्रेस’ हो जाए तो हिंदू रोएगा! यों क्रेस के बाद कुछ बचता नहीं है। पर अपना मानना है कि आर्थिकी क्रेस हो जाए तब भी हिंदू अपने मुगालते में रहेगा क्योंकि रोहिंग्या, दाऊद  मुसलमान के ऐसे बवाल होते रहेगे कि डायलिसिस वाले हिंदू का यह सोचना जारी रहेगा कि वाह मोदीजी वाह, सुरक्षा तो आपसे  ही है! या यह कि खुद डा स्वामी सुप्रीम कोर्ट से राम मंदिर बनवाने का आदेश ले आए तो सबकुछ फिर रामजी को समर्पित!

क्या नहीं? 

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