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तरस गया यह धनतेरस!

सुबह नजर गई अखबार के कार्टून कोने पर- हैप्पी धन तरस! जीएसटी से महंगाई की खबर पढ़ते हुए दो लोगों का एक-दूसरे से ‘हैप्पी तरस’ कहना! फिर भोपाल के न्यू मार्केट से गुजरते हुए दिखा बिना भीड़ का धनतेरस माहौल! दफ्तर आया तो जिलों से आए लोगों से जाना दिवाली का माहौल, जीएसटी का असर! सबका निचोड़ वह कार्टून कि तरस रहे लोग लक्ष्मी की कृपा के लिए! 

सोचें, कितनी अजब बात है यह! हिसाब से दिवाली 2017 भारत में ऐतिहासिक उपलब्धि के नाते मनती। आजादी के 70 साल में आखिर पहली बार पूरे भारत, पूरी आर्थिकी का पिछले साल शुद्धिकरण हुआ। नरेंद्र मोदी नाम के एक इंसान ने देवी लक्ष्मी का कालापन खत्म कराया। उन्हें गोरा, सफेद बनवा दिया! भारत का पैसा सफेद हुआ। सफेद हो सारा पैसा बैंकों में जमा हुआ। सवा सौ करोड़ लोग ईमानदार हो गए। नई ईमानदार टैक्स व्यवस्था जीएसटी लागू हुई। मतलब 2016 बनाम 2017 की दिवाली का फर्क क्या यह नहीं बनता कि पैसे के मामले में पिछली दिवाली काली थी, बेईमानी भरी थी, सवा सौ करोड़ लोग टैक्स चोर थे और इस 2017 की दिवाली पर सब गंगा में पाप धोए ईमानदार हैं! नरेंद्र मोदी ने वह क्रांति कर दिखाई, जिसे भारत का कोई महापुरूष पहले नहीं कर पाया। उस नाते आज लक्ष्मीजी को खुश होना चाहिए। बाजार में उन्हे इतराते हुए चंचल दिखलाई देना चाहिए। लोग झूमते दिखलाई देने चाहिए। दबा कर पैसा खर्च करते हुए उमंग में सबको नाचना चाहिए था!

मगर उलटा है। ‘धन तरस’ का कटाक्ष है धनतेरस पर! इसलिए कि सनातन भारत या आजाद भारत की सबसे बड़ी मूर्खता का नाम है नोटबंदी! वह भारत के सवा सौ करोड़ लोगों को कलंकित करने वाली थी। धन-धान्य की देवी लक्ष्मी का अपमान था नोटबंदी!  वह लक्ष्मीजी को ठोकर मारना था। वह लक्ष्मीजी की चंचलता मतलब व्यक्ति की आजादी, उसके अधिकार, उसके उद्यम, उसकी ऊर्जा का चीरहरण था! कुल मिलाकर लक्ष्मीजी (इसे भारत की सहज-सरल गृहणियों के रुप में उनके हुए अपमान, उनके छीने गए पैसे, बचत) के अपमान का अंहकार थी नोटबंदी।  

अपना मानना था और है कि नोटबंदी आजाद भारत के, जाग्रत हिंदू इतिहास के हिंदू राजा की नंबर एक मूर्खता का वह प्रतिमान है, जिसका सालों साल परिणाम सवा सौ करोड़ लोगों को भुगतना होगा। जीएसटी से तो लोग दो-तीन साल में अभ्यस्त हो जाएंगे लेकिन नोटबंदी ने धनधान्य, लक्ष्मीजी के विश्वास का जो झटका दिया है उसका असर न केवल साढ़े साती वाला श्राप है, बल्कि हमेशा यह बात जहन में बनी रहेगी कि यह कैसा देश है, जिसमें लोगों की मेहनत का, खुद का अर्जन, स्व सम्मान- मान सबको चौड़े धाड़े नंगा कर उसे लाइन हाजिर भी कराया जा सकता है।  

तभी याद करें, दुनिया की मीडिया ने नोटबंदी की मूर्खता पर कितनी तल्ख बातें लिखी थीं। (जिनका मैं इस कॉलम में लगातार हवाला देता रहा था) लक्ष्मी याकि पैसा खुशी का, संतोष का, सुरक्षा का जरिया होता है। ऐसे पैसे को एक दिन अचानक हरामी घोषित किया जाए, घरेलू महिलाओं के लिए भी उसे लज्जास्पद बना दिया जाए तो उसका श्राप कितना गहरा बनेगा इसे नरेंद्र मोदी ने इसलिए नहीं सोचा क्योंकि उन्होंने अर्थशास्त्र नहीं पढ़ी। उन्होंने पैसा कभी कमाया नहीं। उन्होंने मुफ्त में जीवन जीते हुए पैसे का हमेशा काला रूप देखा। यह कभी नही सोचा कि पैसा काला यदि बना है तो वह सिस्टम के कारण है न कि व्यक्ति की, लक्ष्मी के पुजारी की बदनीयती से। लक्ष्मीपुत्रों का भारत में पैसा काला हुआ है तो वजह वे राक्षस हैं, जिन्होंने लूट का तंत्र बनाया हुआ है। लक्ष्मी के प्रति समर्पण, साधना, कामना में सवा सौ करोड़ लोगों की आरती में कहीं खोट नहीं है खोट है उस आरती पर, उसके प्रसाद नजर लगाए बैठे वे नेता, अफसर, कानून याकि तंत्र- व्यवस्था का वह काला चक्रव्यूह, जिससे धन बिना काला हुए निकल ही नहीं सकता!

इस बात को दिमाग में हमेशा के लिए नोट करके रखें कि भारत में पैसा कभी सफेद नहीं रह सकता। उसे बेइज्जत करके भले दस बार बैंकों में सफेद बनवा जमा करवाया जाए वह अनिवार्यतः वापिस इसलिए काला बनेगा क्योंकि अंग्रेजों का छोड़ा सिस्टम लूटने के लिए है। पैसा खाने के लिए है। लोगों की मेहनत, अर्जन पर डाका डाल उसे काला बनाने के लिए है। यह बेसिक बात है लेकिन इस देश के सत्तावान, रूलिंग क्लास, इस देश का सुधी समाज इसलिए इस बात को मानने, समझने के लिए तैयार नहीं होता है क्योंकि उसकी पांचों उंगलियां इसी के चलते घी में रहती हैं।  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक गलती थी, तुगलकी समझ थी जो उन्होंने लूटने वाले कानून-कायदों को खत्म नहीं कराया, सफेद पैसे को काला बनवाने वाली अफसरी मशीनरी को खत्म नहीं किया और सवा सौ करोड़ लोगों को उलटे दुनिया के आगे चोर करार दिया। यहीं नहीं उलटे ऐसे नए कानून, तंत्र को ऐसे नए डंडे और दे दिए, जिससे पैसा वसूलना, सफेद का काले में कनवर्जन के रास्ते और खुलेंगे।  

तभी जनता आज अपने को ठगी हुई महसूस कर रही है। पैसा कमाने का उसका विश्वास बुरी तरह टूटा है। लक्ष्मीजी बुरी तरह रूष्ट हो गई हैं। 

सोचें कि नोटबंदी के बाद लोगों का कुल व्यवहार क्या हुआ? सब वेट एंड वॉच के मोड में हैं। उद्यम नहीं, बल्कि टाइमपास है। न बैंकों में जमा पैसा निकाल रहे हैं और न उधार ले कर जोखिम उठाने को तैयार हैं। एक तरह से सब कुछ सरकार के भरोसे छोड़ दिया है। यह लॉजिकल भी है। इसलिए कि भारत की माई-बाप सरकार, क्रोनी पूंजीवादी सरकार ही तो आखिर पैसा कमवाने का जरिया है।    

तभी अपना मानना है कि भारत की आर्थिकी वापिस पटरी पर तभी लौटेगी जब मोदी सरकार का सिस्टम, उनके अफसर याकि देश की व्यवस्था फिर से पैसे को काला करने के काम को नए सिरे से गति देंगे। इसमें अब वक्त लगेगा। बुलैट ट्रेन जब बनेगी, उसके ठेके जब बंटेंगे या घर-घर बिजली पहुंचाने के बल्ब बांटने के कंपनी को जब नए ऑर्डर मिलेंगे, अनिल अंबानी को पनडुब्बी, राफेल लड़ाकू विमान बनाने, मेट्रो, स्मार्ट सिटी बनाने के जब ठेके मिलेंगे, नई खानें, लाइसेंस, ठेके एलॉट होने में जब उछाला आएगा तब सफेद-काले का नया सिलसिला शुरू होगा और फिर काला रियल एस्टेट, सोने-चांदी, शेयर बाजार में एडजस्ट हो उछलेगा तब धनतेरस फिर धनतेरस कहलाएगा। 

सो, सरकार को, मोदी सरकार को वापिस पैसा उड़ेल कर उसे काले धन में कनवर्ट कराने का नया सिलसिला शुरू करवाना होगा। नहीं तो फिर जीसीटी के नए कानून या बैंकों में जमा पैसे पर नोटिसों से काले धन का प्रवाह जब बनेगा तब बनेगा। उसमें तो धीरे-धीरे अफसरों, नेताओं के यहां काला धन जमा होगा, बैकों से सफेद निकलवा का उसका काले में चढ़ावा धीरे-धीरे ही चढ़ेगा। वह दो-चार साल दबा भी रहेगा। वह इनवेस्ट हो और बाजार में रौनक ले आए यह वक्त खाऊ प्रोसेस है। 

तभी दिवाली 2017 धन के लिए तरसाने वाली, साढ़े साती के श्राप वाली है तो है। कोई कुछ नहीं कर सकता। बिगाड़ना, बरबाद करना या देवी को रूष्ट करना कुछ ही पलों में हो सकता है मगर बनाना, मनाना, निर्माण में तो सालों लगते हैं। अब यदि यह तथ्य है तो आर्थिकी पर भला क्यों नहीं लागू होगा? 

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  1. Food for thoguht - "उन्होंने पैसा कभी कमाया नहीं। उन्होंने मुफ्त में जीवन जीते हुए पैसे का हमेशा काला रूप देखा। यह कभी नही सोचा कि पैसा काला यदि बना है तो वह सिस्टम के कारण है न कि व्यक्ति की, लक्ष्मी के पुजारी की बदनीयती से। लक्ष्मीपुत्रों का भारत में पैसा काला हुआ है तो वजह वे राक्षस हैं, जिन्होंने लूट का तंत्र बनाया हुआ है। लक्ष्मी के प्रति समर्पण, साधना, कामना में सवा सौ करोड़ लोगों की आरती में कहीं खोट नहीं है खोट है उस आरती पर, उसके प्रसाद नजर लगाए बैठे वे नेता, अफसर, कानून याकि तंत्र- व्यवस्था का वह काला चक्रव्यूह, जिससे धन बिना काला हुए निकल ही नहीं सकता!"

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