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तो इलेक्शन बांड से काले को सफेद!

आशंकाओं में दम आता जा रहा है! इलेक्शन बांड अपने आपमें घोटाला बन रहा है। काले धन को सफेद करने का जहां जरिया बन रहा है वहीं भ्रष्टाचार, चुनावी चंदे पर सत्तारूढ़ पार्टी की मोनोपॉली, पार्टी की तरफ से उम्मीदवार के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव में पैसा लुटाने का औजार भी बनेगा। पार्टियों के चंदे, खर्च में पारदर्शिता लाने की दलील पर मोदी सरकार ने चुनाव सुधार के नाम पर इलेक्टोरल बांड के तरीके को जैसे जो अपनाया उससे चुनावी लड़ाई निश्चित ही पक्षपातपूर्ण, एकतरफा बनने के खतरे हैं। भला जब सत्तारूढ़ पार्टी इलेक्शन बांड का यदि 90-95 प्रतिशत चंदा खाएगी तो उससे चुनाव बराबरी की प्रतिस्पर्धा कैसे बनेगी? इससे भी बड़ा झमेला काले धन के गोरखधंधे में इलेक्शन बांड का औजार बनने का है। 

ध्यान रहे इस समय इलेक्टोरल बांड की सातवीं खेप खरीदने के लिए उपलब्ध है। एक से दस जनवरी के दौरान कॉरपोरेट कंपनियां, अमीर एक हजार रुपए से दस हजार, एक लाख, दस लाख, एक करोड़ रुपए के बांड स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की ब्रांचों से खरीद कर पार्टियों को दान करेंगे। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले की इस बांड बिक्री पर सभी की निगाह है। इसी में जानकारों की तरफ से चर्चा है कि दलाल लोग ऑफर ले कर घूम रहे हैं कि जिन कंपनियों को मुनाफा है या जिन्हें अपनी कंपनियों का एकाउंट ठीक करना है, या जिन्हें नकदी की जरूरत है वे चुनावी बांड खरीदें और पांच–सात प्रतिशत का कमीशन खाएं और पार्टी को दें। मतलब कोई यदि एक करोड़ रुपए का चुनावी बांड बैंक में चेक से भुगतान कर खरीदता है और उस बांड को पार्टी विशेष को दान देता है तो बदले में एक करोड़ सात लाख रुपए कैश, नकदी ले। मतलब पार्टी ने जो काला धन इकठ्ठा किया हुआ है उसे सफेद में बदलने का इलेक्टोरल बांड जरिया बना है। 

सो, पहली बात कंपनियों के लिए मार्च में वित्तीय वर्ष खत्म होने से पहले मुनाफे को खपाने का इलेक्टोरल बांड तरीका बना है इसलिए कि चुनाव के इस चंदे पर टैक्स नहीं है। एकाउंटिग में ये बांड खर्च का रूप हैं। मतलब सौ करोड़ रुपए का किसी कंपनी को फायदा है तो पचास करोड़ रुपए के बांड खरीद कर वह पचास करोड़ रुपए पर टैक्स देनदारी से कंपनी को बचा सकता है। फिर यदि बाजार में पचास करोड़ रुपए के बांड लेकर कोई पार्टी किसी कंपनी को यदि नकद 52-53 करोड़ रुपए नकदी में देने को तैयार है तो मुनाफे को काले धन में कन्वर्ट करने का इससे सुरक्षित तरीका भला दूसरा क्या होगा! 

सो, बहुत संभव है कि पार्टी के दलाल, कंपनियों और उद्योगपतियों में इलेक्टोरल बांड के बहाने दस तरह से भ्रष्टाचार, काला धन जेनरेट की प्रक्रिया में जम कर खेल हो रहा हो। जो पार्टी सत्ता में है वह किसी कंपनी विशेष, उद्योगपति को लाभ पहुंचा कर इलेक्टोरल बांड के बहाने रिश्वत, कमीशन वैधानिक तौर पर ले सकती है तो दबाव बना कर भी ले सकती है। जिन कंपनियों को मुनाफा कम दिखाना है, टैक्स बचाना है उनके लिए भी चुनावी बांड फायदे का तरीका है तो सफेद धन को काला धन बना कर गोलमाल करना है तब भी चुनावी बांड सुरक्षित तरीका है। अब यदि ऐसा सिनेरियो है तो सोचा जाना चाहिए कि इससे अच्छा क्या नकद में 20-20 हजार रुपए की रसीदें लेकर पार्टियों के चंदे लेने का तरीका ज्यादा सही नहीं था? इलेक्टोरल बांड को लेकर अब जिस तरह की हकीकत, तस्वीर उभर रही है उसमें तय मानें कि मई 2019 का चुनाव बहुत धांधलीपूर्ण और एकतरफा खर्च वाला बनेगा। 

भाजपा की चुनावी बांड से पौ बारह हुई है। नवंबर तक बांड की छह खेप में कुल 1,056.73 करोड़ रुपए के बांड बिके। बांड की पहले खेप याकि 2017-18 के आंकड़े का ट्रेंड मौजूदा वर्ष में भी संभव है। उस वर्ष कुल बांड के 94.5 प्रतिशत बांड याकि चंदा भाजपा के खाते में जमा हुआ। यह मामूली बात नहीं है। वैसे भी भाजपा ने बांड के अलावा भी चंदे में रिकार्ड बनाया। किसी पार्टी ने पहले इतना चंदा इकठ्ठा नहीं किया जितना भाजपा ने किया। एक हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर रिकार्ड बनाया। 2017-18 में भाजपा ने बतौर पार्टी कोई 1027 करोड़ रुपए का चंदा इकठ्ठा किया। इसमें से 758 करोड़ रुपए खर्च किए। इसमें से उसने 567 करोड़ रुपए चुनाव/जनरल प्रोपेगेंडा की मद में खर्च हुआ बताया।  

उस नाते भाजपा को बांड के 1056 या इस जनवरी-अप्रैल की बांड बिक्री में भी 95 प्रतिशत राशि प्राप्त हो तो आश्चर्य नहीं होगा। इससे कांग्रेस और अन्य दलों को किन मुश्किलों में चुनाव लड़ना होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। मोदी-शाह ने रणनीति बनाई है कि पार्टी की तरफ से खर्च पर चुनाव आयोग क्योंकि आपत्ति नहीं कर सकता है इसलिए उम्मीदवारों के खर्चें को पार्टी के खर्च के रूप में दिखाने की हर तरह से व्यवस्था होगी। मतलब उम्मीदवार के खर्चे जैसे तंबू, जनसभा आयोजन, विज्ञापन, ट्रांसपोर्ट के खर्चे भाजपा ने अपने खाते से सीधे डायरेक्ट कराए तो उम्मीदवार के लिए जवाबदेही नहीं बनेगी। हर सीट पर पार्टी का केंद्रीकृत खर्चा करोड़ों रुपए का हुआ, बूथ स्तर पर एक-एक वोट खरीदने का नकद प्रबंध हुआ और उम्मीदवार ने निज तौर पर अपनी सीमा का खर्च किया तो इससे अप्रैल 2019 का चुनाव खर्च में क्या रिकार्ड बनाएगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। भाजपा 95 प्रतिशत खर्च करेगी तो विपक्षी पार्टियां पांच-पांच प्रतिशत खर्च के लिए भी रोती मिलेंगी।  

जाहिर है इलेक्टोरल बांड की योजना ने केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी और विपक्ष के बीच पैसे, खर्च का ऐसा असंतुलन बनाया है कि चुनाव व्यवस्था स्थायी तौर पर विकृत बननी है। तभी रिटायर हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत की यह बात गौरतलब है कि चुनावी बांड का पूरा सिस्टम न केवल दलदली है, बल्कि खतरनाक भी। इससे कैंपेन फाइनेंस और लोकतांत्रिक व्यवस्था में हेरफेर का खतरा है। आखिर जो बांड खरीद कर दे रहा है उसे अपनी पहचान बताने से मुक्त रखा गया है तो इससे दस तरह के खतरे हैं। इसलिए जरूरत है कि जो बांड खरीद कर पार्टियों को दे रहा है वह अपना और पार्टी अपने दानदाता का नाम घोषित करे। 

मगर ऐसी सावधानी, ऐसी व्यवस्था बांड योजना में नहीं है। बीस हजार रुपए नकद दे कर उसकी रसीद में नाम-पता डला होना ज्यादा पारदर्शी था। जबकि अब बांड योजना में करोड़ रुपए के बांड किसने खरीदे और फिर उसने किस पार्टी को दिए, इसका रिकार्ड सार्वजनिक तौर पर या चुनाव आयोग को बताने की बाध्यता नहीं है। तभी द वायर में इंटरव्यू देते हुए रिटायर मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि चुनावी बांड की व्यवस्था बनवाने से पहले केंद्र सरकार को चुनाव आयोग से पूछना चाहिए था। मगर उससे राय नहीं ली। हालांकि चुनाव आयोग से इस मामले में पूछे जाने की बाध्यता नहीं है। बावजूद इसके लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक चंदे का जब मसला है तो सभी पक्षों से सलाह होनी थी। 

जो हो, बाजार की मौजूदा चर्चाओं से लगने लगा है कि चुनावी बांड की व्यवस्था को जैसे पर्दानशीं बनाया है उससे दस तरह की गड़बड़ के बीज पड़ रहे हैं। सर्वाधिक हैरानी वाली बात है कि कोई पार्टी अपने काले धन के लिए बांड खरीदवाते हुए काला- सफेद करते कमीशनबाजी ले आई है। निश्चित ही यह मामला भी आगे बड़ा स्कैंडल बनेगा। 

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