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गुजरात में न मंदिर, न बाबरी, न योगी!

और यह पिछले पच्चीस साल की भारत राजनीति का अनहोना तथ्य है। कल बाबरी मसजिद के ध्वंस की 25वीं वर्षगांठ थी। तभी भाजपा के लिए सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेसी नेता व वकील कपिल सिब्बल का स्टेंड लपकने लायक था। उसे पहले अमित शाह ने लपका फिर आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनसभा में यह कहते हुए उभारा कि देखों कांग्रेस अब चुनाव से राम मंदिर को जोड़ रही है। उसके नेता कपिल सिब्बल ने मुसलमानों की तरफ से बोलते हुए मंदिर मसले को लोकसभा चुनाव से जोड़ा। क्या यह सही है? उन्हे देश की चिंता ही नहीं। 

ध्यान रहे कपिल सिब्बल ने मंदिर मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से पैरवी करते हुए कहा था कि लोकसभा चुनाव तक सुनवाई टाली जाए। यह भी ध्यान रहे कि बतौर वकील कपिल सिब्बल की पैरवी से कांग्रेस ने पल्ला झाडा हुआ है तो सुन्नी बोर्ड ने कहा कि हां वे उनकी तरफ से वकील है लेकिन बोर्ड चाहता है कि सुनवाई जल्द से जल्द हो। संयोग की यह घटनाक्रम बाबरी मसजिद के ध्वंस की 25वीं वर्षगांठ के वक्त और गुजरात चुनाव के अधबीच का है। सो चुनाव प्रचार में इसका हल्ला होना भाजपा के लिए इसलिए लाभदायी है क्योंकि गुजरातियों के बीच 25 साल पहले अयोध्या का मसला नंबर एक था। नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों ने विश्व हिंदू परिषद् और संघ प्रचारक के नाते घर-घर यह मुद्दा पहुंचवाया था। तभी गुजरात की हिंदुत्व की प्रयोगशाला में तब्दीली हुई। 

और कोई माने या न माने, अपना मानना है कि उस प्रयोगशाला के नंबर एक हरकारे गुजरात के पटेल थे। पटेलों ने मंदिर और हिंदुत्व का झंडा उठा कांग्रेस की कब्र खोदी थी। वे पटेल आज कांग्रेस के हरकारे हंै जबकि  नरेंद्र मोदी, अमित शाह को याद दिलानी पड़ रही है कि याद करों मंदिर को। अयोध्या में हमें बनाना है भव्य राम मंदिर!

हिसाब से मोदी-शाह के कहे पर पटेलों में, गुजराती हिंदुओं में करंट दौड़ जाना था! लोगों में हिंदू- मुस्लिम होना चाहिए था। 6 दिशंबर, मसजिद ढहने की 25वीं वर्षगांठ, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, कांग्रेसी कपिल सिब्बल का सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से खड़ा होना, अमित शाह व नरेंद्र मोदी के भाषण, अयोध्या में मंदिर का संकल्प लिए योगी आदित्यनाथ का गुजरात घूमना सब रामजी की याद के लिए गुजरात में पर्याप्त होने चाहिए। पर कमाल देखिए कि ध्वजा लिए योगी घूम रहे है और भीड़ गायब है! दस तरह से कोशिशे हुई लेकिन हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मसजिद नहीं हो रहा है। जिन लोगों ने गुजरात में मंदिर की कसम खाई हुई थी वे पटेल झंडाबरदार अब हार्दिक पटेल से कसम खा रहे हंै कि भाजपा को नहीं जीतने देना है। 

यह पच्चीस साल से गुजरात में चली आ रही राजनीति में अनहोनी है जो हिंदुत्व की प्रयोगशाला में मंदिर का मसला क्लिक नहीं हो रहा है। नौजवानों में भाजपा के वीडियों का पहला यह वाक्य अनसुना हो रहा है कि पहले इतने दंगे हुआ करते थे। हिंदुओं के जहन में, दिल-दिमाग में बाकि सब है मगर दंगे, मंदिर, हिंदू-मुस्लिम नहीं है। (मुझे तो नहीं दिख-समझ आ रहा है। हो सकता है मैं गलत हूं। यूपी की तरह चुपचाप वहां अंतरधारा बनी हुई हो सकती है।) प्रत्यक्षतः ऐसा कुछ होने की न चर्चा है, न सुर्खियां है और न भाषण है। उलटे यह चर्चा जरूर है कि गुजरात में हिंदू पताका लिए विश्व हिंदू परिषद् के लोग पहले जैसे काम करते थे वे घर बैठे हुए है। प्रवीण तोगडिया आदि की पूरी फौज मोदी-शाह की जीत कराने के लिए मैदान में डटी है या नहीं, इसकी रिपोर्ट नहीं आ रही है। 

कह सकते है गुजरात विधानसभा का यह चुनाव फिलहाल तो सेकुलर माहौल में लड़ा जाता दिख रहा है। अमित शाह और नरेंद्र मोदी दोनों ने सुप्रीम कोर्ट के बहाने मंदिर मुद्दा उठाया लेकिन उससे न भावना का कहीं ऊबाल है और न प्रचार में उठाव है। योगी आदित्यनाथ को गुजरात में लगातार घूमाया जा रहा है। पर उनको देखने के लिए भीड़ कहीं उमड़ी हो, इसकी अपने को रिपोर्ट नहीं मिली। उलटे सोशल मीडिया में वे वीडियों चले हुए है जिसमें मंच पर योगी बैठे है और नीचे सामने एकदम खाली कुर्सियां रखी है। 

सो गुजरात के इस चुनाव में भगवा, मंदिर और हिंदुत्व की छंटा लगभग नहीं है। मैं फिर इसके लिए जिम्मेवार कारण पटेल समुदार को मानता हूं। पटेलों की नाराजगी जैसी और जो है उसका सीधा खामियाजा भगवा राजनीति को भुगतना पड़ रहा है। एक तरह से लग रहा है कि पटेलों की बेरूखी के बाद हिंदुत्व की नारेबाजी के लिए गुजरात में मानों कोई है ही नहीं!

यह बडी बात है और भाजपा का बड़ा संकट है। लोग एंटी इनकंबेसी की बात करेंगे। विकास गांडो थायों छे का मजाक या दांवा करते मिलेगे। आरक्षण की बात करेंगे। नौजवानों के गुस्से की बात करेंगे। किसानों के गुस्से, महंगाई से तिलमिलाई महिलाओं की बात करेंगे या नरेंद्र मोदी पर भरोसे की बात करेंगे लेकिन कोई यह नहीं पूछेगा, यह बात करता नहीं मिलेगा कि जिस भगवा ने जातियों को जोड़ा था, हिंदूओं में हिंदुत्व का सीमेंट घुला था वह कहां चला गया? नरेंद्र मोदी भी अपने भाषणों में यह क्यों नहीं बोल रहे है कि वे हिंदू राष्ट्रवादी है और यदि गुजरात में लोगों ने उन्हे वोट नहीं दिया तो वह हार हिंदू राष्ट्रवादियों की अखिल भारतीय कमर तोड़ने वाली होगी!

मैं इस बात में गहरे, दूरगामी अर्थ बूझ रहा हूं। मंदिर का मुद्दा काठ की हांडी बने यह समझ आता है लेकिन गुजरात की प्रयोगशाला में हिंदू राष्ट्रवाद की दुर्दशा पर कोई नहीं सोचे, यह अजब माजरा है। 

जरा आप भी सोचिए, ऐसा क्यों है? 

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