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एग्जिट फालतू, निकलेगी आंधी!

हरि शंकर व्यास

फिर भले वह अमित शाह की 150 प्लस की आंधी हो या बिहार, दिल्ली चुनाव जैसी आंधी! बराबर की टक्कर या भाजपा का 110-117 सीटे जीतना अपने अनुमान में इसलिए फिट नहीं बैठता क्योंकि तब चुनाव सन् 2012 का खांचा लिए हुए होता है। वह दो कारणों से मुमकिन नहीं है। इसलिए कि मई 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद साबरमती में पानी बहुत बहा है। मई 2014 में जैसे यूपी में नरेंद्र मोदी की आंधी थी वैसे गुजरात में भी थी। भाजपा को 60 प्रतिशत वोट से 165 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। उसी आधार पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 150 प्लस सीट आने का हुंकारा भरा था। वह मजे से इसलिए रीपिट होना चाहिए क्योंकि यूपी में वैसा हुआ है। यूपी में जैसे हुआ वैसे गुजरात में भी आखिरी सात दिनों में नीच, पाकिस्तान की गुजरात चुनाव में दखल, पूर्व प्रधानमंत्री डा मनमोहनसिंह की पाकिस्तानियों से मुलाकात के नरेंद्र मोदी ने जो भाषण दिए उससे गुजराती मानस कांग्रेस खिलाफ वैसे ही भड़का होगा जैसे यूपी में हिंदू विपक्ष के खिलाफ भड़का था। यूपी के चुनाव में नरेंद्र मोदी के जादू से आंधी आई तो गुजरात में यों भी उनका जादू पुराना है। इसलिए एग्जिट पोल के औसत में यदि 182 सीटों में से भाजपा को 112 सीटे मिल रही हंै तो यह बेतुका है। भाजपा की आंधी 2014 की तरह 150 प्लस वाली होनी चाहिए। 

वैसा नहीं है और भाजपा के 2014 के 60 प्रतिशत वोट घटकर 47 प्रतिशत के आसपास बताए जा रहे हैं तो इसका अर्थ है कि नरेंद्र मोदी का 2014 वाला जादू नहीं है। वैसी उनकी आंधी यदि नहीं है तो बिहार या दिल्ली रीपिट क्यों नहीं हो सकता?  अपना मानना है कि दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी या भाजपा के खिलाफ विरोध मुखर नहीं था। तब लोकल फेक्टर मौन काम कर रहे थे। ठीक विपरीत गुजरात में पिछले तीन महीनों में भाजपा के कोर वोटों में विरोध आक्रामक तौर पर मुखर दिखा। नौजवानों ने, हार्दिक पटेल, अल्पेश, जिग्नेश के मोदी के खिलाफ बोल अकल्पनीय थे। हार्दिक के लिए भीड़ का हुजूम जबरदस्त था। लोग बोलते मिलते थे कि इस दफा भाजपा को फटका देना है। मीडिया को दस तरह से नियंत्रित करने के बावजूद भाजपा के खिलाफ यह आवाज चौतरफा सुनाई दी कि सौराष्ट्र का किसान दुखी है। व्यापारी-व्यवसायी दुखी है तो पटेलों में भाजपा के खिलाफ विद्रोह है। 

सोचें सभी जातियों वाले किसान, नौजवान, व्यापारी और पटेल गुजरात में भाजपा का कोर वोट माने जाते रहे हंै। इनमें पिछले छह महीने से सोशल मीडिया याकि प्रत्यक्ष-परोक्ष तौर पर जैसी जो नाराजगी झलकी क्या वह महज दिखावे के लिए थी? मैं तमाम एग्जिट पोल में सीएसडीएस और एक्सिस को अर्थ बूझने लायक मानता हूं। इन दोनों ने चुनाव पूर्व के सर्वेक्षणों में भाजपा की लोकप्रियता में गिरावट दिखाई। एक हिसाब से इनके चलते ही यह धारणा बनी कि लड़ाई कांटे की है। सीएसडीएस ने चुनाव पूर्व भाजपा बनाम कांग्रेस की कांटे की लड़ाई बताते हुए दोनों को मिल सकने वाले वोट का प्रतिशत 43-43 बताया था। मतलब एकदम बराबर कांटे की लड़ाई। लेकिन एग्जिट पोल में इस सर्वे में भाजपा को सौराष्ट्र- उत्तर गुजरात में 49 प्रतिशत, दक्षिण गुजरात में 52 प्रतिशत,  मध्य गुजरात में 47 प्रतिशत वोट बताए हंै। ठीक विपरीत इन इलाकों में कांग्रेस को क्रमशः 41, 42, 40 और 42 प्रतिशत वोट बताएं हैं। मतलब अन्य के खाते से कुल 9-10 प्रतिशत वोट निर्दलीयों में जाया हो रहे हैं। 

दो सवाल हैं कि चुनाव पूर्व और एग्जिट पोल के छह दिनों में भाजपा बनाम कांग्रेस में 43-43 के बजाय 48 प्रतिशत बनाम 41 प्रतिशत वोट का अंतर कैसे बैठ रहा है?  इसकी एक ही वजह बनती है और वह यह कि अमित शाह और भाजपा का बूथ मेनेजमेंट कमाल का था। कांग्रेस अपनी लड़ाई को बूथ स्तर पर, विरोध के वोट डलवाने के प्रबंधन में फेल हुई। लेकिन अपनी शंका में एक पहलू यह भी है कि गुजरात में जिस तरह भाजपा बनाम कांग्रेस में आर-पार की आमने-सामने की इस दफा लड़ाई हुई है उसके बावजूद क्या निर्दलीय-अन्य के खाते में 9-10 वोट जाया हुए होगें। यह आंकड़ा क्या कुछ ज्यादा नही है? अन्य में 5-7 प्रतिशत वोट मुश्किल से होने चाहिए। 

सो सीएसडीएस के एग्जिट पोल में अन्य का मामला अपने को बढ़ा चढ़ा कर लग रहा है। ये वोट भाजपा में जाए या कांग्रेस में उससे आंधी का आकार बनेगा! एक्सिस सर्वे ने 27 सीटंे ऐसी चिंहित की हैं जिसमें खेल 1-2 प्रतिशत वोट से बदल जाएगा। एग्जिट के अनुमान से उसे 1-2 प्रतिशत और मिले तो कांग्रेस पासा पलटेगी।  

हैरानी का मसला भारी मतदान का भी है। आज के आखिरी मतदान में 69 प्रतिशत वोट पड़े हंै। मतलब इस चुनाव का कुल मतदान 68 प्रतिशत। जैसा मैने पहले लिखा कि मई 2014 की आंधी के वक्त मतदान कुल 60 प्रतिशत हुआ था। 60 प्रतिशत पर तब आंधी थी। अब यदि 8-9 प्रतिशत अधिक मतदान हुआ है तो वह तो स्वभाविक तौर पर कोई आंधी लिए हुए होगा न कि बराबर का मुकाबला। मतलब 112 बनाम 74 सीटों के परिणाम वाली लड़ाई नहीं बनती है!

सो मेरी राय, मेरा अनुमान है कि सांस रोक 18 दिसंबर की सुबह तक इंतजार करें। या तो अमित शाह के 150 प्लस वाली भाजपा की आंधी होगी या कांग्रेस 120- 130 सीट का कमाल दिखाती मिलेगी। जान लंे कांग्रेस का 39-41 प्रतिशत वोट सामान्य पिछले चुनावों का स्थाई आधार है। वह या तो लोकसभा चुनाव की तरह 33 प्रतिशत के आसपास टिका रहेगा और भाजपा की आंधी रहेगी। और यदि दलित, मुसलमान, आदिवासी के पुराने कोर के साथ नए नौजवान, किसान, पटेल, वैश्य की दुखी आत्माएं कांग्रेस के लिए वोट डालने निकली होगी तो सीन एकदम उलटा होगा। 

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