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जीती जिद्द, किलींग इंस्टिंक्ट!

हरि शंकर व्यास
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और तभी नोट कर रखें कि भाजपा की ही कर्नाटक में सरकार बनेगी। येदियुरप्पा मुख्यमंत्री भी बनेंगे और विधानसभा में बहुमत भी प्रमाणित करेंगे! जनता दल एस और देवगौडा की पार्टी को साम, दाम, दंड, भेद से खा लिया जाएगा और  उसके जश्न में देश का मीडिया नगाड़ा बजाएगा कि वाह सरदार, वाह सूबेदार! देखा, अरूणाचल से गोवा, गोवा से कर्नाटक सब तरफ नरेंद्र मोदी और अमित शाह अजेय! निश्चित ही आज मोदी-शाह  जीते है। और हार किसकी? क्या राहुल गांधी की?  क्या कांग्रेस की? नहीं, आज की हार पूरे विपक्ष की है। मगर उस पर विचार करंे उससे पहले जीत का तुर्रा पहने नरेंद्र मोदी-अमित शाह पर पहले ख्याल बनाया जाए। हिसाब से इनकी जीत में नई बात नहीं है। इन्हे जीतना ही था। इसलिए कि जीतता वही है जो कबीलाई जिद्द, किलींग इंस्टिंक्ट लिए हुए होता है। जिद्द मतलब जंग और जंग मतलब साम, दाम दंड भेद उपयोग याकि हर चीज जायज। 

इस मामले में मोदी-शाह अनहोने हंै। इनकी हर जीत के बाद भूख और बढ़ती है। ठीक चार साल पहले हिंदुओं ने दिल से, मन की चाहना में नरेंद्र मोदी को अपूर्व वोटों से जीताया लेकिन उससे मोदी संतुष्ट हो राष्ट्र-राज्य को बनाने में नहीं खोए बल्कि उलटे यह भूख पैदा हुई कि चुनाव कैसा भी हो जीतना लगातार है। नतीजतन हर चुनाव के साथ चुनाव लड़ने या कि जीतने का जुनून ऐसा बढ़ता गया कि वोट जुटाने की असेंबली लाईन, उसका माइक्रों प्रबंधन, प्रचार, खरीदफरोख्त, संसाधन का ऐसा सिस्टम बना डाला गया है  कि चुनाव कहीं आया नहीं कि तीन महीने से माहौल पकाने, चालीस दिन में तमाम तरह के वोट दिलाऊ दागियों का एकत्रीकरण और आखिरी पंद्रह दिन प्रधानमंत्री की कॉरपेट बमबारी और अमित शाह के इंटरव्यू पर जीत रहे, जीत रहे के मीडिया शोर के साथ अंतिम क्षण में गुपचुप बंदोबस्तों में मतपेटियों से फिर जीत का जश्न! 

सोचें, नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने हुए चार साल होने वाले हैं। इन चार सालों में भारत का, सवा सौ करोड़ लोगों का समय किस बात में, किस बहस में सर्वाधिक जाया हुआ?  अपना मानना है चुनाव में! हिसाब से चौथी वर्षगांठ के मौके पर नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है तो लगातार चुनाव जीताना है। वे भाजपा को चुनाव जीताते गए। चुनाव में जीत और  राजकाज में जीत का रिकार्ड देखे तो राजकाज में उसे ढूंढना होगा? न हम चीन से जीते, न हम पाकिस्तान को दुबका पाए न आर्थिकी में जीते है तो न सामाजिक मसलों, आपदाओं-विपदाओं पर जीत रहे है। पर हां, इस पर पूछा जा सकता है कि जब राजकाज मे जीत वाले रिकार्ड नहीं तो चुनाव में जीतना कैसे? 

मेरे पास इसका पुराना जवाब है। असंख्य दफा लिखा है। मैं नरेंद्र मोदी की संगठन कला, उनकी चतुराई को बूझते हुए गुजरात के दंगों के बाद से लगातार लिखता रहा हूं कि कांग्रेस उन्हे नहीं हरा सकती। 2000 के दंगों के बाद से ही वे गुजरात में बहुसंख्यक लोगों य़ाकि हिंदूओं की नब्ज को पकड़ चुनाव जीतने का वह करतब लगातार करते गए हंै जिसका और-छोर कांग्रेसियों को, विपक्ष को कभी समझ नहीं आया। मैं हमेशा अपना यह निचोड़ सबको बताता रहा हूं कि चुनाव लड़ने की कला में नरेंद्र मोदी की (बाद में उनके साथ अमित शाह) की जो सिद्वहस्तता है उसके आगे पुराने तरीकों, पुरानी राजनीति से लड़ सकना संभव नहीं है। 

मैंने अपनी पत्रकारिता के वक्त में भारत के दो नेताओं की अजेय हैसियत बनते देखी। पहले लालू प्रसाद यादव थे और दूसरे नरेंद्र मोदी। याद करें लालू राज के पहले दस साल, बिहार की पिछड़ी आबादी और मुसलमानों पर उन्होने ऐसा जादू बनाया था कि एक वक्त उनके बिहार में कभी हार सकने की कल्पना भी नहीं बनती थी। अपने वोटों को मोहने और उनके बूते जीतने की कबीलाई जिद्द में लालू यादव का जादू-टोना अभूतपूर्व था। यह तो गनीमत हुई जो लालू ने अपने को बिहार में समेटे रखा। यदि वे पूरे देश के पिछ़ड़ों के सामाजिक न्याय के मसीहा बनने की धुन बना, उसकी बिहार के बाहर मार्केटिंग में उतर कर प्रधानमंत्री बनने का सपना बनाते तो कोई तब उनकी दिल्ली यात्रा को रोकने वाला नहीं था। लोग दिवाने हुआ करते थे।

जान लिया जाए कि गुजरात में हिंदूओं की नब्ज का पारखी बन, उस पर चुनाव जीतते जाने की कला में माहिर होने और जीत की स्थाई भूख बना लेने के बाद नरेंद्र मोदी ने सुनियोजित ढंग से दिल्ली का लक्ष्य साधा। दिल्ली मिशन से पहले ही वे साम-दाम-दंड-भेद को चुनावी नुस्खों में कनवर्ट करने, पैसे, भाषण आदि में पारंगतता बना चुके थे। कुछ स्थितियों के चलते तो कुछ मेहनत से।   

सो निचोड़ मोदी-शाह के स्वभाव-सोच में जीत की भूख है। इसके लिए किलींग इंस्टिंक्ट जुनून की हद वाली असाधारणता है। कर्नाटक में क्या नहीं हुआ! दलबदल, व्रिरोधी खेमें में फूट के दांवपेंच, बदनाम-गंदे लोगों को टिकट, झूठ, जांत-पांत, हिंदू-मुस्लिम धुव्रीकरण के साथ वह आक्रामकता भी जिसके आगे बेचारे सिद्वारमैया या राहुल गांधी देख-सुन पहले तो यही सोचे  होंगे कि प्रधानमंत्री ऐसा भी बोल सकते है! फिर इस चुनाव में जिस पैमाने पर सोशल मीडिया, आईटी, नमो एप्प और बेइंतहता पैसा में जो खर्च हुआ उसकी गहराई को समझ सकना आम विरोधी उम्मीदवार के लिए संभव ही नहीं है।  

मैं यह सब पहले भी लिख चुका हूं। गौर करें पांच मई को लिखे- छपे मेरे गपशप कॉलम की इन लाईनो को-

‘भाजपा यदि कर्नाटक में जीती तो.....

अर्थ होगा राहुल गांधी, अशोक गहलोत, दिग्विजयसिंह, अहमद पटेल, मायावती, अखिलेश, ममता, शरद पवार आदि में अभी भी कोई नहीं समझा है कि नरेंद्र मोदी- अमित शाह सामान्य प्रतिद्विंदी नहीं है। ये असामान्य, असाधारण है जिनसे लड़ने के लिए, जिनसे जीतने का पुराना, रूटिन वाला चुनावी, राजनैतिक ढर्रा हार की गांरटी है। विपक्ष के नेता यदि इसी मूर्खतापूर्ण एप्रोच से चिपके रहे तो 2019 में फिर मोदी की आंधी होगी। हां, राहुल गांधी और विपक्ष ने कर्नाटक चुनाव को रूटिन अंदाज में लिया।  सिद्वारमैया अकेले जीता देगें, प्रदेश नेताओं ने अपनी दुकान में जो राय दी उसी विश्वास में पुराने ढर्रे पर विपक्ष चुनाव लड़ रहा है। इसी के चलते कांग्रेस ने सिद्वारमैया के सुपुर्द सबकुछ किए रखा। सिद्वारमैया ने भी यह गलतफहमी पाले रखी कि सामने येदियुरप्पा है। उन्होने मोदी-शाह के जुनून की कल्पना नहीं की। यह पुरानी, रूटिन वाली एप्रोच है। 

सोचंे, देखे, बूझे कि एक विधानसभा चुनाव को मोदी-शाह किस जूनुन से लड रहे है? सिद्वारमैया भी अब जरूर अपने आपको या तो लाचार पा रहे होंगे या मुगालते में होंगे। प्रदेश में हिंदू –मुस्लिम बन रहा है। प्रदेश के मंदिरों में भगवा झंडी को चुनाव आयोग में पहुंचा दिया गया। तटीय याकि कोस्टल पट्टी में हवा बदलने के संकेत है। भाजपा बेइंतहा पैसा खर्च कर रही है। कांग्रेस की सरकार के बावजूद कर्नाटक में कांग्रेस कड़की में है। लाले पड़े हुए हैं।

...मोदी-शाह ने जनता दल एस के साथ मायावती का एलायंस करवा दलित वोटों का हिसाब बिगाड़ा है तो नरेंद्र मोदी दलित और ओबीसी वोटों को ऐसे ललकार रहे हैं मानों उन्हे पटाना चुटकियों का काम हो। 

यह सब विपक्ष, कांग्रेस की दुर्दशा है। प्रमाण है कि सिद्वारमैया हो देवगौडा-कुमारस्वामी हो या मायावती, सब खत्म होने के कगार के बावजूद चुनाव को पुराने ढर्रे में देखते हंै। नोट करके रखे कि कुमारस्वामी हो या मायावती का भाई आनंद कुमार सबके टेटूए फंसे हुए हैं। ... हिसाब से सिद्वारमैया, कुमारस्वामी को प्रदेश स्तर पर और राहुल गांधी- देवगौडा को केंद्र स्तर पर विचार करके कर्नाटक में एलायंस बना चुनाव लड़ना था। कांग्रेस 70 सीटे जनता दल एस को उसके वोटों वाले इलाके में दे देती तो क्या बिगड़ जाता। लेकिन राहुल, सिद्वारमैया, कुमारस्वामी, देवगौडा सबने माना कि कर्नाटक के मैदान में भाजपा भला कहां है?’

सो मोदी-शाह को जीत से ज्यादा विचार का मुद्दा यह बनता है कि विपक्ष में कही है भी इनके आगे चुनाव लड़ने की समझ या उसके लिए जरूरी कीलिंग इंस्टिंक्ट? इस पर कल।

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