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चीन से पट नहीं सकता सौदा!

अपन को समझ नहीं आया कि जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने यह किस आधार पर कहा कि कश्मीर संकट के पीछे चीन का हाथ है! कश्मीर में विदेशी ताकतों से लड़ाई चल रही है, जिसमें चीन ने भी हाथ डाल दिया है। पता नहीं यह जानकारी उन्हे केंद्र सरकार की तरफ से मिली या उन्होने प्रदेश सरकार की जानकारी को दिल्ली आ कर बताया। उन्होने यह बात केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात के बाद मीडिया से कही। इसलिए मामला गंभीर बनता है। यदि यह बात डोकलाम क्षेत्र की सीमा पर भारत-चीन के गतिरोध पर बींजिंग की दी भभकी से जुड़ी हुई है तो खास मतलब नहीं है। भूटान की रक्षा में भारत की भूमिका के मद्देनजर चीन ने कहा है कि तब वह भी पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर की चिंता कर सकता है। हिसाब से हमें चीन की ऐसी बात को तूल नहीं देना चाहिए। इसलिए कि मुख्यमंत्री या सरकार की तरफ से यदि चीन का हाथ बताया जाता है तो घाटी के उग्रवादियों पर उलटा असर हो सकता है। पाकिस्तान के साथ चीन का ऐसा साझा समझ आया, मसला अंतरराष्ट्रीय रंग लेता नजर आया तो पाकिस्तान और आंतकियों दोनों के हौसले बढ़ेगे। ध्यान रहे चीन भी इस्लामी कट्टरपंथ का मारा है।  सो कश्मीर घाटी के आंतकियों के पीछे पाकिस्तान-चीन के साझा की बात का प्रचा दुनिया के गले नहीं उतरना है और उससे उलटे हमारा पंगा बढ़ना है। भारत और उसकी विदेश नीति को पाकिस्तान व चीन को अलग-अलग रख कर फोकस बनाना चाहिए। पाकिस्तान दुनिया में बदनाम है। कल ही खबर थी कि अमेरिका आंतक के खिलाफ उसकी लड़ाई, गंभीरता को समझ कर ही आगे मदद करेगा। माना कि पाकिस्तान और चीन का साझा पुराना है। पाकिस्तान के जरिए भारत को उलझाए रखने की बींजिंग की सामरिक रणनीति, कूटनीति पुरानी है। बावजूद इसके आंतकवाद का मसला, इस्लामी उग्रवाद के मामले में चीन सतर्क और सावधान देश है। वह इस मामले में अपनी बदनामी नहीं चाहेगा। 

तब जम्मू-कश्मीर की आंतकी घटनाओं में चीन की विदेशी ताकत की लड़ाई का डॉयलॉग क्यों? क्या यह मेहबूबा मुफ्ती और कश्मीरी नेताओं की होशियारी तो नहीं कि घाटी के सुन्नी इस्लामी जिहादियों से चीन, विदेशी ताकतों को जोड़ कर शेष भारत में मैसेज देना चाह रहे हो कि मसला इस्लामी आंतक का कम और भारत विरोधी उस विदेशी साजिश का भी है जिसमें चीन ने भारत को धमकाया हुआ है। हिसाब से कश्मीर घाटी की 70 सालों से चली आ रही सत्ताखोर जमात अब इस चिंता में है कि  केंद्र की मोदी सरकार कहीं सख्त फैसला न कर डाले। धारा-370 और प्रदेश के विशेष दर्जे को खत्म नहीं कर दें। रविवार को मेहबूबा मुफ्ती का यह कहना भी बेतुका था कि धारा 370 खत्म नहीं होगी। हमारे जज्बात उससे जुड़े हुए है। क्या केंद्रीय गृह मंत्री ने उनसे ऐसा कहने के लिए कहा? अमरनाथ के यात्रियों पर आंतकी हमले की घटना के बाद राजनाथसिंह ने सभी कश्मीरियों को एक ही नजर से न देखने वाली बात कही थी। इस बात पर बवाल हुआ और हिंदू कट्टरपंथियों ने सोशल मीडिया पर राजनाथसिंह को निशाना बनाया तो सेकुलर जमात, और श्रीनगर  के सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज मुस्लिम सुन्नी लॉबी खुश हुई होगी। सो मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती का दिल्ली आना, राजनाथसिंह से मिलना और फिर चीन के हाथ, धारा 370 की निरंतरता की बात कहना सोचा-समझा दांव भी हो सकता है। 

इसमें चौंकाने वाला मसला मुख्यमंत्री का चीन का हाथ बताना है। इस बयान का बीजिंग में क्या अर्थ निकाला जाएगा, यह अपनी जगह सवाल है। अपने लिए यह समझना ज्यादा जरूरी है कि कश्मीर घाटी के हालातों में पाकिस्तान के अलावा क्या चीन का कोई हाथ सचमुच है?  कहने को कह सकते है कि पाकिस्तान को चीन उकसा रहा है, आंतकियों को ब्लेकलिस्टेड नहीं होने दे रहा है। पंच बनना चाह रहा है पर ऐसे तो कई इस्लामी देश पाकिस्तान के पीछे होंगे? जम्मू-कश्मीर की घटनाओं का दुनिया में अलग अर्थ है तो इस्लामी देशों की बिरादरी में अलग। हालातों के बिगड़ने के साथ अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के ऐसे कई पेंच बनेंगे। 

सो प्रासंगिक सवाल है कि क्या केंद्र की मोदी सरकार, भारत के सामरिक रणनीतिकार चीन को सचमुच कश्मीर के हालातों में खलनायक मान रहे है? य़दि ऐसा है और इसके साथ यदि विदेश सचिव जयशंकर का यह कहना है कि चीन दक्षिणी सीमा क्षेत्र में यथास्थिति को बदलने की फिराक में है तो फिर गतिरोध को झगडे में बदलने से भला कैसे रोका जा सकता है? 

समझे इस बात को। डोकलाम सीमा क्षेत्र पर भारत-चीन के गतिरोध पर सरकार ने विपक्षी नेताओं को जो समझाया, जो ब्रीफ किया उसमें चीन की मंशा का खुलासा हुआ है मगर यह आशावाद भी झलका है कि कूटनीति गतिरोध को खत्म करा देगी। चीन अडा है और भारत भी अडा है। गतिरोध शुरू होने से पहले भारत सेना प्रमुख रावत ने दो टूक शब्दों में अपनी तैयारी, ताकत का अहसास कराने वाला बयान दिया। रक्षा मंत्री अरूण जेतली ने भी कहां कि भारत अब 1962 वाला नहीं है। इस पर चीन ने जवाब दिया कि भारत अपनी हार न भूले और वह भी 1962 जैसा नहीं है। चीनी प्रवक्ता का दो टूक ऐलान है कि भारत के सैनिक पीछे हटे। यदि नहीं हटे तो गतिरोध खत्म नहीं होगा।

सो दोनों तरफ तैयारी है। कैलाश मानसरोवर यात्रा, सैनिकों के आमने-सामने खड़े होने, भूटान-सिक्किम के बहाने भी चेतावनी आदि से भारत में चीन खलनायक के रोल में पैंठ रहा है। सोशल मीडिया में चीनी सामान के बहिष्कार का अभियान है तो अब कश्मीर घाटी के हालातों में कानून-व्यवस्था की स्थिति से ज्यादा विदेशी साजिश में चीन का नाम यह धारणा बनाने के लिए पर्याप्त है कि चीन से नहीं पटने वाला सौदा। लग रहा है कि जैसे पाकिस्तान को न समझा सकने की स्थिति स्थाई बन गई है वैसे चीन के साथ रिश्तों की तासीर में भी पंगा नए पक्के रंग ले रहा है। यदि ऐसा है तो क्या इसके मुकाबले के बंदोबस्त है? 

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