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अकबरी हवश, मी टू व संस्कार, नैतिकता

सोचें, यौन याकि सेक्स को क्यों मानव सभ्यता ने संस्कार, नैतिकता, रस्म-रिश्तों में बांधा?  क्यों नहीं इंसान को जानवर या कुते-कुत्तियों की तरह जब चाहे तब इधर-उधर मुंह मारने की छूट हुई? अपना मानना है यहीं पशु बनाम मानव में फर्क की क्रमिक समाज विकास की दास्तां है। सेक्स यदि जीव रचना का आधार है। अनिवार्यता है। भोग और भूख है तो उस सबको समझते हुए ही आदि मानव ने अपनी समाज, धर्म रचना में यौन को इसलिए बांधा ताकि आचार-विचार-व्यवहार में वह जानवर से अलग बने।

इसका अनंत, सनातन फायदा हुआ और यह मानव विकास से प्रमाणित है। इसमें तरीका समाज-रिश्तों में अनुशासन, धर्म व्यवस्था निर्माण था, जिसमें संस्कार, नैतिकता, मूल्य व सही-गलत की वर्जनाओं, पाबंदियों में इंसान का व्यवहार ढाला गया। संदेह नहीं कि यह भी अपनी जगह तथ्य है कि इस सबके बावजूद भी समाज-धर्म व्यवस्था के भीतर दुराचार होता आया है।

मतलब मी टू आज की बात नहीं है। लेकिन आज यदि आधुनिकता, समझदारी, लैंगिक समानता के एवरेस्ट विचार के मौजूदा मुकाम के बीच यौन शोषण गुजरे वक्त से अधिक भयावह रूप लिए हुए है तो अपना मानना है कि यह आधुनिकता, प्रगतिशीलता की बदौलत है। मध्य काल में अकबर के दरबार में यदि हरम की भूख थी तो आज के भारत के प्रगतिशील-सेकुलर-आधुनिक संपादक अकबर ने भी हरम की हवस में पत्रकार लड़कियों का यौन शोषण किया और लड़कियों ने ऐसा होने दिया तो कारण संस्कारों को खारिज कर हावी प्रगतिशीलता थी। आचार-विचार-नैतिकता का वह पुरातन आग्रह खत्म था, जिसने रिश्तों को मर्यादाओं में बांधा हुआ था।

क्या नहीं?

आप सोच सकते हैं मैं कंजरवेटिव याकि पुरातनपंथी, अनुदारवादी हूं। मैं हूं नहीं। लेकिन वामपंथ जनित प्रगतिशीलता, आधुनिकता की प्रवृतियों का इसलिए विरोधी रहा हूं क्योंकि कार्ल मार्क्स एंड पार्टी ने सहस्त्राब्दियों से चली आ रही धर्म-समाज व्यवस्था को ढहाने का काम किया लेकिन उसके प्रतिस्थापन में वह खालीपन छोड़ा, जैसे मानों इंसान को वैक्युम में जीना है। वामपंथ ने आस्था खत्म की, परिवार- धर्म-समाज की पुरानी रचना ध्वस्त की, स्त्री-पुरूष को एक झटके में बराबर बनाया लेकिन उससे बने खालीपन में या तो जबरदस्ती भरी या स्वेच्छा। मानव को भेड़-बकरी में बदल डाला। सोवियत संघ का 70 साला इतिहास प्रमाण है कि धर्म-समाज-परिवार-संस्कार-नैतिकता सबको अफीम बता प्रगतिशीलता ने जो नई दुनिया बनानी चाही उसने इंसान को न इधर का रहने दिया और न उधर का। तभी सिर्फ हवा तय करती है कि क्या हो!

मैं भटक रहा हूं। अपना मानना था और है कि वामपंथ प्रेरित प्रगतिशीलता ने भारत को कम बरबाद नहीं किया है। बॉलीवुड, मीडिया, राजनीति को उन संस्कारों में ढाला, जिसमें कदाचार, सदाचार हुआ और समाज में उन बातों का वजन बढ़ा जो पश्चिम की हवा से आए हैं या आ रही है। यह भारत के लिए और खास कर सवा सौ करोड़ लोगों के समाज के लिए भयावह तौर पर खतरनाक है। इसी को समझते हुए मैंने पिछले सप्ताह सीरिज में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ लिखा, जिसमें शादी की संस्था के दायरे में पति–पत्नी के लिए परस्त्री, परपुरूष यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया। 

यह सब लैंगिक समानता की जिद्द की आड़ में प्रगतिशीलता के आग्रह हैं। उस ट्रेंड को, उस हवा को अपनाना है कि वक्त नया है तो समाज, धर्म, संस्कार, मूल्य, नैतिकता, आचरण-व्यवहार-रिश्तों की पुनर्व्याख्या हो। शादी न करके लिव इन रिलेशनशिप में कोई स्त्री-पुरूष रहे तो वह भी ठीक और नर-नर या नारी-नारी यौनाचार बनाए, शादी करे तो भी ठीक या शादीशुदा भी परस्त्री-परपुरूष रिश्ते का भोग करे तो शादी नाम की कसम के उल्लंघन का अपराध नहीं।

जाहिर है आज आग्रह यौनाचार और सेक्स को समाज-रिश्ते के कायदे में बांधने का नहीं है। सब कुछ अधिकारों के साथ स्वच्छंद बनाना है। अब ऐसा है तो स्वच्छंदता में यह कैसे तय होगा कि जबरदस्ती से हुआ या स्वेच्छा से? अवैध रिश्ता तलाक का आधार बन सकता है लेकिन यह क्या व्यवस्था कि यदि पूछ कर अवैध रिश्ता हुआ तो वह ठीक। यह सब वह प्रगतिशीलता है, जिसमें मर्यादा वर्जित है। अपना मानना था, है और रहेगा कि धर्म की हजार कमियों, मिथ्या बातों, नुकसानों के बावजूद वह इंसान की भूख, स्वेच्छाचारिता को बांधता है। व्यवहार को मर्यादित, आस्थावान, संस्कारी बनाए रखता है। धर्म की अफीम खत्म हुई तो भारत जैसे देश में, आदि हिंदू के सनातनी समाज, राष्ट्र-राज्य की अकल्पनीय बरबादी होगी। अपना मानना था, है और रहेगा कि 1947 की आजादी के बाद आस्था, संस्कार के आग्रहों की समाप्ति ने ही दस तरह के भ्रष्टाचारों में भारत को बरबाद किया है। आजादी के 70 सालों में लोगों की अथाह भूख बढ़ी और उसी अनुपात में पतन हुआ।

मैं बहुत भटक गया हूं। कुल मिला कर मी टू भूख की बदौलत है। संस्कार, मर्यादा, नैतिकता की जगह स्वेच्छा-उच्छशृंखलता की प्रगतिशीलता है। इसे मैं अपनी पत्रकारिता के चालीस सालों में लगातार महसूस करता रहा हूं। मेरी वामपंथी, सेकुलर, प्रगतिशील पत्रकारों-संपादकों से कभी इसलिए नहीं पटी क्योंकि मदिरा, मांस, महिला याकि भौतिकवादी-चार्वाक परंपरा के इनके आग्रह में मर्यादा को ताक में रख इनका व्यवहार बूझा है। मुझे कभी समझ नहीं आया कि एमजे अकबर, प्रीतिश नंदी, वीर सांघवी आदि की कोलकत्ता पत्रकारिता में जो होता था वह कैसे पत्रकारिता का ग्लैमर है? खुशवंत सिंह अपने कॉलम के बल्ब में दारू और महिला के रसंरग से अपनी जो ख्याति बनाए हुए थे उसकी वाह क्यों कर हैं?

तभी मेरा एक निष्कर्ष है कि मीडिया के खांचे में सोचें तो कंजरवेटिव याकि पुरातनपंथी, दक्षिणपंथी संपादक-पत्रकारों का आचरण, आचार-विचार, आजाद पत्रकारिता के धर्म-कर्म के अनुकरणीय उदाहरण अधिक हैं। सत्ता की दलाली हो या यौन शोषण जैसे मामलों में भारत के दक्षिणपंथी, गांधीवादी, संघी पत्रकार लाख गुना ईमानदार, विचारवान थे और हैं जबकि वामपंथी, प्रगतिशील, सेकुलर संपादकों का भगवान मालिक रहा है।

टेस्ट केस एमजे अकबर हैं। चौदह महिला पत्रकारों ने संपादक एमजे अकबर की हरम वाली भूख के किस्से बताए हैं। सोचें, भारत राष्ट्र-राज्य में 45 सालों में अंग्रेजी मीडिया (ध्यान रहे अंग्रेजी मीडिया में क्या मालिक, क्या संपादक, सबमें प्रगतिशीलता की बीमारी छूत की तरह है) का जो एमजे अकबर एवरेस्ट बना हुआ था उसके यौन शोषण के आज ऐसे किस्से पढ़ने को मिल रहे हैं, जैसे गलीछाप गुंडे की भूखी आंखों के होते हैं।

उस नाते एक हकीकत यह भी बनती है कि आजाद भारत ने एवरेस्ट पर बैठे लोगों को कैसे भूखे पंख लगाए! इसी के चलते अपना मानना है कि मी टू का हल्ला भारत में तमाशा, हिप्पोक्रेसी में बदला मिलेगा। भूख क्योंकि सर्वत्र है तो हल्ला होगा फैसला नहीं। याद है जजों के खिलाफ भी एक बार हल्ला हुआ था। क्या हुआ? सत्तर सालों में समाज को ही जब पैसे, सत्ता, ग्लैमर, सेक्स की अमर्यादित भूख में कनवर्ट कर डाला गया है तो किसे सजा होगी और कौन रूकने वाला है? हर तरह की भूख से जब सभी शोषक-शोषित या अलग-अलग तरह के उत्पीड़न के मारे हैं तो मैं इसे सभ्यता, संस्कृति, धर्म का संकट मानूंगा। मी टू के साथ बलात्कार, घर-परिवारों में

हत्याओं, बुढों के परित्याग आदि की प्रवृतियों को भी जरा ध्यान में रखे। पर इस तरह सोचना प्रगतिशीलता वाली बात नही है। इसलिए यहीं इतिश्री की जाए। इतना भर नोट कर रखें कि सवा सौ करोड़ लोगों के समाज की आगे भयावह बरबादी है। हमने अनजाने में, अनचाही मूर्खताओं में वह खांचा तोड़ डाला है, जिसकी मर्यादाओं में आचारण, व्यवहार और भूख को संभालने की व्यवस्थाएं थी।  

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