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तो राष्ट्र-राज्य को संघ से सैनिक!

क्या‍ हम हिंदुओं ने, आजाद भारत ने इतना पोला राष्ट्र-राज्य बनाया है जो सीमा पर लड़ने के लिए उसे अब प्राईवेट सेना की दरकार हो गई? क्या मतलब है संघ सुप्रीमों मोहन भागवत की इस बात का कि आरएसएस तीन दिन में सेना के लिए जवान तैयार कर देगा? भला ऐसा बोलने की क्यों जरूरत हुई?  और जवाब सोचेंगे तो संघ की मनोदशा, सोच –विचार को झलकाने वाला मिलेगा। मगर मेरा एकलौता कोर निष्कर्ष है कि हम हिंदुओं को राज करना नहीं आता! जिस आरएसएस ने 90 साल हिंदू विचार का अपना ठेका बनाया, हिंदू राजनीति के हरकारे और प्रचारक पैदा किए और जिसके एक प्रचारक नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने का मौका भी मिला वह आज इस मनोदशा में है कि सेना में छह महीने में सैनिक तैयार होते हैं जबकि हम तीन दिन में जवान तैनात कर देंगे। क्यों भाई  कैसे कर देंगे और क्यों करेंगे? 

इसका क्या यह अर्थ नहीं कि सेना और राष्ट्र-राज्य में वह काबलियत नहीं जो अपना काम खुद करें? आपके पास कैसे ऐसे रेडिमेड सैनिक है जो सेना को छह महीने का वक्त लगें लेकिन आप तीन दिन में उन्हे सीमा पर भेज दे? क्या आपने नक्सलियों की तरह या रणबीर सेना की तरह प्राईवेट सेना बना रखी है या फिर कासगंज में तिरंगा ले कर मोटर साईकिल पर निकले चंदन गुप्ता जैसे जवानों की बात है जिन्हे मुस्लिम इलाके में जा कर पाकिस्तान मुर्दाबाद बोलना आता है? 

बहुत अजीब-निराशाजनक स्थिति है।  मौटे तौर पर लगता है मानों हम हिंदुओं की घुट्टी नारे, बड़बोलेपन और जुमले-लफ्फाजी है। मुगालतों में, मूर्खताओं में, भक्ति में ही हमें जी कर मरना है। हिसाब से मोहन भागवत को अफसोस जाहिर करना था कि दुर्भाग्य और हमारी शिक्षा-दिक्षा की कमी के लिए माफी मांगता हूं जो प्रचारक प्रधानमंत्री के होते हुए भी हम अपने आपको सुरक्षित नहीं बना पा रहे है। पाकिस्तान और आंतकी डर नहीं रहे हैं और भारत के सैनिकों, सुरक्षाकर्मियों का खून लगातार बह रहा है। 

ऐसा क्यों हो रहा है, इस पर विचार नहीं? लेकिन यह विचार की हम सैनिक दे देगें!  इसलिए कि तब सोचना पड़ेगा प्रचारक प्रधानमंत्री की असफलताओं पर! सोचना पड़ेगा कि रक्षा नीति, विदेश नीति, अर्थ नीति में यदि नरेंद्र मोदी सिर्फ बातों के बादशाह प्रमाणित है तो क्या संघ को नहीं सोचना चाहिए कि कर्म करने, नतीजे देने के लिए फिर है कौन? 

वे पाकिस्तान और आंतकियों के आगे सेना की मदद के लिए अपने जवान पेश करने को तैयार है लेकिन राजनैतिक असफलताओं के आगे उनमें यह सोचने की हिम्मत नहीं है कि फंला-फंला जगह नए नेताओं, नई लीडरशीप की जरूरत है। मोहन भागवत को कहना यह चाहिए था कि एक प्रचारक फेल है तो संघ के पास असंख्य ऐसे लोग हंै जो सचमुच की समझ लिए, वैचारिक प्रतिबद्ता वाले लीडर हंै।  संघ नए प्रधानमंत्री और नए मुख्यमंत्री दे सकता है। यदि मौजूदा लीडरशीप फेल है या सैकेंड, थर्ड क्लास पास है तो संघ के पास और भी अव्वल प्रचारक, कार्यकर्ता है जो सत्ता और संगठन का कायाकल्प कर दुनिया में प्रमाणित कर सकते हंै कि हिंदुओं को सचमुच राज करना आता है। 

हां, हम और आप या भारत के नागरिकों, हिंदुओं का आज नंबर एक संकट सेना में नौजवानों की कमी का नहीं है बल्कि उस लीडरशीप की कमी का है जो हर मोर्चे पर सिर्फ बात करती है और बेबात कौम को भक्त और गुलाम बना रही है। अपना तर्क है कि आप इमरजेंसी लगा ले, भारत को सौ टका हिंदू तानाशाही- राजशाही बना डाले, सेना को पूरी तरह कश्मीर आपरेशन में झौंके लेकिन यह तो आखिर में गारंटी हो कि अंत में जम्मू-कश्मीर धारा 370 के पृथक खांचे से मुक्त होगा, वहां हर भारतवाशी अमन-चैन से जा कर रह सकेगा। या यह कि ‘जब दुनिया के बेहतरीन चिकित्सक, अभियंता, व्यापारी भारत में ही मिलते है’ तो इन्हे पैदा करने का, उन्हे और अव्वल बनाने का अर्थशास्त्र लिए हुए प्रधानमंत्री हो न कि पकौड़ा अर्थशास्त्र में ढींग हांकते हुए कहे कि पकौड़ा बेचने वाला हमारी उपलब्धि, हमारा रोजगार है! 

हां, मोहन भागवत ने तीन दिन में जवान तैयार कर देने की बात के साथ भारत के गौरव, समाज की एकता जैसी बातें भी कहीं। यह भी कहां कि एक समय भारत विश्व का सबसे उन्नत देश था लेकिन समाज में एकता नहीं रहने के कारण कुछ मुठ्ठी भर आये लोगों ने यहां सैकड़ों वर्ष तक राज किया। तभी संघ का लक्ष्य समाज को संगठित करना है। 

सब बातें ठीक। लेकिन इस सोच की समग्रता में यदि चार साल के मोदी राज को कसे तो इन चार सालों में समाज संगठित हुआ है या उलटे बिखरा हुआ है?  माना मुसलमान आपके सगे नहीं हंै, आपको उनके वोट नहीं चाहिए लेकिन मुस्लिम बस्ती में तिरंगा यात्रा ले जा कर पाकिस्तान मुर्दाबाद और योगी की भगवा भाव-भंगिमा से आने वाले दस-पंद्रह सालों में क्या होगा, इस पर क्या कोई विचार कोई है? या दलित, आदिवासियों की झारखंड, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ जैसे ( जहां इनकी आबादी भारी है) प्रदेशों में ऐसी कोई सत्ता भागीदारी है जो वे अपनापन महसूस करें और समाज पूरी तरह समरस, संगठित बने। आज ही इलाहाबाद में दलित के साथ क्रूरता से हंगामा बरपा हुआ है। हकीकत है कि पिछले चार सालों में मोदी-शाह ने आधे हिंदूओं को जयचंद बना दिया तो सवा टके को बेगाना। यही नहीं संघ का पैसा देते आए बेचारे व्यापारियों को भी रूला दिया है। चार साल के मोदी राज में समाज का भला नहीं हुआ है बल्कि अफसरों का, व्यवस्था-सिस्टम का, हाकिमों की लाठी का वह तंत्र मजबूत हुआ है जिसकी तासीर समाज का खून चूसना है।  हर वर्ग टूटा है या आपस में एक-दूसरे से खींचा है। मोहन भागवत ने अपने भाषण में बेहतरीन चिकित्सक, अभियंता, व्यापारी के जो तीन जुमले बोले क्या वे मोदी राज के पिछले चार साल में अपनी बेहतरीनता को निखार पाए है?

इन छोटी बातों को छोड़ा जाए तब कोर सवाल है कि दुश्मन की कमर तोड़ देने में क्यों नहीं मोदी राज कामयाब हुआ और क्यों यहा तक जा कर सोचना पड़ रहा है कि आरएसएस तीन दिन में सेना के लिए जवान तैयार कर देंगा! इस बात को चुनाव जीतने के लिए मोदी सरकार के जंग में जाने की उधेड़बुन का संकेत माने या युद्वोन्माद के तड़के से राष्ट्रवाद को और भभकाने की तैयारी है। सोचने वाली बात यह भी है कि यदि सेना को जवान तैयार करने में छह महिने लगते है तो संघ का क्या यह बड़बोलापन नहीं कि वह तीन दिन में जवान तैयार कर देगा! 

कुल मिलाकर हिंदूओं को राज करना नहीं आता। दुर्भाग्य कि हिंदू राजनीति के ठेकेदार के पास लेबर है, संगठन पूंजी है, सत्ता में पहुंच है लेकिन वह बुद्वी और वैचारिक खांका नहीं है जिससे डीपीआर याकि विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट और वह रोडमैप बनता है कि फंला लक्ष्य को फंला-फंला तरीके से ऐसे साधा जाएगा। तभी कोई बोलता है हम जवान दे देंगे। कोई कहता है पकौड़े बनवा देगें तो कोई कहता है चुनाव जीत कर कांग्रेस मुक्त भारत हो जाएगा या हिंदू राष्ट्र बनेगा! 

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