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सीएम टके भाव, सर्वेसर्वा अमित शाह

भाजपा के मुख्यमंत्रियों, तमाम बड़े नेताओं को रविवार को अपनी औकात का तब अहसास हुआ जब उन्होने सुना-जाना कि उनके राज्य में फंला-फलां राज्यसभा उम्मीदवार बने हैं। हां, नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने जरूरी नहीं समझा कि इतनी बड़ी संख्या में जब पार्टी के राज्यसभा उम्मीदवार तय होने हंै तो संसदीय बोर्ड की या चुनाव समिति की बैठक बुला कर विचार हो। मतलब संगठन, पार्टी संविधान में जो व्यवस्था है, जो परंपरा है उसमें संकेतात्मक, टोकनिज्म में ही सही एक बैठक बुलाई जाए। फिर भले बैठक से अध्यक्ष उम्मीदवार तय करने के लिए अपने आपको अधिकृत कराएं, खुद ही लिस्ट बनाए। या नेताओं से, मुख्यमंत्रियों से, प्रदेश अध्यक्षों से अनौपचारिक तौर पर ही सही पूछा जाए, फीडबैक ली जाए कि उनके राज्य में कौन-कौन लायक है?  ऐसी किसी व्यवस्था, कायदे की भाजपा अघ्यक्ष अमित शाह ने जरूरत नहीं समझी। उन्होने अकेले राज्यसभा उम्मीदवारों की लिस्ट बनाई और जेपी नड्डा के जरिए प्रदेशों को सूचना भिजवा दी कि फंला उम्मीदवार है, नामांकन कराओ! 

यह अकल्पनीय है। भारत राष्ट्र-राज्य या हिंदू राष्ट्रवादियों का सत्ता व्यवहार आज यह हकीकत लिए हुए है कि सरकार एक अकेले नरेंद्र मोदी की तो भाजपा पूरी अकेले अमित शाह की। तीसरे किसी का कहीं कोई मतलब नहीं! और इससे भी बडी अकल्पनीय बात की भाजपा, संघ परिवार में कोई पूछने की, कहने की यह सामान्य हिम्मत भी लिए हुए नहीं है कि भला यह कैसे?  दो दिन पहले मुझे किसी ने बताया कि अगरतल्ला में भाजपा मुख्यमंत्री की शपथ के कार्यक्रम में मंच पर लालकृष्ण आडवाणी की नरेंद्र मोदी ने अनदेखी की और उस अपमान को निरीह भाव आडवाणी टुकर-टुकर देख रहे थे। इस बारे में सोशल मीडिया पर वह सीन चला हुआ है आप भी देख कर कुछ लिखिए। मतलब मोदी ने लेफ्ट के माणिक सरकार की खैरख्वाह ली लेकिन आडवाणी की नहीं।

पर मेरी दिलचस्पी ही नहीं हुई। यह विचार कौंधा कि मोदी जानते हंै आडवाणी और माणिक का फर्क। माणिक गुलाम-भक्तिवादी हिंदू मनोविज्ञान से बाहर निकले हुए शख्स हैं जबकि आडवाणी उस गुलाम हिंदू डीएनए को लिए हुए है जो सत्ता के बिना वक्त काटने व रेंगने को शापित है। मोदी-शाह गुजरात के वक्त से समझे हुए है कि संघ और भाजपा में रीढ़ की हड्डी है कहां? सब सत्ता के आगे गुलाम रेंगते है।

सो राज्यसभा की लिस्ट गुजरात मॉडल की पुनरावृति है। मोदी-शाह अपनी कमान में जैसे जो तय करते थे वह केंद्र स्तर पर चल रहा है तो यह आश्चर्य की बात नहीं है। सोचना सिर्फ इतना चाहिए कि संघ परिवार के मोहन भागवत, सुरेश जोशी, रामलाल आदि व्यक्ति की नहीं व्यवस्था की दलील, उसके आग्रह की जो लफ्फाजी करते है तो उस पर दिखावे के लिए ही व्यवस्था की कुछ पालना तो हो। लेकिन संघ ने सबकुछ मोदी-अमित शाह की इच्छा के सुपुर्द जैसे किया है वह संघ सेहत की दास्तां भी है। न संघ का दिखावे के नाते कोई रोल है और न भाजपा की व्यवस्थाओं, उसके नेताओं, मुख्यमंत्रियों का कोई मतलब बचा है। इससे पहले तक भाजपा का कोई प्रधानमंत्री, अध्यक्ष रहा हो वह संसदीय बोर्ड, चुनाव समिति की व्यवस्था में काम करता रहा है। राजनाथसिंह और उनके पहले के तमाम अध्यक्ष मुख्यमंत्रियों, प्रदेश नेताओं और केंद्रीय नेताओं से बात करके उम्मीदवार तय करते थे लेकिन यह पहली बार है जब नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने किसी से बात करने की जरूरत नहीं समझी। यही नहीं उम्मीदवार ऐसे लोगों को बनाया, दलबदलूओं को बनाया जिनमें कईयों को ले कर खुद पार्टी नेताओं में एक-दूसरे से सवाल है कि ये है कौन! 

जाहिर है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संगठन में सबकुछ अमित शाह के सुपुर्द कर दिया है। पहले कुछ जानकारों में चर्चा थी कि नरेंद्र मोदी चिंता में है और वे 2018-19 के चुनावों की तैयारियों में सबकुछ अपने स्तर पर तय कर रहे है। राज्यसभा के उम्मीदवारों को ले कर भी वे ही तय करेगें। संगठन में से किसे भेजा जाए किसे नहीं, इसमें भी उनकी राय होगी। जैसे राज्यसभा का टर्म खत्म हो रहे भूपेंद्र यादव को ले कर उनकी राय है। मगर यह चर्चा फालतू साबित हुई। अमित शाह ने मंत्रियों की राज्यसभा की उम्मीदवारी तय करने के साथ अकेले संगठन से भूपेंद्र यादव को बतौर उम्मीदवार घोषित किया। जाहिर है संगठन और उम्मीदवारों का सारा काम दो टूक अंदाज में प्रधानमंत्री ने अमित शाह को आउटसोर्स कर दिया है। 

और अमित शाह को संसदीय बोर्ड याकि राजनाथसिंह, सुषमा स्वराज, अरूण जेतली, नितिन गडकरी या शिवराजसिंह चौहान, वसुंधरा राजे, रमनसिंह से न बात करने की जरूरत है और न बैठक या प्रदेश कमेटियों से फीडबैक की जरूरत है। उन्होने लिस्ट बनाई अपने हिसाब से।

और हिसाब गहरे राजनैतिक अर्थ लिए हुए है। पहला अर्थ तो यही कि पूरी पार्टी अमित शाह अपने हिसाब से बना डालेंगे। 2018-19 के चुनाव निर्णायक होंगे। अमित शाह को विश्वास है कि उनकी कमान में लोकसभा चुनाव जीता जाएगा। इस जीत के साथ तमाम पुराने नेता मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा हो जाएंगे। तभी अपना मानना है कि राज्यसभा की लिस्ट से वसुंधरा राजे, शिवराजसिंह चौहान, रमनसिंह, नितिन गडकरी, राजनाथसिंह, अर्जुन मुंडा आदि सभी को समझ में आना चाहिए कि 2018-19 के चुनाव के बाद सबकी दशा वैसी ही होगी जैसी लालकृष्ण आडवाणी, डा जोशी, कलराज मिश्र आदि की आज है। नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के साथ आडवाणी-जोशी की मार्गदर्शक केटेगरी बना कर उन्हे घर बैठाया तो अमित शाह भाजपा संगठन पर सौ टका नियंत्रण बना स्थापित मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, नेताओं की यह नई केटेगरी बनाई है कि सत्ता में भले बैठे रहे लेकिन न उन्हे आगे चुनाव लड़ाना है और न लंबा चलना है। उस नाते राज्यसभा चुनाव की ताजा उम्मीदवार लिस्ट मार्च 2019 में लोकसभा चुनाव की उम्मीदवार लिस्ट की बानगी है। अब जितने भी विधानसभा-लोकसभा चुनाव होंगे उसमें न केवल पुराने चेहरों, मौजूदा सांसदों-विधायकों के टिकट भारी संख्या में कटेगें बल्कि मुख्यमंत्री और कई कथित आला नेता चुनाव बाद घर भी बैठेंगे। 

सो अमित शाह का अपना रोडमैप, उनका हिसाब बन गया है। और यह भी जान लिया जाए कि हिसाब में अमित शाह कच्चे नहीं है। उनके ताजा उम्मीदवारों में भी लोकसभा-विधानसभा चुनाव की बिसात है। कई नाम उनके मास्टर स्ट्रोक और धांसू है। इस पर कल!

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