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पद्मावत, भाजपा और सुप्रीम कोर्ट

हरि शंकर व्यास
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तो सुप्रीम कोर्ट ने पद्मावत पर भाजपा सरकारों की रोक को खारिज किया। कोई इससे यह माने कि भाजपा की इससे किरकिरी हुई तो वह फालतू है। इसलिए कि पद्मावत का पूरा किस्सा कुल मिला कर चित भी मेरी पट्ट भी मेरी और बने रहेंगे हिंदू हमारे भक्त। भाजपा को फिर कहने का मौका है कि हमने राजपूत समाज, कर्णी सेना और आम हिंदू की भावनाओं का ख्याल किया लेकिन क्या करें सुप्रीम कोर्ट ऐसा ही है। आगे यदि फिल्म रीलीज होने के साथ कहीं हिंसा हुई तो यह कहने का मौका भी होगा हमने तो सही किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म थौंपी। हकीकत में फिल्म को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं बल्कि केंद्र की मोदी सरकार के सेंसर बोर्ड ने मंजूरी दी है और उसका हवाला सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में दिया है। इसलिए पूरी माया राजनैतिक है। अन्यथा कोई तुक थी कि केंद्र सरकार, उसका सेंसर बोर्ड  'पद्मावत' फिल्म को हरी झंडी दिखाए लेकिन भाजपा की प्रदेश सरकारें उस पर पाबंदी लगाए। संयोग दिलचस्प है कि आज सुबह श्रीश्री रविशंकर ने फिल्म देख कहा फिल्म गजब है। देखने वालों को गौरवांवित कराती है और इसका अभिनंदन किया जाना चाहिए।

सो पहले केंद्रीय सेंसर बोर्ड की मंजूरी, सुबह श्रीश्री रविशंकर की वाह और दोपहर को सुप्रीम कोर्ट में ठप्पा भाजपा के लिए सौ टका फायदेमंद है। इससे हित यह सधता है कि वह हिंदू मानस ऊबला रहेगा जिसका खौला रहना यह हवा बनाता है कि हमारे रक्षक जितना बस में है वह कर रहे है मगर अभी वह एकछत्रता कहा बनी है जिससे अपनी भावनाओं की सौ फिसद रक्षा हो।   

संदेह नहीं कि फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली ने वह सब किया जिससे विरोधियों का विरोध खत्म कराया जा सकें। 'पद्मावती' का नाम 'पद्मावत' किया। सेंसर बोर्ड के कहे अनुसार पांच संशोधन भी किए। फिल्म को जिसने देखा उन सबने कहां कि इसमें ऐसा कुछ नहीं है जिससे चितोड़गढ की रानी पदमिनी और अलाऊद्दीन खिलजी के इतिहास की घटनाओं और लोकमान्यता के प्रतिकुल कुछ झलके। अपन ने फिल्म नहीं देखी है लेकिन मैंने करणी सेना के जयपुर में भंसाली के साथ दुर्रव्यवहार के बाद विवाद पर स्टेंड लिया था कि यदि सपने में भी अलाउद्दीन और पदमिनी में रोमांस जैसे फिल्मांकन का खांका स्क्रीप्ट में है तब भी बहुत गड़बड़ है। वह बरदास्त लायक नहीं। 

फिल्म बनी और फिर डा वैदिक आदि ने उसे देख कर जो लिखा और बताया उससे धारणा वहीं बनी जो आज श्रीश्री रविंशंकर ने बनवाई है। फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो चित्तोड़, रानी पदमिनी और राजपूत गौरव याकि हिंदूओं की लोकमान्यता से उलटा हो। 

मैं इससे भी अहम निर्णायक बात यह मानता हूं कि इस तथ्य की कैसे अनदेखी हो कि विवाद, हल्ले के बाद उस केंद्रीय सेंसर बोर्ड ने फिल्म को झंडी दिखाई है, उस बोर्ड अध्यक्ष ने फैसला लिया है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सूचना-प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी की आंख का तारा है। यदि उस शख्स ने पद्मावत को दिखाए जाने का सर्टिफिकेट दिया है तो भला हरियाणा सरकार ने क्यों प्रतिबंध लगाया? 

और हरियाणा अकेला राज्य नहीं। गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश ने भी लगाया तो उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र में भी प्रतिबंध लगने का खटका था। और सभी सरकारें भाजपा की है!

इससे बूझ सकते है लोगों को ऊबाले रखने के सियासी अंदाज को। केंद्र और राज्य स्तर पर अलग-अलग एप्रोच प्रमाण है कि जो कुछ है वह हिंदू वोटों के राजनैतिक ऊबाल को ध्यान में रख कर है। जो भी मुद्दा हिंदू को सोचने की और प्रवृत करें या हिंदू बनाम मुस्लिम के द्वंद में दिमाग को फडफडाएं उसको धीरे-धीरे पकाते हुए वोटों का भरोसा बनवाए रखना आज की राजनीति का सबसे महीन मगर मारक और गहरा नुस्खा है। गुजरात चुनाव थे तो पदमावत के विवाद को केंद्र के स्तर पर भी उबलने दिया। निश्चित ही उससे गुजरात के राजपूतों, हिंदूओं में असर हुआ होगा। यह सोचना बेमतलब है कि असर छटांग-दो छटांग हुआ या किलो! आखिर  राजनीति में एक-एक छटाएं से ही मानस बनता व बिगड़ता है। 

सो गुजरात चुनाव तक पद्मावत का झगड़ा खूब उबाल में रहा और चुनाव खत्म हुए तो निर्माता-निर्देशक के फिल्म में संशोधन भी हो गए। फिर सेसर बोर्ड की अनुमति भी मिल गई। लेकिन फिल्म ने क्योंकि पदमिनी बनाम अलाउद्दीन खिलजी के चित्र को आम हिंदू मानस में गहरे उतारा है इसलिए उससे फायदा मंजूरी में है तो पाबंदी से भी है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश से भी।  

ऐसी गौठियां, ऐसा खेल हिंदू को उसके हिंदू मनोभाव में मगन बनाए रखता है। जैसे याद करें कि पिछले चार सालों में गौहत्या का मुद्दा है भी और नहीं भी। पर चुपचाप वह ऐसा सुलगा हुआ है कि इस मकर संक्राति पर मैंने गौरक्षा, गौसेवा के नांम पर शहर में चंदा इकठ्ठा कर लोगों को संक्रांति मनाते देखा। ध्यान रहे घोर प्रतिबद्वता और बातों के बावजूद केंद्र सरकार, मोदी सरकार ने पाबंदी का अखिल भारतीय कानून अभी तक नहीं बनाया है। बीफ का निर्यात जस का तस है तो कई प्रदेशों में खासकर उत्तर-पूर्व राज्यों, दक्षिण के राज्यों में इस मामले में वहीं स्थिति है जो मोदी सरकार के आने से पहले थी। भाजपा और संघ परिवार के संगठनों ने गौहत्या पाबंदी के अपने प्रण को मोदी सरकार बनने के बाद खूब उकेरा लेकिन नतीजा इतना भर कि अलग-अलग भाजपा राज्यों में अलग-अलग तरह का हल्ला और अलग-अलग कानून। मगर केंद्र की मोदी सरकार के स्तर पर कुछ भी नहीं।

जाहिर है कारण कई है लेकिन प्राइमरी स्वार्थ यह है कि मसले को खींचते हुए उसे लगातार पकाएं रखा जाएं। केंद्र के स्तर पर गौहत्या पाबंदी का अखिल भारतीय कानून यदि बनता तो मामला हमेशा के लिए खत्म हो जाता। लेकिन गाय को गौवंश और फिर गौवंश की आवाजाही, फिर बीफ, पिंक क्रांति का ऐसा कदम-दर-कदम झमेला बना दिया है कि वह न कभी खत्म होना है और न उससे ये सनसनी खत्म होनी है कि देखों फंला जगह क्या हुआ?  शौर नेगेटिव हो या पोजिटव वह आमने-सामने की मनोदशा से वोट की राजनीति में हमेशा उपयोगिता लिए होता है। 

सो पद्मावत के घूमर में राजनीति आगे अभी और घूमे तो आश्चर्य नहीं होगा। 

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