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धुल, धुआं, स्मॉग और मूर्खताएं!

दिल्ली भारत नहीं है लेकिन दुनिया की निगाह में दिल्ली का धुंआ भारत है! तभी एक धंधा और चौपट! मामूली बात नहीं जो अमेरिका की युनाईटेड एयरलाइंस ने दिल्ली-निवार्क उड़ान धुए के चलते रद्द की। यही नहीं कई देशों ने नागरिकों को भारत न जाने की सलाह भी जारी की है। ध्यान रहे विदेशी पर्यटको के भारत घूमने का सीजन सर्दियों के महीने हैं। अक्टूबर से मार्च के महीने विदेशी पर्यटकों की बुकिंग से भारत में कमाई का सीजन होता है। वह चौपट हो रहा है। 30 प्रतिशत बुकिंग रद्द हुई बताते हैं। यह हर साल का मसला हो गया है। इसलिए कि पिछले दो-चार सालों से दिल्ली में प्रदूषण, स्मॉग के हल्ले ने दुनिया मे इमेज बना दी है कि भारत सांस लेने लायक नहीं है। सोचे, कितनी बड़ी बात। मगर दुनिया में बनी इमेज की न हमें सुध है और न कोई सोचने को तैयार है। मीडिया के हम लोगों की मूर्खता है कि दिल्ली नाम के महानगर का हल्ला, नैरेटिव हम अखिल भारतीय बनवाते हैं। दिल्ली केंद्रीत शोर दुनिया में भम्र, झूठ बनवाता है तो हम भी दिल्ली की केजरीवाल सरकार के करने-धरने में देश की समस्या जोड़े रहते हंै। मसले के अखिल भारतीय पैमाने पर समग्रता से विचार नहीं करते। पूरे देश में सोचा जा रहा होगा कि दिल्ली में केजरीवाल सरकार या एनजीटी के सम-विषम जैसे उपायों में प्रदूषण का (पूरे देश के) निदान है।

क्या मसला सिर्फ दिल्ली का है?  कतई नहीं तब अरविंद केजरीवाल के साथ केंद्र की मोदी सरकार या यूपी की योगी सरकार या बिहार की नीतिश सरकार को समान रूप से समस्या पर विचार के लिए क्यों नहीं सक्रिय हुआ दिखना चाहिए?  यदि दिल्ली की तरह पंजाब से ले कर बिहार तक का पूरा उत्तर भारत और उसके बनारस, लखनऊ, पटना, आगरा, कानपुर जैसे शहरों के लोग भी दिल्ली की तरह धुएं, स्म़ॉग में सांस लेते घुट रहे हंै तो क्या इसे राष्ट्रीय आपदा नहीं माना जाना चाहिए?  

हां, यह मॉनिटरिंग के आंकडों से प्रमाणित हकीकत है कि दिल्ली जितनी प्रदूषित है उतने ही गंगा-यमुना पट्टी के शहर भी है। लखनऊ, आगरा, पटना, कानपुर भी दिल्ली जितने धुएं में डुबे हुए हंै। मैं पिछले सप्ताह बनारस गया वहां भी घुटनभरी धुंध दिल्ली जैसी महसूस हुई। एक आंकड़े के अनुसार धुए से दिल्ली मे जीवन यदि 6 साल घट रहा है तो आगरा में पांच साल, लखनऊ-बरेली जैसे शहरों में साढ़े चार साल की घटत है। मुंबई, कोलकत्ता का भी राष्ट्रीय स्तर से ऊपर प्रदूषण लेवल है तो बंगलूरू व चेन्नई में कम होते हुए भी लोगों की सांस के लिए खतरा बाकायदा है।

यदि ऐसा है तो केंद्र और प्रदेशों की बाकि सरकारे क्या कर रही हैं? क्योंकर हम सिर्फ दिल्ली और केजरीवाल सरकार पर फोकस किए हुए हैं? 

दुनिया ने पूरे भारत को धुल,धूएं में डुबा माना है तभी विदेशी पर्यटकों की बुकिंग रद्द हो रही हंै। सरकारंे भारत न जाने की अपने नागरिकों को सलाह दे रही हंै।  दिल्ली का हल्ला असली भारत का न होते हुए भी वैश्विक पैमाने पर भारत का प्रतिनिधी है तो मसला केंद्र सरकार का भी बनना चाहिए। भारत सरकार में पूरे देश के पर्यावरण को ले कर बाकायदा एक मंत्रालय है। उसे भी पता होगा कि सर्दियों के साथ चौतरफा धूल, धुएं, स्मॉग की समस्या बनती है। प्रदूषण लेवल बढ़ता है। ऐसे में प्रशासन क्या करें, लोग क्या करें और विदेशी पर्यटकों को समझाने के क्या प्रबंध हो, यह सब क्या अग्रिम में नहीं विचारा हुआ होना चाहिए था? 

पर जैसे केजरीवाल सरकार का, दिल्ली के लोगों का या भारत के हम नागरिकों का दिमाग धूल और धुएं से कुंद है वैसे केंद्र सरकार के सत्तावानों का भी है! चार-पांच साल से दिल्ली के हवाले सभी का धुएं, धूल, स्मॉग का अनुभव लगातार है। नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री सत्ता संभाली तब उस दिवाली एक विदेशी पत्रकार ने गैस चैंबर के अनुभव में अपने बेटे के बीमार पड़ने और भारत को रहने लायक न मानते हुए भारत छोड़ने का लेख न्यूर्याक टाइम्स में लिखा था। उस पर हम सब, मोदी भक्त यह कहते हुए पिल पड़े थे कि भारत में अच्छे दिन आ गए हैं और यह विदेशी भारत को रहने लायक नहीं बता रहा है। 

वह विदेशी पत्रकार सही था और यह साल दर साल हो रहे अनुभव से प्रमाणित है। बुनियादी बात है कि हमने और हमारी सरकार ने सोचा क्या है? प्रदूषण की चिंता, प्रदूषण हो जाने पर उस पर रोना धोना अपनी जगह है लेकिन यदि दुनिया के सर्वाधिक 20 प्रदूषित शहरों में से भारत के 12-13 शहर होने लगे है तो यह धीरे-धीरे बढ़ रही संख्या है। चीन के शहर, मेक्सिको जैसे देशों के महानगरों में भी प्रदूषण का झंझट है लेकिन भारत और बाकि देशों का अपने को फर्क यह दिख रहा है कि भारत तो अब पूरा ही धुल-धूए में सांस लेता दिख रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो करोड़ सिलेंडर बांटने के हवाले देश भर में महिलाओं को धुएं से मुक्त कराने की पोस्टरबाजी की हुई है लेकिन यदि गंगा-यमुना के दौआब के तमाम छोटे-बड़े शहरों में भी धुल-धुए से जीने की उम्र के घटने के आंकडे बन रहे हंै तो किस काम की उज्जवला और स्वच्छता!   

अपना मानना है समस्या की जड़ कार्बन ईंधन याकि कोयला और डीजल- पेट्रोल का उपयोग है। केंद्र और राज्य सरकारों के बूते वाहनों का उपयोग घटा सकना नहीं है। इसलिए कि सरकार में समझ- क्षमता आ ही नहीं सकती है जो वह शहरों में सार्वजनिक परिवहन को ऐसा सुलभ बना दे कि लोग मोटरसाईकिल, टेंपों, कारों का उपयोग छोड़ दंे। दिल्ली जैसे महानगर में भी जब यह विजन नहीं आया कि मेट्रो के साथ बिजली से चलने वाली ट्रॉम का नई-पुरानी दिल्ली में नेटवर्क बना खास सड़कों से निजी वाहन पर पूरी पाबंदी की दूरदृष्टि में काम हो तो राजधानियों या छोटे शहरों का तो भगवान मालिक है। नोट करके रखें इस बात को कि चीन, मेक्सिको, ब्राजील जैसे समवर्ती देश अपने महानगरों से दस-बीस सालों में प्रदूषण घटा लेगें लेकिन भारत में ऐसा नहीं होना है क्योंकि सवा सौ करोड़ लोगों का मोटरसाइकिल उठा कर दौड़ाना आने वाले दशकों में बेइंतहा बढ़ना है। 

बहरहाल, जो है उसमें केंद्र, प्रदेश सरकारों को बेसिक काम यह करना चाहिए कि डीजल और कोयले के उपयोग को जैसे भी हो न्यूनतम बनवाएं। पेट्रोल पर टैक्स घटाएं और डीजल पर टैक्स बढ़ा उसके उपयोग से लोगों को रोका जाए। ऐसे ही कोयले के नए तापघर बने ही नहीं और जो है उन्हे दस-बीस साल में खत्म किया जाए। हो सकता है अपन गलत हो लेकिन अपना मानना है कि कार्बन का उपयोग घटेगा तो किसानों के पुआल जलाने का असर अपने आप बेअसर वैसे ही होगा जैसे पहले था। किसान को आप रोक नहीं सकते है जब तक उसे कोई नई सुलभ तकनीक नहीं मिले।  असली विलेन कार्बन का धुआं है और यह ईंधन की अपनी गलत नीतियों के चलते है और इसी पर फोकस होना चाहिए।  

सो मामला अकेले दिल्ली का नहीं है। किसानों के पुआल जलाने से नहीं है। जो है वह उस धुए, धुंध और धूल से है जिसमें अपनी व्यवस्था, तंत्र, और नेतृत्व सभी की समझ कुंद है। कितनी बेहूदी बात है कि राष्ट्रीय समस्या और पूरे सवा सौ करोड़ लोगों के जीने को घटाने वाली हकीकत में हम लकीर यह पीट रहे हंै कि दिल्ली सरकार सम या विषम योजना अपनाती है या नहीं और एनजीटी क्या गजब फटकार लगा रही है! ऐसी बातों से कुछ नहीं होना है। ले दे कर हम प्रकृति भरोसे हंै। मतलब बारिश हुई तभी राहत है। सो हम आप सब प्रकृति, भगवान भरोसे उस हवा को ले कर भी है जिसे हम खुद बिगाड़ते हैं और फिर मूर्खता में इधर-उधर लठ्ठ मारते रहते हैं। 

क्या नहीं? 

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