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लक्ष्मीजी कब तक रूठी रहेंगी?

क्या‍ नवंबर 2018 में दिवाली ठीक होगी? बहुत मुश्किल है! यों मैं न नरेंद्र मोदी की तरह हार्वर्ड-ऑक्सफोर्ड से भी ऊंचा सर्वज्ञ अर्थशास्त्री हूं और न ज्योतिषी। बावजूद इसके 40 साल से राजनीति और आर्थिकी के रिश्तों में बनते-बिगड़ते मूड से समझ आ रहा है कि पैसा कमाने के उत्साह को जो दीमक लगा है वह बढ़ेगा न कि घटेगा। मैं 2018 को ज्यादा ही खराब मानता हूं क्योंकि जीएसटी की असली मार तो अगले साल पड़ेगी। दो तरह से। एक तो मार्च 2018 में वित्तीय वर्ष खत्म होगा तब हकीकत में टैक्स कर्मचारियों की व्यापारियों पर मार शुरू होगी। हिसाब से तब सीबीडीटी, टैक्स विभाग के लोगों का हस्तक्षेप चालू होगा। तब छोटे धंधे वाला हो या बड़ा उसके रिटर्न का हिसाब जंचना शुरू होगा। तब जीएसटी के बने कानून-नियमों, जुर्माने-दंड के प्रावधान अमल में आएंगे। तब रिटर्न में खामियां निकलेंगी। तब देरी में हर दिन के जुर्माने से ले कर विभागीय कार्रवाई का सिलसिला शुरू होगा। व्यापारी और सीए का तब पसीना निकलेगा। 

दूसरी बात यह कि 2018 से ही जीएसटी के असली मारक प्रावधान शुरू होने हैं। अभी कई फैसले टले हुए हैं। जैसे सामान लाने-ले जाने का ई-वे बिल सिस्टम जनवरी 2018 से शुरू हो कर अप्रैल 2018 तक पूरे देश में लागू होना चाहिए। यह ट्रांसपोर्टर-व्यापारी सबको छह महीने बुरी तरह उलझाएगा। एक करोड़ सालाना टर्नआवर वालों की सप्लाई पर बड़ी कंपनियों का टैक्स काटना, रिवर्स चार्ज मेकानिज्म अभी मुल्तवी है। जब यह अमल में आएगा, इसकी पेचीदगियों का सामना होगा तो नए झंझट बनेंगे। सबसे बड़ा झंझट मुनाफारोधी याकि एंटी प्रोफिटिएरिंग प्रावधान का है। 

ध्यान रहे कारोबारी ने जिस भी कीमत पर चीज बेची उसके औचित्य को लेकर कारोबारी से विभाग को सवाल करने का अधिकार है। सो, अप्रैल 2018 के बाद दस तरह से उलझाए जीएसटी कानूनों में रिटर्न की पड़ताल होगी। तब उद्योग-व्यापारियों की सेंटीमेंट्स का क्या बनेगा, वह देखने वाली बात होगी।  

अपनी थीसिस है कि लक्ष्मीजी रूठती हैं तो भावना, मूड, सेंटीमेंट्स को संभालने की लाख कोशिश की जाए तब भी कुछ नहीं सधा करता। जीडीपी के आंकड़ों को कितना ही फर्जी बना लें! राजनीतिक जरूरत में बार-बार फौरी घोषणाओं, रियायतों-राहत की बातों से दिवाली जल्दी आ जाने की बड़बोली बातें हों, इनसे भावना, सेंटीमेंट्स सही नहीं बनने हैं। उलटे लक्ष्मीजी के साथ, मतलब धन-धान्य की असलियत से यह छलावा है, जिसके उलटे असर होंगे। 

जैसे जीएसटी कौंसिल की बैठक में 27 चीजों से टैक्स घटा कर हवा बनाई गई कि दिवाली जल्दी आ गई। लेकिन भले छपा ज्यादा न हो पर अपने को यह खबर दिखी कि सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएसन के अध्यक्ष मनोज अग्रवाल ने कहा कि कपड़ा उद्योग को दी कथित राहत से हम खुश नहीं हैं। हमने जीएसटी कौंसिल के सदस्यों और सूरत आए प्रतिनिधिमंडल के सामने भी जो मांगें रखी थीं उनमें से एक पर भी विचार नहीं हुआ! यह बात अपने को चौंकाने वाली लगी। इसलिए कि कपड़ा उद्योग और निर्यातकों के ही मामले में कौंसिल की बैठक में संवेदनशीलता से विचार हुआ और फौरी राहत निकली दिखी। जीएसटी में निर्यातकों को लेना सरकार का मूर्खतापूर्ण फैसला था। इससे निर्यात के पीक सीजन में निर्यातकों का पैसा जीएसटी रिटर्न के साथ सरकार में उलझ गया। उसका फटाफट निपटारा सरकार का समझदार फैसला था। ऐसे ही धागे पर टैक्स 18 से 12 फीसदी घटाने और जरी आईटम पर 12 की बजाय पांच प्रतिशत टैक्स से कपड़े की सामान्य और कंपोजिट यूनिट में पैदा असमानता दूर हो जानी चाहिए थी। बावजूद इसके यदि कपड़ा उद्योग अपने को अभी भी बेहाल पा रहा है तो जाहिर है सेंटीमेंट बुरी तरह बिगड़े हुए हैं।  

इसके कई असर होंगे। एक तो सरकार, जीएसटी कौंसिल बार-बार रेट घटाएगी। राजनीति और चुनाव की जरूरत में फैसले होंगे। व्यवस्था में अस्थिरता बनेगी। कारोबारियों को इस बात की ज्यादा चिंता करनी होगी कि आगे कहीं और बदलाव न हों। मोटे तौर पर जीएसटी के याकि पूत के पालने में लक्षण हैं कि नियम सोच समझ कर नहीं बने। जो भी बना है उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके अफसरों का पहला मकसद है कि जैसे भी हो सभी धंधों को सरकार के आईटी नेटवर्क में नंगा बनाया जाए। मतलब हर को टैक्स लपेटे में लेना है। कुटीर-लघु-छोटे उद्यमियों, धंधों के अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक क्षेत्र में कन्वर्ट करना है। इसलिए खाखरा, नमकीन बनाने वाले पर भी टैक्स लगा तो चाय, कॉफी, बिस्कुट, मिठाई, हलवाई, रेस्टोरेंट सबको बांध दिया है। 

अपना मानना है कि मोटे तौर पर यह कोशिश भारत की हकीकत से मेल नहीं खाती। दीर्घकाल के नाते यह ठीक है। मगर तब जीएसटी को पांच प्रतिशत की एक रेट में सीधे-सहज ढंग में बनवाना था। उलटे उसे विकृत-राक्षसी और विभागीय भ्रष्टाचार की नई गंगोत्री बनवाने जैसा यदि बनाया गया है तो धंधे में सेंटीमेंट साल-दो साल तो उखड़े रहेंगे ही। 

बाजार में, आर्थिकी में, कारोबारियों में जो महसूस हो रहा है वह अपने 40 साल के अनुभव में एकदम जुदा इसलिए है क्योंकि पहली बार सब अपने आपको इमरजेंसी वार्ड में ले जा कर लेटे पड़े हैं। काम करते हुए भी कारोबारी काम को समेटने, रिटायर होने के मोड में हैं। कितनी ही मंदी रही हो, कभी यह नहीं सुना कि व्यापारी लोग बाजार में दिवाली के वक्त लाइटिंग नहीं करेंगे। जबकि इस दफा कई शहरों में व्यापारियों में कुछ नहीं करने की खबर है तो यह उनकी भावना, मूड की वह प्रतिध्वनि है, जिसका ओर-छोर सिर्फ यह चिंता लिए हुए है कि अभी जब कुछ है ही नहीं तो क्यों दिवाली मनाएं!

निश्चित ही दुनिया चल रही है। लोग जी रहे हैं। अपनी अनिवार्यताओं की पूर्ति बाजार से ही कर रहे हैं। फैक्टरियां चल रही हैं। गाड़ियां दौड़ रही हैं मतलब जीवन चल रहा है मगर वह तो प्राण वायु है तो चलेगा ही। चलना बनाम उछलते-कूदते, उमंग के साथ दौड़ने में जो फर्क होता है वह जोश, भावना लिए होता है। मन में पटाखे फूटते हैं तो बाहर भी पटाखे फूटते हैं जबकि अक्टूबर 2017 की दिवाली का यह वक्त देखिए कि सरकार ने पटाखों को जहां अपनी सीलन में फुस्स बनाया वहीं सुप्रीम कोर्ट भी नहीं चूका। उसने पटाखों पर ही प्रतिबंध लगा दिया। तभी अपना यह अंधविश्वास बन रहा है कि लक्ष्मीजी की साढ़े साती अभी तो शुरू है!

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