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जिम्बाब्वे से समझे देश की तबाही!

मगर फिलहाल भारत को दिमाग से बाहर रखते हुए! जिम्बाब्वे और राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे मेरे लिए दिलचस्पी का विषय इसलिए है क्योंकि चालीस साल पहले पत्रकारिता शुरू करते हुए, नई दुनिया में ‘परदेस’ नामक साप्ताहिक कॉलम लिखते वक्त मेरे लिए तब रोडेशिया कहलाने वाला यह देश कौतुकपूर्ण था। कई बार मैंने रोडेशिया पर लिखा था। इसके गोरे राष्ट्रपति इयान स्मिथ ने ब्रिटेन से बगावत कर अपने को स्वतंत्र घोषित कर जैसी जिद्द ठानी थी उसका बड़ा हल्ला रहता था। चालीस लाख कालों पर दो लाख गौरो के राज को उन्होने इस दलील पर जरूरी बताया कि काले राज नहीं कर सकते। उन्हे राज करने का सलीका-तरीका नहीं आता। तब रोडेशिया उर्फ जिम्बाब्वे को अफ्रिका का कोहिनूर माना जाता था। ध्यान रहे उसका विक्टोरिया झरना दुनिया के आला आश्चर्य में है। जांबेजी नदीं का वन्य जीवन और उपजाऊ मिट्टी का पूरे अफ्रीका में जवाब नहीं है। यह दास्ता 1975-80 की है। तब जिम्बाब्वे अफ्रीका का अनाज निर्यातक देश था। देश में सड़को का जाल बिछा हुआ था। विशाल कृषि फार्म थे जिनमें व्यवयासी खेती होती थी। चार बड़े एयरपोर्ट थे। 
खुशहाली में गौरो का हाथ था। तभी राष्ट्रपति इयान स्मिथ का संकल्प था कि गौरे ही राज करेंगे। कालों का राज हजार साल संभव नहीं। मगर ब्रिटेन और दुनिया ने गौरी सरकार की नाक में ऐसा दम किया कि चौतरफा प्रतिबंध लगे और विरोधी नेता व अश्वेत संर्घष के 56 इंची छाती वाले रॉबर्ट मुगाबे की न केवल हौसला बुंलदी की गई बल्कि वैश्विक मदद और दबिस में हालात ऐसे बने कि जिम्बाब्वे में गृह युद्व की नौबत आ गई। कोई तीस हजार लोग मरे और अंत में ब्रितानी निगरानी मे हुए चुनाव से अश्वेतों को सत्ता ट्रांसफर हुई। 1980 रॉबर्ट मुगाबे के राष्ट्रपति बनने का वर्ष था। 
तब से अब तक मतलब लगभग चालीस साल से मुगाबे सत्ता में थे। इस सप्ताह 93 वर्षीय मुगाबे को सेना ने नजरबंद बना कमान संभाली तो वह एक व्यक्ति की मूर्खताओं, सनक और तानाशाही पर फुलस्टॉप था। 40 सालों में जिम्बाब्वे का ऐसा बेड़ा गर्क हुआ कि और अधिक बरबादी की गुंजाइस बची नहीं थी। यदि सेना मुगाबे को नहीं हटाती तो 52 साल की उनकी पत्नी ग्रेस मुगाबे पर जिम्बाब्वे का राज बनता। सेना ने उस आपदा से देश को बचाया है। 
पते की बात 40 सालों में एक व्यक्ति के राज में जिम्बाब्वे का लगातार रसातल में जाते रहना है। हमने मतलब भारत के विदेश मंत्रालय ने मुगाबे को मित्र नेता मान कर उनकी बहुत पूजा की है। वैसे ही जैसे सुकार्णों, टीटों, नासर, कास्त्रो, कज्जाफी, सद्दाम हुसैन आदि को हम पूजते रहे है। भारत के ये तमाम प्रिय नेता अपने –अपने देशों की बरबादी के लिए जिम्मेवार रहे है। इन सबके प्रतिनिधी के नाते आज जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे पर ही सोचा जाए। इस नेता ने हरे-भरे खेतों वाले, अनाज निर्यातक देश को चालीस साल में भूखमरी का मारा बनवाया। मुगाबे ने भी वहीं गलतफहमी पाली जो तीसरी दुनिया के तमाम देशों में रही है कि वे सिस्टम, पॉवर से देश को बदल डालेगें। मुगाबे की चालीस सालों की मूर्खताओं ने न केवल गौरो को देश छोड़ने के लिए मजबूर किया बल्कि दस लाख काले भी भूखमरी, बेरोजगारी, राजनैतिक उत्पीड़न से पडौसी देशों में शरण लिए हुए है। मुगाबे ने अश्वेतवाद, राष्ट्रवाद, नस्लवाद के भभकों, जुमलों पर दबाकर राजनीति की और हर चुनाव को येन केन प्रकारेण जीतते गए। इससे इयान स्मिथ और गौरों का छोडा जवाबदेह सिस्टम एक व्यक्ति के प्रति जवाबदेही में सिमटता गया। मतलब एक और सिर्फ एक 56 इंची छाती वाले रॉबर्ट मुगाबे पर ही सबकुछ निर्भर।
मुगाबे की मूर्खता में पहला उठा कदम था लोगों की उद्यमशीलता, गौरे जमींदार किसानों की उत्पादकता पर पाला मारना। दूसरा काम था सच वही जो मुगाबे बोले। प्रेस की आजादी को खत्म कर जिम्बाब्वे के लोगों को मजबूर किया गया कि वे वहीं देखे, सुने जो सरकारी टेलिविजन चैनल बताएं। जनता को मीडिया से सिर्फ यह मैसेज कि देखों मुगाबे के शोर्य से देश की सेना घाना में है या अमीर गौरे किसान भाग रहे है। अमीरों की शामत आई हुई है। मुगाबे की तीसरी मूर्खता थी जो विपक्ष को बुरी तरह कुचला। चुनावों में धांधली की। हरारे में डेली न्यूज नाम का एक अखबार निकला करता था। सन् 2001 में मुगाबे के सूचना मंत्री ने कहां यह अखबार देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक है। इसे तो चुप्प करना होगा। और कुछ ही घंटों में एक बम धमाके में अखबार का दफ्तर उड़ गया। अखबारों को बंद करने का हर उपाय हुआ। विपक्ष को खत्म करने के रिकार्ड में इतना भर जाने की मुगाबे के राज के जुल्मों की दास्तां में एमनेस्टी इटंरनेशनल हर सालों हजारों की संख्या के आंकडे जारी करती है। 
हम भारतीयों के लिए जानने लायक खास बात यह है कि राबर्ट मुगाबे ने लोगों के जीने को बेहतर बनाने की अपनी सनक में ऐसे-ऐसे कानून बनवाए कि कानूनों की भीड़ में जिम्बाब्वे जंगल राज वाला हो गया! हर बात पर कानून। जैसे यह कि ब्रेड की कीमत बैकरी वाला कैसे फिक्स करें। और उसमें यदि ग़डबडी पाई गई तो बेइंतहा जुर्माना। सो बेकरी वालों ने ब्रेड बनाना ही बंद कर दिया। 
हां, जाना जाए कि जिम्बाबवे की आर्थिकी के साथ मुगाबे ने जो किया है उसे दुनिया मुगोनोमिक्स की मूर्खता कहती है। मुगाबे का अर्थशास्त्र यह सत्व-तत्व लिए हुए है कि वे सब जानते है। वे अपने को हार्वड के अर्थशास्त्रियों से ज्यादा ऊंचे, ज्ञानी अर्थशास्त्री मानते थे। पूरे चालीस साल उन्होने अपने अर्थशास्त्र में देश को ऐसी प्रयोगशाला बनाया कि 1980 का खुशहाल जिम्बाबवे 1990 के आते –आते भूखमरी में जीने लगा और उसके बाद से अब तक वह लगातार अनाज के अंतरराष्ट्रीय दान में लोगों का जैसे तैसे पेट भरता है। वहां महंगाई की रेट 800-1000 प्रतिशत तक रहती है। बेरोजगारी 70 फिसदी तक तो एक हजार रू के नोट से आप ब्रेड का पैकेट नहीं ले सकते। 
यह सारी स्थिति मुगोनोमिक्स याकि मुगाबे का अपने को अर्थशास्त्रियों का गुरू मानने की बदौलत है। मुगाबे राज की पांचवी मूर्खता लोगों के बीच घृणा फैलवाना है। मुगाबे ने ‘ग्रीन बोंबरस’ याकि ऐसे हल्लाबोल लडकों की ब्रिगेड बनवाई जिन्हे यों गौरों से नफरत की आग में पकाया गया था मगर ये काम मुगाबे के अश्वेत विरोधियों को डराने-मारने का करते थे। विरोधी पार्टी के दफ्तरों पर हमले, राशन की लाईन में लगे लोगों को परेशान करने, गौरों के खेतों पर जबरन कब्जे, मतदाताओं और उम्मीदवारों को डराने का इन नौजवानों का लंगूरी काम काम मुगाबे की राजनैतिक ताकत थी। 
विरोधियों से नफरत, देश के दुश्मनों पर दोष मढ़ने, विदेशी साजिश के हवाले डराने, बेबात सेना को घाना भेज कर बहादुरी के जश्न मनाने, सुरक्षा बलों से नरसंहार जैसे आपरेशन चलाने और एचआईवी जैसी महामारी की हकीकत पर भी लीपापोती के ऐसे और कई मामले है जिसमें राबर्ट मुगाबे ने न केवल लोगों को उल्लू बनाया बल्कि देश का ऐसा बेड़ा गर्क किया कि आने वाले कई दशकों तक यह देश पटरी से उतरा ही रहना है। अब हद यह थी जो अपने से चालीस साल छोटी पत्नी को उत्तारिधाकारी बनाने की सनक ऐसी च़ढी कि पुराने साथी नेताओं, उपराष्ट्रपति को मुगाबे ने दरवाजा दिखाया। तभी सेना का हस्तक्षेप हुआ और 93 वर्षीय मुगाबे के राज का अंत। 
क्या आपको लगता नहीं कि एक व्यक्ति की सनक का, अहंकार का, तानाशाही का देश को, समाज को सर्वत्र एक सा अनुभव झेलना पड़ता है? अपना मानना है मुगाबे से निश्चित ही यह फिर प्रमाणित हुआ है। 

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