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ऐसे कैसे जीतेगी कांग्रेस विधानसभा चुनाव?

राहुल गांधी गलती कर रहे हैं जो हर दिन, हर वक्त  मतलब चौबीसों घंटे राजनीति नहीं कर रहे हैं। न यह समझ रहे है कि मोदी-शाह 24 घंटे राजनीति करते हैं और यदि वे वैसा नहीं कर सकते हैं तो दिग्विजयसिंह, शीला दीक्षित, भूपिंदरसिंह हुड्डा, अशोक गहलौत, कमलनाथ, अहमद पटेल, सीपी जोशी, सुबोधकांत, तरूण गोगोई, अशोक चव्हाण को सिर पर बैठाएं। उनको 24 घंटे राजनीति करने को कहें। उन्हे पॉवर दे। अपना भी कोई अमित शाह बनाए। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में चुनाव लड़ने व उसके मैनेजमेंट का अनुभव लिए नेता नहीं है। कांग्रेस में ऐसे पचास-सौ नेता निकल आएंगे जिन्होने पांच-आठ बार चुनाव लड़ा और पैसों को, लोगों को, एलायंस नेताओं को हैंडल किया है। यदि इन्हे राहुल गांधी सीधे पॉवर-अधिकार दे कर अपने-अपने जिलों, इलाके में 24 घंटे राजनीति करने को कहे और उम्मीदवार तय करने, जीतने पर सत्ता की गारंटी यदि दे तो मोदी-शाह के माइक्रों मैनेजमेंट की काट अपने आप बनेगी। कर्नाटक में राहुल गांधी की गलती थी जो अकेले सिद्वारमैया व प्रदेश के अनाम प्रभारी, अध्यक्ष पर राहुल गांधी ने भरोसा किया। कर्नाटक वह प्रदेश है जहां कांग्रेस में पुराने, अनुभवी-घाघ नेता कम नहीं है। खड़गे, मोईली आस्कर, जाफर शरीफ, सीएम इब्राहीम जैसे असंख्य पुराने नेताओं को इनके खुद के जिलों में भी यदि पॉवरफुल बना जीत की जिम्मेवारी, एलायंस करने न करने आदि का जिम्मा दे कर राहुल गांधी ने पार्टी को चुनाव लड़वाया होता तो कांग्रेस विधानसभा चुनाव में वैसे नहीं पीटती जैसे पीटी है। 

दरअसल कांग्रेस मुख्यालय हो या प्रदेश कांग्रेस कमेटी सब जगह राहुल गांधी की यह गलती है जो वे पार्टी के बुरे वक्त में नए, अनुभवहीन लोगों की कमान दिए बैठे है या दे रहे है। अपना मानना है कि जब सत्ता हो तब नए लोगों को नेता बनाने का प्रयोग ठीक है पर सत्ता नहीं है तो पुराने नेताओं को आगे कर, दूसरी पार्टियों के नेताओं को तोड़ कर ही प्रदेश जीता जा सकता है। इस बात को नरेंद्र मोदी, अमित शाह ने बेखूबी समझा है। इन्होने प्रदेशों में सत्ता में आने पर नए चेहरों को मुख्यमंत्री बनाया। खट्टर, फडनवीस, ऱघुवरदास, सोनेवाल आदि पांच साल के सत्ता अनुभव से नेता बन रहे है और ये आगे मोदी- शाह के काम आएंगे। मोदी-शाह ने सत्ता पा कर, सत्ता से वफादार टीम बनाई और पार्टी पर कब्जा बनाया। 

राहुल गांधी ने उलटा किया। यदि 2009 का चुनाव जीतने के बाद वे हरियाणा में हुड्डा की जगह अशोक तंवर को या राजस्थान में अशोक गहलौत की जगह सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाते तो ये नौजवान नेता पांच साल में अपनी शख्शियत बना लेते। पर तब नहीं किया और अब इन राज्यों में जब कांग्रेस का सूखा है तो अपनी टीम के चक्कर में नए नौजवान चेहरों को आगे किए हुए है। वे यह नहीं समझ रहे है कि अशोक गहलौत या हुड्डा को आगे करके चुनाव की अगली फसल में इनसे बुआई नहीं कराई तो राजस्थान, हरियाणा, झारखंड आदि सब जगह कांग्रेस भी फेल होगी व राहुल गांधी भी।

राहुल गांधी ने जब मोदी-शाह की सत्ता आने लगी तब अपने साथ अपनी पसंद के नौजवान चेहरों को आगे किया। अनुभव की जगह नौसखियों को लड़ाई की कमान दी। तभी कांग्रेस का आज यह संकट है कि बार-बार चुनाव जीते हुए, जनता में अपनी सत्ता की याद बनवाए हुए वरिष्ठ नेता हाशिए में हंै वही राहुल गांधी के तमाम प्रदेश प्रभारी नेता बिना ग्रासरूट अनुभव वाले हैं। राहुल गांघी की फीडबैक का जरिया या तो अनुभवहीन प्रदेश प्रभारी महासचिव होता है या अपना बनवाया मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष होता है। राहुल गांधी ने कर्नाटक में अनुभवी दिग्विजयसिंह की जगह केसी वेणूगोपाल को प्रभारी बनाया। वह न तो सीनियर नेताओं की सामूहिक केमैस्ट्री बनवा सका। न एंटी इनकंबेसी वाले विधायकों को टिकट दुबारा न देने की सिफारिश कर सका और न खड़गे, मोईली आदि कांग्रेस के दिग्गजों की सोच को सिद्वारमैया या चुनावी रणनीति में इंट्रीग्रेट करा पाया। कोई माने या न माने कर्नाटक में कांग्रेस अपनी संगठनात्मक कमियों, वरिष्ठ नेताओं के बिखरे होने, कार्यकर्ताओं के अनुत्साहित होने से हारी। इस बात को न सिद्वारमैया ने समझा और न प्रदेश के दूसरे कांग्रेसी नेताओं ने कि चुनाव में लड़ाई उस भाजपा से है जिसमें मोदी-शाह हर हाल में चुनाव जीतने का संकल्प, किलींग इन्स्टीक्ट लिए हुए है। 

यह बात राहुल गांधी ने खुद नहीं बूझी और न शायद प्रभारी या किसी और ने उन्हे फीडबैक दी होगी कि देवगौडा का बेटा कुमारस्वामी ज्यादा समझदारी दिखा रहा है। वह बसपा से एलायंस बना रहा है या मोदी-शाह वोट लेने के लिए रेड्डी भाईयों जैसो को भी गले लगा रहे है तो हमें भी कुछ करना चाहिए। सोचंे, जिन नेताओं को राहुल गांधी ने खुद प्रभारी बनाया, जिसे मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाए रखा उसने भी उन्हे सही तस्वीर नहीं दिखाई तो वजह राहुल गांधी के खुद के सेटअप की कमियां थी और बेबाक बताने वाले अनुभवी नेताओं का अपने घर बैठे हुए होना था। 

सचमुच यदि दिग्विजयसिंह, अहमद पटेल, अशोक गहलौत, कमलनाथ जैसों की टीम बना कर इनकी कमान में राहुल गांधी यदि कर्नाटक में चुनाव लड़वाते, इन दिग्गजों को मुख्यमंत्री-प्रभारी को हैंडल करने का कंट्रोल मिलता तो पार्टी की सामूहिक एप्रोच कांग्रेस का अलग नतीजा निकलवा देती। ऐसा गुजरात में भी संभव था। तब गुजरात में अल्पेश ठाकुर के टिकट कोटे से सीटे गंवाने या एंटी इनकंबेसी की दिखलाई देने के बावजूद पुराने विधायकों के टिकट रीपिट नहीं होते। 

ध्यान रहे ये बाते मौजूदा दौर के चुनावों में माइक्रों प्रबंधन का हिस्सा है। मोदी-शाह एक-एक छोटी बात का ध्यान रख भाजपा को चुनाव लड़वाते हंै। वे प्रदेश में नया इंचार्ज बना कर बैठाते भी हंै तो अपना खुद का पूरा कंट्रोल और एक-एक बात का ध्यान रख कर। यह राहुल गांधी या उनके निजी दफ्तर को संभाल रहे पूर्व आईएएस अफसर राजू हो या कनिष्क सिंह  या मोहन गोपाल, कौशल विद्यार्थी, सचिन राव, अलंकार सवाई या केबी बिजू आदि की पूरी टीम में किसी के भी बस की बात नहीं है। इनमें से कोई समझ ही नहीं सकता कि विपक्ष में रह कर चुनाव जीतना (और वह भी मोदी-शाह के सामने) बिना खांटी या पापी नेताओं की टीम के संभव नहीं है। अमित शाह का निजी दफ्तर सचमुच राजनीति, चुनाव प्रबंधन में मतलब नहीं रखता है। सबकुछ खुद अमित शाह हंै या कैलाश विजयवर्गीय, रामलाल जैसे खांटी चुनावी धुऱंधरों या वोट और पैसों के मैनेजरों के जिम्मा हुआ करता है।  

यह फर्क व एप्रोच, समझ की कमी में ही राहुल गांधी जहां गुजरात और कर्नाटक का जीता हुआ चुनाव हारे वहीं  अपनी पसंद-नापसंद के चलते इस मुगालते में हंै कि छतीसगढ़ में बिना अजित जोगी-बसपा आदि से एलायंस बनाए वहां विधानसभा चुनाव जीत जाएंगे या नौजवान सचिन पायलट की कमान रखवा राजस्थान में मोदी-शाह को हरवा देंगे या भूपिंदरसिंह हुड्डा बदनाम हंै तो उनको हाशिए में रखो और अशोक तंवर- रणदीप सूरजेवाला के बूते हरियाणा में कांग्रेस खट्टर राज को हरा देगी। 

और जान लें भारी धोखा खाएंगे। जहां जीत तय मान रहे है वहां भी हारेंगे। भाषण और आक्रामकता से राहुल गांधी अपना ग्राफ बनवा ले सकते हैं लेकिन जमीन पर कांग्रेस को चुनाव जीतने लायक, उसकी फसल का प्रबंधन नहीं कर सकते। मोदी-शाह चुनाव भाषण, प्रचार, ग्राफ पर भी लड़ते हंै तो जमीन के बारीक, माइक्रों प्रबंधन से भी लड़ते है जबकि राहुल गांधी जमीन की लड़ाई अपने घर से अकेले, अपनी निजी टीम के जरिए अलटप्पाई अंदाज में लड़ रहे हंै। कांग्रेस के मुख्यालय में या अपने-अपने घरों में बैठे खांटी कांग्रेसी नेताओं मतलब शीला दीक्षित, सुबोधकांत सहाय, अहमद पटेल, भूपिंदरसिंह हुड्डा, हरीश रावत, वीरभद्रसिंह, एके एंथोनी आदि उन नेताओं का पार्टी में आज कोई मतलब नहीं है जो जनता की, सत्ता की, नेताओं की नब्ज को जानने-समझने का अनुभव रखते है। कांग्रेस मुख्यालय में भी अभी जो बैठे अनुभवी है फिर भले वे अशोक गहलौत, सीपी जोशी, मुकुल वासनिक, ओमान चांडी, मोहन प्रकाश, अंबिका सोनी आदि हो ये सब इसलिए बेमतलब है क्योंकि ये राजस्थान में, मध्यप्रदेश, आंध्र, उत्तरप्रदेश, छतीसगढ़ आदि में अभी सक्रिय होने चाहिए थे लेकिन सभी इस इंतजार में है कि बॉस बुला कर कहे तो राजस्थान, छतीसगढ़ में घूमना शुरू करें! 

अमित शाह ने तीन दिन पहले छतीसगढ़ में रोड शो किया। उन्होने अपने हाथ में मध्यप्रदेश, राजस्थान का चुनाव प्रबंधन ले लिया है। वे नरेंद्र मोदी के चेहरे पर प्रदेशों में भाजपा को चुनाव लड़वाएंगे। उन्हे पता है कि कितने सीटिंग विधायकों के टिकट काटने है। गुर्जर और मीणा की राजस्थान में सबसे ज्यादा यदि खुन्नस है तो कैसे भी हो किरोडी लाल मीणा को भाजपा में ले कर सचिन पायलट की बनी गुर्जर इमेज के ही एक फेक्टर पर कांग्रेस को घेर कर उसे  हरवा देना है या मध्यप्रदेश, राजस्थान के कांग्रेसी नेताओं में किन –किनका दलबदल करवा कर, वोट कटाऊ तीसरा मोर्चा बनवा ऐन वक्त माहौल बदलाना है, इसका उनका रोडमैप बना हुआ है। ठीक विपरित कांग्रेस और उसके नेताओं की हकीकत आज यह है कि दोनों प्रदेशों में कांग्रेस के नेता फिलहाल इसी बैचेनी में वक्त काट रहे है कि राहुल गांधी ग्राउंड रियलिटी बूझेगे या नही? उन्हे कैसे ग्राउंड रियलिटी का अहसास कराया जाए? 

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