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हां, लोकतंत्र है खतरे में!

हरि शंकर व्यास
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और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम जजों को सलाम, जिन्होंने न्याय की देवी के सच्चे साधकों की ईमानदारी वाला साहस दिखाया। अन्याय को नहीं सहा और न केवल लोकतंत्र को खतरे से नागरिकों को आगाह किया, बल्कि दो टूक शब्दों में यह भी कहा कि यदि आज हम खुल कर नहीं बोलते तो भावी पीढ़ियां हमसे पूछतीं कि हमने अपनी आत्मा को क्यों बेच दिया? 

सोचें कितनी बड़ी और इतिहास में दर्ज होने वाली बात है यह! सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज कहें कि उनकी आत्मा लोकतंत्र पर मंडरा रहे खतरे में घुट घुट कर जी रही है तो हम नागरिकों को तो बहुत गंभीरता से विचारना चाहिए कि हम कैसे झूठ और मुगालतों में जी रहे हैं! पता नहीं भारत के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की आत्मा में कुछ बचा है या नहीं? इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा! 

हिसाब से उन्हें इस्तीफा देने की पहल करके बताना चाहिए कि चीफ जस्टिस की कुर्सी पर कलंक की बनिस्पत वे उसके मान सम्मान की रक्षा में पद छोड़ते हैं। हां, चीफ जस्टिस पर ही दारोमदार है कि वे देश और दुनिया को बताएं कि सवा सौ करोड़ लोगों के वे आत्मसम्मान में जीने वाले, उसके लिए मर मिटने वाले मुख्य न्यायाधीश है न कि लोकतंत्र के न्याय मंदिर में बैठी एक कलुषित आत्मा! 

किसी भी कोण से सोचें, सुप्रीम कोर्ट का संकट लोकंतत्र के सत्व-तत्व को गलाने वाला है। चार जजों ने मीडिया के सामने आ कर जो बताया है वह यह अर्थ लिए हुए है कि सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों जैसे कामकाज चल रहा है, वह भारतीय लोकतंत्र को जर्जर बनवा देने वाला है। सुप्रीम कोर्ट लोकतंत्र के एक स्वतंत्र खंभे की तरह व्यवहार नहीं कर रहा है। उसके भीतर लोकतंत्र नहीं है। निरंकुशता है, मनमानी है, बाहरी प्रभाव से गंभीर मामलों को, केसों को निपटाने की अंधेरगर्दी बनी है। चीफ जस्टिस दूसरे जजों के कामों में, कार्य बंटवारे में, परंपरागत व्यवस्थाओं में ऐसा मनमानापन लिए हुए हैं, जिससे विश्वसनीयता का संकट बना है। वे गंभीर मामलों को वरिष्ठ जजों के बजाय जूनियर जजों को सौंपते है और अचानक हस्तक्षेप करने लगते हैं। यही नहीं सत्तारूढ़ नेताओं के मामलों में निष्पक्ष जांच बैठाने में कोताही करते हैं।

ये सारे पहलू गंभीर और दुखद हैं। चार जजों की प्रेस कांफ्रेस से पहले शुक्रवार को सुबह इंडियन एक्सप्रेस में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने जो लिखा उसमें चीफ जस्टिस के गंभीर मामलों में रवैये को ले कर जो ब्योरा है वह सवाल बनाता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक आंकाओं का अखाड़ा नहीं हो गया? भला भारत के सुप्रीम कोर्ट में ऐसी नौबत! जो पाकिस्तान जैसे देश में भी अकल्पनीय है। हां, आपने हमने सबने पिछले पांच सालों में कई बार सुना है कि पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने कैसे वहां के सत्तारूढ़ नेताओं को जवाबदेह बनाया! भ्रष्टाचार के मामलों में न केवल सुनवाई की, बल्कि निष्पक्ष जांच बैठा कर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ तक को सत्ता से रूखसत कराया! ठीक विपरीत हम अपने लोकतंत्र की दुहाई दुनिया भर में देते हैं लेकिन आज पूरी दुनिया ने सुना कि भारत के लोकतंत्र में उसके सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज भी अपने आपको घुटा हुआ महसूस करते हैं। सुप्रीम कोर्ट अपनी स्वतंत्रता, गरिमा और मान सम्मान बनवाए रखने में असमर्थ है। 

सवाल है अब क्या हो? डॉक्टर वेदप्रताप वैदिक ने साथ के कॉलम में सरकार को तटस्थता छोड़ने और हस्तक्षेप करने की सलाह दी है। अपन इससे असहमत हैं। इसलिए कि कार्यपालिका या सरकार याकि सत्तारूढ़ लोगों का प्रभाव होता है जो लोकतांत्रिक संस्थाओं को खोखला बनाता है। वरिष्ठ जजों की प्रेस कांफ्रेस और दुष्यंत दवे के लेख से साफ जाहिर है कि पर्दे के पीछे की खलनायक सरकार और सत्तारूढ़ नेता हैं। ऐसे में सरकार या राष्ट्रपति की दखल का क्या मतलब है? उससे तो बीच बचाव करने के बहाने बहलाने-फुसलाने-धमकाने का सरकार को मौका मिलेगा। सरकार तो खुश होगी कि सुप्रीम कोर्ट के जज लड़ रहे हैं। इनकी और बदनामी कराओ और अपना उल्लू साधो। 

बहुत संभव है कि आगे जजों की बदनामी के किस्से सोशल मीडिया में चलाए जाएं। जजों को दो खेमों में बांट कर जजों को बदनाम करने के किस्से चलें। बहुत कीचड़, बहुत गंदगी उछलेगी। उस नाते भी संस्था की साख बचाने के लिए सही तरीका यहीं है कि चीफ जस्टिस अपनी तह अपने आपको पदमुक्त करें या वरिष्ठ जजों की बेंच बना तौरतरीकों को कायदे से सर्वमान्य बनवाने की पहल करें। दारोमदार चीफ जस्टिस पर है। कुछ भी हो न्यायपालिका की आजादी पहली जरूरत है। सरकार का दखल कतई नहीं होना चाहिए। जज खुद बैठें और दुनिया को बताएं कि भारत का सुप्रीम कोर्ट अपनी स्वतंत्र सामूहिक चेतना और न्यायिक व्यवस्था पर आंच नहीं आने देगा और उसमें सामूहिकता में फैसले लेने का माद्दा है।  

यदि ऐसा न हो तो लोकतंत्र की रक्षा में अब नागरिक समाज को आगे बढ़ना चाहिए। भारत के तमाम सुधी जनों को, सक्रिय कार्यकर्ताओं, सार्वजनिक हस्तियों, वकीलों मतलब उन सब लोगों को वह सब करना चाहिए, जिससे सुप्रीम कोर्ट की याकि लोकतंत्र के खंभों की स्वतंत्रता, गरिमा और धमक बहाल हो। 

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