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बर्बरता में बरबाद सीरिया!

हरि शंकर व्यास
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पश्चिम एशिया या अरब विश्व की नियति संर्घष है। इस बात को चाहे तो यों भी कह सकते है कि तुर्की से लेकर दक्षिण एशिया की पट्टी इस्लाम-यहूदी-हिंदू संर्घष को शापित है। उसमें शेष विश्व, ईसाईयों के लिए  या तो रैफरी होना है या लड़वाना है। तीस साल पहले भारत के बगल में अफगानिस्तान में दो महाशक्तियों के बतौर पिठ्ठू लड़ाई थी। आज वह सीरिया में शिफ्ट हुई पड़ी है। कितनी गजब बात है कि सोवियत संघ की कम्युनिस्ट ताकत चूकने से मास्कों ने अफगानिस्तान से सेनाएं वापिस बुलाई। शीत युद्व के बोझ से सोवियत संघ ढ़हा। उसकी जगह रूस पैदा हुआ तो वह आज दूसरे छोर सीरिया में तानाशाह बशर-अल-असद पर हाथ रख अपगानिस्तान जैसा गृहयुद्व बनवाए हुए है। और बशर-अल-असद सीरियाई जनता, बच्चों पर रसायनिक हथियारों का इस्तेमाल करने की हद तक बर्बर है। रूस के पुतिन की जिद्द है कि अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन यदि अरब विश्व में दादागिरी रखते है तो रूस भी इलाके में सीरिया, ईरान को प्रश्रय दे कर अपना पॉवर दिखलाता रहेगा। इसलिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले कहें कि सीरिया में मित्र देशों (अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन) का मिसाईल हमला सफल रहा लेकिन न तो इससे वहां गृहयुद्व खत्म होना है और न रसायनिक हथियारों का मासूमों पर उपयोग रूकना है। 

सीरिया का हमारे लिए या दुनिया के लिए क्या मतलब हैं, इस बात को समझने के लिए श्रीश्री रविशंकर के उस बेतुके बयान को याद करने की जरूरत नहीं है कि यदि अयोध्या में राममंदिर नहीं बना तो भारत सीरिया बनेगा। सीरिया का मतलब गृहयुद्व है। सात-आठ साल से यह चल रहा है। देश की सीमाओं के भीतर लोग बंटे हुए है। इलाके बंटे है। एक तरफ सत्ता है तो दूसरी और उसका विरोध करते पंथ समूह। सऊदी अरब के वहाबी राजगुरूओं ने और ईरान में खुमैनी की इस्लामी क्रांति ने दुनिया में अपने एजेंट बना कर जिहाद के जैसे-जो बीज बोए है उसके बाकि के लिए जो नतीजे है तो इस्लाम के अलग-अलग फिरकों में भी एक –दूसरे के खून की पिपासा है। अल कायदा, बिन लादेन, खलीफाई इस्लामी स्टेट, बगदादी, हमास, तालिबानी, बोको हराम आदि से गैर-मुस्लिम को भुगतना पडा है तो उनसे ज्यादा खुद इस्लाम के धर्मावलंबियों को भुगतना पड रहा है। इराक बरबाद हुआ। लीबिया बरबाद हुआ। यमन बरबाद है। लेबनान बरबाद हो कर फिर आबाद है लेकिन वह उन तमाम लक्षणों को लिए हुए है जिसमें किसी घटना, क्रिया-प्रतिक्रिया का सिलसिला शुरू हुआ नहीं कि फिर खंडहरों में बदल जाएगा।

उस नाते लेबनान की हकीकत में सोचना गलत नहीं होगा कि सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात स्थिरता के, विकास के स्थाई टापू दिखाई देते है लेकिन भीतर ही भीतर बहुत खोखला है। सऊदी अरब पर यमन से मिसाईल दागे जाने की खबरें आती रहती है। यदि इन पर अमेरिका- पश्चिमी दुनिया का सुरक्षा छाता न हो तो इन देशों में इस्लामी कट्टरता से ले कर लौकतंत्र की चाह का लावा इतना खदबबदाया हुआ है कि  एक बार दो-चार ज्वालामुखी फूटे नहीं कि ये टापू भी सीरिया में कनवर्ट हुए मिलेगें।

हां, ध्यान रहे सीरिया, लीबिया, इराक भी पहले संपन्नता का वैसा ही वैभव लिए हुए थे जैसे सऊदी अरब, कुवैत, जोर्डन, कतर, यूएई है। इनकी राजधानियों के महल, सचिवालय, क्रंकीट की बहुमंजिला इमारतों, विकास की भव्यता में कम नहीं थे। लेकिन अंत में क्या हुआ? उस नाते यह फर्क बनता है कि जिन अरब-मुस्लिम देशों ने अमेरिका का सुरक्षा छाता पकड़े रखा उनमें अराजकता नहीं बरपी और जिन देशों ने शीत युद्व के वक्त सोवियत संघ या रूस का छाता पकडा वे बरबाद हुए। फिर भले इराक के सद्दाम हुसैन, लीबिया के कज्जाफी, सीरिया के असद (मौजूदा शासक बसर-अल-असद के पिता), ईरान के खुमैनी या अफगानिस्तान का मामला रहा हो।

सो दिलचस्प निष्कर्ष है कि अमेरिकी छाते में तुर्की से ले कर पाकिस्तान की स्थिरता बनी रही जबकि साम्यवादी सोवियत संघ और फिर रूस, चीन के हमजोली इस्लामी देश अस्थिर और तबाह हुए। बहरहाल, मैं भटक गया हूं। फिलहाल उस सीरिया की बात है जो दुनिया को बतला रहा है कि इस्लाम को मानने वाले धर्मावंलबी जब आपस में लड़ते है, गृहयुद्व करते है तो वे इस हद तक अमानवीय बन जाते है कि बच्चों पर रसायनिक हथियारों के उपयोग में भी नहीं हिचकते!

यह जघन्य हकीकत है। पिछले सप्ताह गैस पीडित बच्चों की जो फुटेज दिखी वह दुनिया के लिए इसलिए सदमा थी क्योंकि माना गया था वैश्विक दबाव और पिछले साल के सीरिया पर अमेरिकी हमले के बाद राष्ट्रपति बशर ने इन हथियारों को नष्ट कर दिया होगा। यों कई अमेरिकी विरोधियों का मानना है कि सीरिया के बागियों ने केमिकल हमले का झूटा वीडियों बनाया। मतलब बशर की सेना गृह युद्व जीतने के कगार पर है तो बागियों ने केमिकल हमले का हल्ला बोल अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन को उकसाया। नतीजतन इन देशों ने बशर की सेना, उसके कथित केमिकल हथियारों के अड्डों पर मिसाईले दागी तो अब फिर ढाक के तीन पांत है। सेना ठिठक गई है और बागियों के हौसले बढ गए है।

यह सिलसिला छह-सात साल से चला हुआ है। न सेना जीत पाती है और न उससे लड़ रहे लड़ाके जीत पा रहे है। बागियों में भले कुछ इस्लामी स्टेट के लड़ाके छुपे हो लेकिन परोक्ष मदद सऊदी अरब खेमा दे रहा है तो इजराइल, अमेरिका से भी मदद है। पहले पश्चिमी देशों का रूख बशर को हटवाना था लेकिन बशर क्योंकि लगातार राजधानी और सेना पर कब्जा बनाए हुए है इसलिए अब डोनाल्ड ट्रंप भी मानने लगे है कि बशर तो रहेंगे। बशर को नहीं हटाने की हकीकत समझ में आने के बावजूद रूस के पुतिन और डोनाल्ड ट्रंप मिल बैठ कर या संयुक्त राष्ट्र से पहल करवा कर दोनों पक्षों में सहमति, समझौता कराने का इरादा नहीं बना रहे। तभी अपना मानना है कि सीरिया में गृह युद्व चलता रहेगा। इसकी पडौसी इजराइल की रणनीति भी हो सकती है तो सऊदी अरब और ईरान आपसी झगडे ऐसा चाह रहे होंगे। हिसाब से यदि पश्चिमी देश याकि विश्व बिरादरी बशर को गारंटी दे कि उन्हे विदेश में शरण मिलेगी और वे और उनका परिवार सुरक्षित रहेगा तो शायद दोनों तरफ की सहमति से बशर के गद्दी छोड़ने और दमिश्क में साझा राष्ट्रीय सरकार की संभावना बन सकती है।

मगर पहल कौन करें? तभी कईयों का मानना है कि लड़ाई में सेना को जीत के कगार पर देख रसायनिक हथियारों के हमले का हल्ला होता है और लड़ाई को नई ताकत दी जाती है। अपना ऐसा नहीं मानना है। अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन रसायनिक हथियारों के मामले में संवेदनशील है और होना भी चाहिए। हाल में ब्रिटेन के शहर में रूस ने अपने पूर्व जासूस को नर्व गैस से मारने की कोशिश की। इस पर रूस बनाम पश्चिमी देशों में बुरी तरह ठनी। दोनों तरफ से राजनयिकों को देश छोड़ने के लिए कहां गया। उस नाते सीरिया के बशर और रूस के पुतिन एक ही मिजाज वाले मवाली नेता है। इसलिए 1920 से जब रसायनिक हथियारों पर पांबदी के समझौते में दुनिया बंधी हुई है तो इसमें ढील रत्ती भर नहीं आने देनी चाहिए। तभी अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन की सीरिया पर मिसाइलबारी वाजिब है। यदि रसायनिक हथियारों के मामले में लापरवाही बरती गई तो मवाली देश और आंतकवादियों को फिर जो मौका मिलेगा वह बहुत घातक होगा। 

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