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वक्त सुनने का, फील करने का!

हरि शंकर व्यास
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(image) हां, आज मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो रहे हैं। और यह मौका ऐसा वक्त लिए हुए है, जिसमें जंग की गड़गड़ाहट है। भारत और पाकिस्तान के सेनापति सीधे भिड़ने की कगार पर खड़े दिख रहे हैं। तभी आज से सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्री, उनका प्रचार तंत्र, जैसा जो जश्न मनाएं, शुरू करें, उसकी हमें वाह करके, सीमा पर फोकस रखना चाहिए! सरकार ने तीन साल में जो किया वह सिर आंखों पर। उसका बाद में विश्लेषण कर लेंगे मगर हाल-फिलहाल तो यहीं सोचना चाहिए कि भारत के एयर चीफ और पाकिस्तान के एयर चीफ ने जो कहा है वह कब और क्या रूप लेगा? दोनों तरफ क्या है संकल्प? हिसाब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को भी जश्न छोड़ना चाहिए। महीने भर सरकार और उनके मंत्री जश्न मनाते हुए देश घूमें उससे बेहतर है कि दिल्ली बैठ कर तय हो कि अगली जंग में भारत ऐसा क्या करे कि पाकिस्तान की सात पीढ़ियां याद रखें। वैसे यह संभव है कि सरकार ने ब्लूप्रिंट, रोडमैप बनाया हुआ हो। आखिर तभी भारत की सेना प्रो-एक्टिव हो कर ईंट का जवाब पत्थर से दे रही है। हमारे टीवी चैनलों ने भारतीय सेना की बहादुरी का ऐसा माहौल बना दिया है कि पाकिस्तान की सेना की नाक कटी हुई है, वह बौखलाई, बिलबिलाई हुई है। उधर दुनिया भी मान रही है (अमेरिकी बयान प्रमाण है) कि भारत सोची-समझी रणनीति में वह सब करने वाला है, जिससे पाकिस्तान की कमर हमेशा के लिए टूटे! क्या सचमुच ऐसा है? अब इस तरह का अनुमान लगाना भी एक तरह से गलत बनता है। यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सामरिक रणनीतिकारों ने सरकार की तीन साला वर्षगांठ से ठीक पहले अधिकृत तौर पर भारतीय सेना के पाक चौकियों को तबाह करने का वीडिया जारी किया है तो इस संयोग में बहुत कुछ छुपा हो सकता है। एक तरफ जम्मू-कश्मीर में घाटी की स्थिति को लेकर भारत सरकार का सख्त रूख गौरतलब है तो दूसरी और भारत-पाकिस्तान के बीच की सीमा, नियंत्रण रेखा पर जो हो रहा है और उसे जिस तरह टीवी चैनलों से दर्शाया जा रहा है उसका सीधा अर्थ है कि सरकार मैसेज देने-लेने के मोड में नहीं है, बल्कि कार्रवाई के मोड में है। अब ऐसा है तो हम हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए दूसरा कुछ सोचने को भला क्या बनता है? मुझे क्यों सोचना चाहिए कि तीन साल में क्या हुआ और क्या नहीं? जो हुआ वह कितना अफसाना है और कितनी हकीकत? मैं हकीकत की निर्मम सच्चाईयों में लिखने का आदी हूं। लिखना काम है, धर्म है और मेरे अस्तित्व की जरूरत है। फिर कई मायनों में नरेंद्र मोदी व उनकी सरकार की वजह से तो अपना लिखना खिला है। भारत और खास कर हिंदू की सच्चाईयों, मनोदशा, उसके मनोविश्व से ऐसा साक्षात्कार हो रहा है कि बस पूछो मत। हमारी मूर्खताओं, गुलामी और गपोड़शंखी अवचेतन के ऐसे नोट्स बन रहे हैं कि उन्हें भी लिखना सीमा पर उमड़ते-घुमड़ते जंग के बादलों के बाद मेरे लिए अनिवार्यता होगी। पर फिलहाल मैं 26 मई 2014 के राष्ट्रपति भवन के शपथ समारोह के वक्त में ठहरा हुआ हूं। उस शपथ को देखते हुए मैं नरेंद्र मोदी को दिल्ली के तख्त के आखिरी हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान की प्रतिछाया में बूझ रहा था। मन गदगद था, दिमाग सुर्ख था भगवा माहौल देख कर। यह सोच कर कि चलो, आजाद भारत में हिंदुओं की यह साध भी पूरी हुई। देखते है नेहरू के आईडिया ऑफ इंडिया के बाद भगवा आईडिया ऑफ इंडिया में क्या बनता है? उस वक्त खटकने वाली, पूरे शो में काला टीका लगा एक ही कोना था और वह नवाज शरीफ का चेहरा था। क्षण भर के लिए विचार कौंधा कि पृथ्वीराज चौहान को तुरंत गौरी को गले लगाने की भला जरूरत क्यों हुई? क्या है विजन? यह नया रास्ता है या पुराना? बहरहाल, याद करें कि पृथ्वीराज चौहान के रूपक के साथ मैंने तब भी हिंदू तासीर, हिंदुओं की नई भूख, चाहत, भभके के मनोविज्ञान का विश्लेषण किया था। हिसाब से पिछले तीन सालों में इस रूपक ने नए–नए रूप पाए हैं। मेरी खुद की समझ में, सत्यशोधन में विश्लेषण बदले है। बहुत कुछ उलटा-पुलटा हुआ है। लबोलुआब यह कि तीन साल में हिंदू राजा के अलग-अलग कई अवतारी रूप दिखे हैं लेकिन बुधवार को पाकिस्तान के एयर चीफ के बयान को पढ़ने के बाद फिर पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी का वक्त खटक कर दिमाग में छा गया है। पाक के एयर चीफ ने धमकी दी है कि ऐसा सबक सीखाएंगे कि पीढ़ियां याद रखेंगी! क्या एटम बम फोड़ेगा? उसे क्या हमारे एटम बम की चिंता नहीं है? कही अपने एटम बम हिंदू राजाओं के महल के सजावटी हथियार तो नहीं बन गए? हमारे पास भी एटमी बम है। हम बहादुर भी हो गए है। बावजूद इसके क्यों नहीं पाकिस्तान कंपकंपाया हुआ है? वह चौकियों के तबाह होने से, सर्जीकल स्ट्राईक से घबराया नहीं बल्कि कह रहा है कि ऐसा सबक सीखाएगे कि आने वाली पीढ़िया याद रखेगी! इसलिए तीन साल के जश्न, मोदीफेस्ट का आनंद लेते हुए विचारना है कि भारत के, इस उपमहाद्वीप की इतिहास ग्रंथि में याकि इस्लाम और हिंदू में क्या होने वाला है? पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के आज के अवतार में हम क्या चाहते हैं और लक्ष्य क्या बना है? जंग के बाद क्या तस्वीर होगी या जंग नहीं हुई और बिना जंग के सर्जिकल-शैडो युद्ध में हम मरते-खपते गए तो 21 वीं सदी का यह हिंदू भगवा कितना लाल होगा और कितना सफेद? चिंता कीजिए। विचार कीजिए, बेबाक, ईमानदारी से सोचिए। इसलिए कि बिना बुद्धि, बिना बेबाकी के कौम और राष्ट्र की नियति गुलामी है। बुद्धि को, निर्भीकता को कुंद कर न जिंदादिली बन सकती है और न चुनौतियों से लड़ने की हिम्मत पैदा हो सकती है। सो, मोदीफेस्ट और उसके उत्सव अपनी जगह। उसकी बातें, उसके गाने, उसका भांगड़ा अपनी जगह। उसे सुनें, समझे और अपने अनुभव, इर्द गिर्द की हकीकत के पैमानों पर तौल कर दिमाग में संजोए रखें। जब सब खत्म हो जाए तब विचार करें कि हम कहां-किस मुकाम पर हैं। और तब तक शायद उमड़ते-घुमड़ते जंग के बादल भी दिशा पा चुके हों जाहिर है मैं तो जंग के बादलों की गड़गड़हट से धड़क रहा हूं!
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