इधर सर कलम उधर पेट पर लात!

(image) दोनों घटनाएं पिछले सप्ताह की है। पाक सैनिकों से हुए दो सर कलम पर हम रोए, गुस्से में खदबदाए। सरकार से भरोसा सुना कि ईंट का जवाब पत्थर से देंगे। पर दूसरी खबर की अनदेखी हुई। मतलब कथित आईटी महाशक्ति भारत का डोनाल्ड ट्रंप के आगे सरेंडर! चार महीने के भीतर ही इंफोसिस ने डोनाल्ड ट्रंप के आगे घुटने टेके। बादशाह ट्रंप को खुश करने के लिए उसने दस हजार भारतीय नौजवानों की बजाय अमेरिका में अमेरिकीयों को नौकरी देने की घोषणा की। क्या यह छोटी खबर है? नहीं, यह उन नौजवानों के पेट पर लात है जिनकी भारत में संख्या और बेरोजगारी दोनों सुरसा की तरह बढ़ रही है। यदि भारत की आईटी कंपनियां विदेशी ग्राहक देशों की चिंता में विदेश में सेंटर खोलेगी, वहीं मंहगे वेतन पर रोजगार देगी, अपने आपको वहां की कंपनियों के आगे अप्रतिस्पर्धी होने दे कर सिकुड़ेगी, फिर भारत में छंटनी करेगी, देशी की तनख्वाह घटाएगी तो जो होगा, क्या उसका अनुमान है? दस तरह के असर होंगे। बेरोजगारी बनेगी, देशी पर अमेरिकीकर्मी वेतन, कमान के चलते प्रोजेक्ट लीडर बनेंगे और हैदराबाद, बेंगलुरू आदि के अपने देशी इंजीनियर बेहाली में जीएंगे। किसी भी तरह सोचंे इंफोसिस का सरेंडर हर मायने में भारत का, नौजवान पीढ़ी का, आईटी कंपनियों का, रोजगार के गंभीर भविष्य का प्रारंभ है। हैरानी अमेरिकी सिस्टम के कमाल पर है। डोनाल्ड ट्रंप को आए चार महिने हुए नहीं, उन्होंने डंडा पकड़ा नहीं कि भारत की महाबली आईटी कंपनियां रेंग गई। ट्रंप प्रशासन की यह धमकी कंपकंपी पैदा कर गई कि एच-1बी वीजा के दुरूपयोग की जांच होगी। छोड़ा नहीं जाएगा। सो पुष्ट खबर है कि इस बार भारतीय कंपनियों ने पिछले साल के मुकाबले वीजा कम मांगे। कॉगनिजांट ने आधे से कम संख्या में वीजा आवेदन किए। ऐसा ही विप्रो, इंफोसिस आदि ने किया। कॉगनिजांट और विप्रो, टीसीएस सब अब भारत से आईटीकर्मी भेज कर मजदूरी करवाने, मुनाफा कमाने से तौबा कर रहे हंै और अमेरिका में हायरिंग की चिंता में है। यह छोटी बात नहीं है। एच-1बी वीजा पर अमेरिका, योरोप जाने का आंध्र, तेलंगाना, कर्नाटक याकि पूरे देश के आईटी नौजवानों के लिए क्या मतलब है इसे हम और आप सामान्य नागरिक नहीं समझ सकते हंै। मगर यही जरिया था जिससे दुनिया में भारत के नौजवान के लिए काम के, खुशहाली के अवसर थे। यदि इस साल कंपनियों ने एच-1बी वीजा ही कम मांगा है तो विदेश में अवसर घटंेगे और कंपनियों में जो नियुक्त हैं वे आगे अमेरिकी सेलेरी वालों से कुंठित होंगे। यह दो टूक है कि चार महीने में डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की आईटी कंपनियों को झुका दिया है। भारत के आईटीकर्मियों के भविष्य और आगे की रोजगार संभावनाओं पर वार किया है! इसका अर्थ है कि यदि समय रहते विरोध नहीं हुआ, अमेरिका को झुकाने, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को भारत के लिए विशेष उदार नीति बनाने के लिए मजबूर नहीं किया तो अगले चार साल में भारत का आईटी उद्योग, आईटी कंपनियां दुनिया में ठोकरे खाने को मजबूर कर देगी। मौटे तौर पर पीवी नरसिंहराव और बिल क्लिंटन के वक्त मिली सहूलियतो से भारत में आईटी धंधे को, रोजगार को जो पंख लगे थे, उसकी रफ्तार अगले चार साल में फिलीपीन, विएतनाम के मुकाबले भी गई गुजरी बनेगी। हां, आपको पता नहीं होगा कि भारत में पेशेगत-संगठित रोजगार का नंबर एक जरिया आईटी क्षेत्र है। इस रोजगार में कंपीटिटर वे देश हंै जो भारत के मुकाबले और सस्ती कुलीगिरी को तैयार है। इसमें भारत के घोर कंपीटिटर फिलीपीन और विएतनाम है। आप सोच सकते हंै कि मैं कुलिगिरी शब्द का किस संदर्भ में इस्तेमाल कर रहा हूं? अपनी थीसिस है कि भारत आईटी महाशक्ति नहीं है बल्कि आईटी के कुलियो का नंबर एक ठिकाना है। उस नाते भारत दो सौ साल पहले जिस दशा में था उसी में आज भी है। तब भी अंग्रेज भारत से मजदूरों को फिजी, सूरीनाम, मारिशस, वेस्ट इंडिज, अफ्रिकी देशों में ले जा कर गन्ने की खेती करवाते थे और पिछले पच्चीस सालों से भी हम दुनिया को आईटी कुली सप्लाई कर रहे हंै। दुनिया का कुली बन कर , बैकआफिस बन कर, कॉल सेंटर बन कर, लेबर फोर्स मुहैया करा कर याकि पैदल सैनिक बन कर हमने, हमारी कंपनियों ने, परिवारों ने वैसे ही पैसा कमाया है जैसे अंग्रेजों के वक्त में यूपी-बिहार के श्रमजीवियों, खेतीहरों ने मारिशस, फीजी, सूरिनाम आदि देशों में गन्ने की खेती करके कमाया था या आईटी से पहले खाड़ी के देशों में मजदूरी कर एनआरआई पैसे का सिलसिला बना था।
चार महीने में डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की आईटी कंपनियों को झुका दिया है। भारत के आईटीकर्मियों के भविष्य और आगे की रोजगार संभावनाओं पर वार किया है! इसका अर्थ है कि यदि समय रहते विरोध नहीं हुआ, अमेरिका को झुकाने, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को भारत के लिए विशेष उदार नीति बनाने के लिए मजबूर नहीं किया  तो अगले चार साल में भारत का आईटी उद्योग, आईटी कंपनियां दुनिया में ठोकरे खाने को मजबूर कर देगी।
गन्ने की खेती हो या खाड़ी-अऱब देशों में कारीगरी या अमेरिका- योरोप के लिए आईटी सोल्यूशन, कॉल सेंटर, बैकआफिस के तमाम काम ऐसे है जो मालिक की जरूरत हो सकते है मगर अनिवार्यता नहीं। तभी सऊदी अरब, खाड़ी देशों की दशा खराब हुई तो भारतीय कर्मियों के साथ बुरा व्यवहार, खदेडने का सिलसिला शुरू हुआ और अब डोनाल्ड ट्रंप में हिम्मत है जो वे कह रहे हैं कि जैसे हम कहंेगे वैसे करो! सोचें, यदि भारत आईटी महाशक्ति है या महाशक्ति भी है तो डोनाल्ड ट्रंप और उनका प्रशासन क्या पहले यह नहीं सोचता कि एच-1बी वीजा से अमेरिका का जीना है न कि भारत की कंपनियों का। भारत की गरज करों न कि शर्ते थोपो! इंफोसिस, विप्रो, टीसीएस, कॉगनाजेंट आदि की ताकत को ले कर तब हिसाब बनना था कि हमारी इन कंपनियों से अमेरिका की सिलिकॉन वैली है न कि सिलिकोन वैली से हम है! मगर ट्रंप को, अमेरिका को, सिलिकॉन वैली को कुली भारत की जगह विएतनाम, फिलीपीन, बांग्लादेश से मिल जाएंगे। इसका सीधा अर्थ है कि हम सेवादार है न कि ओरिजन, मौलिक सर्जनकर्ता, निर्माता। नोट करके रखे कि सिलिकॉन वैली ने ही कंप्यूटर दिया, कंप्यूटर भाषा दी, माइक्रोसाफ्ट दिया, आईओएस, एपल, एंडियोड, पीएचपी, सैप याकि प्रोग्रामिग की भाषाएं, फ्रेमवर्क, औजार देने के मौलिक काम किए और उन आर्किटेक्चरों ने फिर कुलियों को ठेका दिया कि यह नक्शा लो, सामान लो और कोडिग करो। बैक आफिस बनो, ग्राहकों को संभालो। सुबह 8 बजे से रात दस बजे तक कंप्यूटर पर आंखे गढ़ाए मालिकों से आदेश लो, करेक्शन करों, डिलीवर करों और जो बना कर बेचा है उसकी देखरेख करों। यही है भारत की आईटी महाशक्ति का सत्व-तत्व! आप सहमत नहीं है? तो बताए कंप्यूटर, इंटरनेट किसने ईजाद किया? प्रोग्रामिग भाषाएं कहा बनी? फोन, स्मार्टफोन, उसकी आईओएस, एंड्रीयोड माहौल, भाषा कहा बनी? इनका दोहन कर प्राडक्ट बना कर दुनिया की वे महाबली कंपनिया कौन है जो देशो को, उनके राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों को याकि चीन के शी जिन से ले कर नरेंद्र मोदी को नचाने की ताकत रखती है? कौन है जिनके गूगल, फेसबुक, टिवटर का कश्मीर घाटी के पत्थर फेंकने वाले भी और आईएसआई के लड़ाके भी इस्तेमाल करते है?
भारत आईटी महाशक्ति नहीं है बल्कि आईटी के कुलियो का नंबर एक ठिकाना है। उस नाते भारत दो सौ साल पहले जिस दशा में था उसी में आज भी है। तब भी अंग्रेज भारत से मजदूरों को फिजी, सूरीनाम, मारिशस, वेस्ट इंडिज, अफ्रिकी देशों में ले जा कर गन्ने की खेती करवाते थे और पिछले पच्चीस सालों से भी हम दुनिया को आईटी कुली सप्लाई कर रहे है।
ये सब अमेरिका, सिलिकॉन घाटी में बने-पनपे वे मौलिक रचियता है, आईटी के सृष्टिकर्ता हंै जो अमेरिका की खाटी मौलिक पूंजी है तो डोनाल्ड ट्रंप का यह विश्वास भी है कि उन्हंे देश में रोजगार पैदा करने हंै तो भारत के कुलियों पर बैन लगाओ। भारत की कंपनियों पर हम निर्भर नहीं बल्कि उनकी हमसे कमाई है इसलिए उन्हंे नचा दो। यही आज आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, योरोप याकि तमाम विकसित देशों में फैल रहा ट्रेंड है और हम इसके आगे दबने, बरदास्त करने के लिए इसलिए मजबूर हंै क्योंकि हमारे यहा न मौलिकता है, न कोई सोचने वाला है। अन्यथा डोनाल्ड ट्रंप को जवाब देना, अमेरिका को नानी याद दिलाना, स्वदेशी झंडा उठाना, जैसे को तैसा जवाब देना मुश्किल काम नहीं है। दो जवानों के सर कलम करने का जवाब देने से ज्यादा अनिवार्य व आसान हजारों भारतीयों (भविष्य में लाखों) के पेट पर लात मारने के अमेरिकी कदम का जवाब देना है। ट्रंप यदि भारत के नौजवानों के पेट पर लात मार रहे है तो भारत के सवा अरब लोग हकीकत में अमेरिका को भी भूख से तड़पा सकते हंै? कैसे ? आप भी सोचिए। आखिर आपका भी कर्तव्य-दायित्व भारत के नौजवानों, पेट पर लात मारने की अमेरिकी करतूत का बदला लेने और स्वदेशीपने में सोचने का है! क्या नहीं?
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