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एनडीटीवी व प्रणय रॉयः तब और अब

(image) मैं एनडीटीवी को हिंदुओं का, भारत राष्ट्र राज्य का प्रतिनिधि संगठन मानता हूं। इसलिए कि भारत में टॉप पर तभी कोई पहुंच सकता है जब वह क्रोनी पूंजीवाद की सीढ़ी लिए हुए होता है। गोपी अरोड़ा के वक्त से लेकर मई 2014 तक प्रणय रॉय ने सरकार के प्रश्रय से जो प्राप्त किया उसकी अपने को भनक है। नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया ने एनडीटीवी को मीडिया में वैसे ही बनाया जैसे धीरूभाई अंबानी को, रिलायंस को इंदिरा गांधी, प्रणब ने धंधे में बनवाया। भारत में बिजनेस की हर सफल दास्तां के पीछे (आईटी अपवाद है) सत्ता और नेता का आशीर्वाद जरूरी है। दूसरा तथ्य है कि सत्तापरस्ती होती है तो हिंदू शेर होता है और ज्योंहि वह खत्म होती है तो फिर खौफ में जीता है,मेमना होता है। मेरी धारणा थी, है और मोदी राज के साथ दिनों दिन वह पुख्ता होती जा रही है कि 14 सौ साल की गुलामी ने हिंदुओं को इतना कायर, मूर्ख, डरपोक बनाया है कि वह बिना इस बोध के है कि स्वतंत्रता, स्वतंत्रचेता का क्या मोल है! सभ्यताओं के उत्थान पतन की वजह के इतिहास का निचोड़ है कि कौम को, देश को सत्ता नहीं, बल्कि नागरिक की निर्भीकता, निडरता, जिंदादिली, स्वतंत्रप्रियता ही विश्व गुरू बनाती है। दुर्भाग्य कि इस बात का संस्कार न आजादी के बाद नेहरू ने बनवाया और न आज का हिंदू राज बनवा रहा है। नेहरू ने सत्ता को माई बाप बनवाया, क्रोनी पूंजीवाद बनवाया, सत्ता से अपने लंगूर पैदा किए और मूर्खताओं का नैरेटिव बनवाया। भारत की त्रासदी है कि वक्त भले बदले पर इतिहास बार बार रिपीट होता है। इसलिए एनडीटीवी वहीं है, जो हम हिंदुओं का स्वभाव है। सत्ता के आशीर्वाद से प्रणय रॉय ने मीडिया उद्यम करके एनडीटीवी बनाया। सत्ता पीछे थी इसलिए उस सत्ता का सेकुलर आइडिया उसकी बुनावट थी और सत्ता ने ही उसमें वह हिम्मत पैदा की थी कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की काली, सफेद दाढ़ी में खून होने का कैंपेन चलाता रहा। अपन ने तब दो टूक लिखा था कि कांग्रेस की सत्ता और उसके लंगूर जो कर रहे हैं वह हिंदुओं के साथ ज्यादती है। भगवा आंतकवाद, फर्जी एनकाउंटर का नैरेटिव मुस्लिम आंतकवाद की हकीकत को जैसे दबा रहा है उसकी प्रतिक्रिया में हिंदू में मौन अंतरधारा बन रही है। वहीं हुआ! तभी 16 मई 2014 को चुनाव नतीजे आए तो एनडीटीवी सहित उन सभी सेकुलरों के तोते उड़ गए, जिनका सेकुलर धर्म सत्ता की बदौलत था। तब से लेकर अब तक एनडीटीवी और देश दिल्ली का पूरा मीडिया इस खौफ में है कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह के आगे कैसे कैसे लेटें! इसलिए कि हिंदू के लिए दिल्ली दरबार का मतलब लेटना ही है। सत्ता क्योंकि अब सांप्रदायिक हिंदू को ट्रांसफर हुई है सो, उसके लिए वह उन सब पर डंडे चलाएगी, जिनसे जीना दूभर हुआ था। दिल्ली दरबार की सत्ता मुगल, अंग्रेज, नेहरू, इंदिरा से मोदी के हाथ लगी है तो मोदी के लिए भी उसका वैसा ही उपयोग है, जैसे इंदिरा गांधी के लिए था। सत्ता ने 60 साल हिंदुओं को सेकुलर आइडिया में हांका तो अब क्यों न वह नरेंद्र मोदी, अमित शाह के गाय, भैंस में हिंदू को हांके। भारत की सत्ता का तो काम हांकना है। इसलिए कि भेड़ों की रैयत को बोध नहीं है कि कोई दुसरी दुनिया भी होती है। वह तो भेड़ कायदे में चलेगी। 14 सौ साल से जब रैयत में, गुलामी में, खौफ में रहने की आदत है तो लाठी प्राप्त सत्तावान भेड़ों को लठ्ट मार कर रैयत में रखेगा ही। मीडिया को गाने ही होंगे मोदी के भजन! इसलिए बदले वक्त में इतिहास महज रिपीट है। मीडिया अपवाद नहीं हो सकता। इमरजेंसी में मैंने कलम पकड़ी ही थी। तब जनता के मनोविश्व को बूझने की तंत्रिकाएं नहीं बनी थीं पर इतना तो तब भी महसूस हुआ था कि इतनी विशाल आबादी समूह कैसे अनुशासव पर्व में रेलों के समय पर चलने, फरार्टेदार विकास और 20 सूत्र में गरीबी खत्म होने की मूर्खता में है? बाद में हर सत्ता के साथ क्रोनी पूंजीवाद और मीडिया को सत्ता के हैंडल करने के तरीकों से जो साक्षात्कार हुआ तो उससे निष्कर्ष साफ बना कि इस राष्ट्र राज्य में हम हिंदुओं की नियति में गुलामी, खौफ व मूर्खता नैसर्गिक डीएनए है। मैं बहुत भटक गया हूं। पते की बात है कि सत्ता, तलवार, हाकिम ही इस देश का अवतारी भगवान है, जिसकी भक्ति, पूजा करनी होगी। उससे डर कर रहना होगा। यह अपना संस्कार है। इसके चलते एनडीटीवी ने मई 2014 से पहले खूब प्रसाद पाया। तभी प्रणय रॉय आजादी की बात न करें। यह गिला न रखें कि वह माहौल नहीं है, जो मई 2014 से पहले था। वह तो नहीं होगा क्योंकि अब मोदी, अमित शाह के हाथ में डंडा है। ऐसा होते हुए सेकुलर हिंदुओं का वह विशेषाधिकार क्यों बना रहे, जो मई 2014 से पहले था और तब कम्युनल याकि सफेद और काली दाढ़ी वाले हिंदुओं के पास वह नहीं था। तब, उस समय की सत्ता ने एनडीटीवी से मोदी और शाह को बदनाम करवाया। हिंदुओं को भगवा आंतकी बता उसकी बदनामी की। सो, अब मोदी और शाह यदि प्रणय रॉय के यहा छापे मार कर उन्हें उनकी औकात दिखला रहे हैं, उनकी बदनामी कर रहे हैं, सोशल मीडिया के हिंदू लंगूरों से गालियां दिलवा रहे हैं तो बाकी भेड़ें क्यों उनके लिए रोने बैठें? अपना तर्क है कि 25 साल प्रणय रॉय ने क्रोनी पूंजीवाद से संस्थान खड़ा किया। खूब मलाई खाई तो इतना दम तो होना चाहिए कि सत्ता परिवर्तन के खौफ में ये नहीं आते। 30 साल की कमाई पूंजी से क्या इनमें लड़ाई लड़ने की ताकत नहीं बनती? अपना यह सवाल हिंदू के अवचेतन में कायरता, खौफ के जिंस के पैठे होने की थीसिस का अहम सूत्र बन गया है। सोचें 60 साल की मलाई से भारत का सेकुलर मीडिया बना। टाइम्स ग्रुप, हिंदुस्तान टाइम्स, इंडिया टुडे, इंडियन एक्सप्रेस, एनडीटीवी जैसे अरबों, खरबों के महाबली मीडिया संस्थान बने। इनके पास इतना पैसा है, इतनी अथाह संपदा और संसाधन है कि इन्हें सत्ता की, सरकार की, नरेंद्र मोदी या अमित शाह की कृपा की जरूरत नहीं होनी चाहिए। पर हालात यह है कि टाइम्स समूह के मालिक विनित जैन को अमित शाह बुला कर हड़काते हैं तो पेंट गीली हो जाती है पूरा ग्रुप भड़वागीरी में उतर आता है और शोभना भारतीय, अरूण पुरी से लेकर एडीटर गिल्ड के तो कहने ही किया! सचमुच प्रणय रॉय पर छापे के बाद देश के कथित बड़े संपादकों के एडीटर गिल्ड ने छह लाइन में प्रेस की आजादी के दो वाक्य के साथ जो खानापूर्ति की है वह इतनी शर्मनाक है कि पूछो मत! यह फिर इस बात का प्रमाण है कि सौ करोड़ हिंदुओं की बात तो दूर, जिन लोगों को कौम की बौद्धिकता की, स्वतंत्रचेत्ता मशाल का मोल मालूम होना था उनमें इतनी मामूली हिम्मत भी नहीं हुई जो दस लाइनों का एक बेबाक बयान लिखते, जबकि तथ्य बता रहे हैं कि आईसीआईसी बैंक के बहाने एनडीटीवी पर छापेमारी का आधार पूरी तरह बेतुका, फर्जी और कायदों, नियमों के खिलाफ है। पर अरबों, खरबों वाला मीडिया भी तो सत्ता के क्रोनी पूंजीवाद की बदौलत है। उसका दिमाग भी तो 14 सौ साल की गुलामी व कायरता से गुंथा हुआ है। इसलिए एनडीटीवी और उनके बंदों, रोओ नहीं, तीस साल की मलाई को आजादी के संघर्ष में झोंको। तीन साल में ही चूं बोल गई! लड़ो, भिड़ो और बताओं की बौद्धिक जुगाली से उनमें बने हैं योद्धा होने के छटांक-दो छटांक संस्कार!

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