लाल पीले हो कर क्या करेंगे?

(image) कुलभूषण जाधव की खबर मानों नींद से जगाने वाली हो। तभी हम भारतीय हैरान, परेशान, गुस्साए दिख रहे हैं। भभक कर धमका रहे हैं कि यदि भारतीय नागरिक को फांसी हुई तो भारत ने चूडि़या नहीं पहन रखी है। देख लेंगे। ठोक देंगे। संसद में पार्टियों ने एकजुटता दिखाई। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज गरजी। पाकिस्तान की सैन्य अदालत की कार्रवाई को सोची समझी हत्या करार दिया। सोशल मीडिया में चला हुआ है कि पाक लादेन को छिपाता है और निर्दोषों को फाँसी देता है। उधर एक टीवी चैनल नेताओं को, बुद्धिजीवियों को चेताता मिला कि शर्म से डुब मरो। वह भारतीय को फांसी दे रहा है और तुम दिल्ली की आईआईसी में पाकिस्तानियों के साथ चाय पार्टी कर रहे हो। अब आप भी सोचंे कि इस सबका क्या अर्थ निकाले? क्या भारत राष्ट्र-राज्य की कूटनैतिक, खुफियाई एजेंसियों ने लापरवाही नहीं बरती जो पाकिस्तान की सेना ने जाधव पर मुकद्दमा चला डाला और हमें खबर भी नहीं हुई! खुफिया एजेंसियों और विदेश-रक्षा मंत्रालय के नेटवर्क को तो पाकिस्तानी सेना के इरादों की भनक होनी चाहिए थी। वहां की सेना के आगे नवाज शरीफ सरकार की औकात नहीं है या मीडिया और सिविल सोसायटी की पहुंच से परे सेना होने की बात अपनी जगह ठीक है। मगर भारतीय नागरिक कुलभूषण की गिरफ्तारी और उसे जासूस करार देने की खबर बहुत पहले आई थी। तभी से भारत के जासूसों की नजर रहनी थी और वहां मुकद्दमा चले या सजा हो उससे पहले ही कूटनैतिक, राजनैतिक, सैन्य आदि दबावों से कुलभूषण जाधव को बरी करा लेने का काम क्या नहीं होना चाहिए था? जाधव की गिरफ्तारी के साथ यह गलतफहमी या लापरवाही तो कतई नहीं होनी चाहिए थी कि पाकिस्तान इंसानियत दिखलाएगा। यही पेंच है। हम पाकिस्तान पर लाल पीले, हैरान-परेशान इसलिए होते हैं क्योंकि यह सोचते हैं कि वह भी हम जैसा राष्ट्र है। उससे सभ्य, दोस्ताना व्यवहार की उम्मीद की जा सकती है। जबकि पाकिस्तान 1947 से ले कर आज तक बेताल पच्चीसी का भूत है। भारत कुछ भी कर ले समाधान नहीं है। लाहौर की बस यात्रा कर डालों, वहां से कारगिल आएगा, कसाब आएगा। लाहौर जा कर नवाज शरीफ के घर पकौड़े खा लों वहां से आंतकी आएंगे। आप अमन के कबूतर उड़ाओं तो वह भारतीय को पकड़ कर, सैनिक को पकड़ कर उसे यातनाएं देगा। उसे जासूस करार दे मुकदमा चला फांसी पर लटका देगा। सचमुच हम याकि भारत राष्ट्र-राज्य शापित है उस भूत को पड़ौसी मानने को जो मानता है कि वह पड़ौसी नहीं है दुश्मन है! 14-15 अगस्त 1947 को दो पड़ौसियों का जन्म नहीं हुआ था बल्कि हजार साल के उस ऐतेहासिक द्वंद की नई नींव रखी गई थी जिसकी तासीर ही संघर्ष है। अपना मानना था और है कि इस पृथ्वी पर भारतीय उममहाद्वीप का जो क्षेत्र है उसके अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश की ही नियति में सर्वाधिक संर्घष लिखा हुआ है। इस क्षेत्र की नियति में द्वंद अनिवार्यता है। यह पश्चिम एशिया के इजराइल-फिलीस्तीन के लघु आकार का मेक्रो याकि वह वृहद रूप है जहां दो धर्म, दो सभ्यताएं राष्ट्र-राज्य के रूप लिए, इंसानी रूप लिए तब तक भिड़ी रहेगी जब तक सांप-नेवले की तरह लड़ते हुए खत्म न हो। इस बात का मतलब आज के संदर्भ में अफगानिस्तान, पाकिस्तान के तालिबानीकरण, कश्मीर घाटी के हालात और बेगम हसीना के बावजूद बांग्लादेंश में पसरते उग्रवादियों का भयावही सिनेरियो भी है। हाल ही मैंने सन्ा् 2050 में इस भूभाग की आबादी के आंकड़े देखे। 76 प्रतिशत हिंदू आबादी के अनुमान के बीच 30 करोड़ भारतीय मुसलमान सहित पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान की कोई 45 करोड़ मुस्लिम आबादी के परस्पर रिश्ते में जो अनुपात उभरता है वह यह गंभीर यक्ष प्रश्न लिए हुए है कि अंततः होगा क्या? अपना जवाब है वही सनातनी, स्थाई संर्घष! सो कुलभूषण जाधव इस संघर्ष में शिकार हुआ एक मौहरा है। कल टीवी चैनलों पर पाकिस्तानी प्रवक्ता कह रहे थे कि हम मार रहे तो क्या तुम लोग कश्मीर में नहीं मार रहे हो! पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने कहा कि भारत कश्मीर में बेगुनाह लोगों की पूर्व नियोजित हत्या कर रहा है। वहां के दैनिक 'द नेशन' ने लिखा है कि इस फ़ैसले के बाद पाकिस्तान जैसे क़ानून-परस्त देश की अंधी आलोचना करना भारत को शोभा नहीं देता। लोग बहस कर सकते हैं कि इसके बाद दोनों देशों के बीच शांति प्रक्रिया पर असर पड़ेगा। लेकिन सच ये है कि ऐसी कोई शांति प्रक्रिया चल ही नहीं रही है। पाकिस्तान के एक और अखबार औसफ़ ने लिखा कि सज़ा मुकम्मल करने में अब ज़रा भी देरी नहीं होनी चाहिए। किसी भी तरह के अंदरूनी या बाहरी दबाव में नहीं आना चाहिए। ये तेंवर सबूत है कि पाकिस्तान को भारत के बदले की कार्रवाई की रत्ती भर चिंता नहीं है। हम कितने ही हैरान, परेशान और गुस्साए हुए हो उसका पाकिस्तान की सेहत पर असर नहीं होना है। ध्यान रहे जाधव को पाकिस्तान ने मार्च 2016 में गिरफ़्तार किया था। साल भर में याकि इस 10 अप्रैल 2017 को सैन्य अदालत ने मौत की सज़ा दी है। यह कहते हुए कि उसने अपना जुर्म माना कि उसे भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ ने साज़िश के लिए पाकिस्तान भेजा था ताकि वो कराची और बलूचिस्तान में गड़बड़ी फैला सके। भारत ने इन सब बातों को झूठा बताया है। अपनी सरकार का तर्क है कि मुकदमा सार्वजनिक जानकारी में होता। भारत को तथ्य दिए जाते। दुश्मनों के बीच भी इंसानियत के जो कायदे है उनकी पाकिस्तान पालना करता। पर कायदे के चलते और कायदे में पाकिस्तान नहीं बना है! पाकिस्तान एक जिद्द और जुनून की बदौलत है तो वह अपने व्यवहार में न पड़ौसीपना ला सकता है और न इंसानियत। वह तो जैसा है वैसा रहेगा। यह भारत की समस्या है उसकी नहीं। तभी उसका कोई प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बस यात्रा नहीं करता। वे पकौड़े खाने दिल्ली नहीं आते। वे हजार साल जंग की कसम खाते हैं। घास खा कर एटमी हथियार बनवाते हंै और अमन के लिए चली बस सेवा से पैसे भिजवा कर घाटी में पत्थर फिकवाते हैं। याद करें हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलूचिस्तान का जिक्र कर नानी याद कराने के तेंवर दिखाए थे। क्या हुआ पता नहीं। पर साल भर में पाकिस्तान ने जरूर कश्मीर घाटी में आज नौबत ला दी कि एक उपचुनाव करवाने में भी भारत राष्ट्र-राज्य समर्थ नहीं है!
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