Loading... Please wait...

दिल से, मोदी का शुक्रिया!

फिर सुबह, फिर लिखने बैठना और फिर सोचना! हम लिखने वालों, सोचने वालों का यह नित्य कर्म हर सुबह सवाल लिए होता है कि आज क्या? पर नरेंद्र मोदी का भला हो, उनका घन्यवाद कि उन्होने तीन सालों में भारत की इतनी परते उघेड़ी है कि नस्ल की,हिंदुओं की सरंचना, उसका डीएनए नित नए रूप से उदघाटित स्वयंस्फूर्त होता है। मैं  मानता हूं, मेरे कई पाठक बताते है कि तीन वर्षों में नरेंद्र मोदी की बदौलत मेरे पर ऐसी कुछ कृपा हुई है कि लोग कहते है मैं दम से, दृष्टि से लिख रहा हूं। संदेह नहीं नरेंद्र मोदी से मेरी आंखे खुली है। नरेंद्र मोदी हर सुबह इस विषय के सतरंगी रूप पेश किए हुए होते है कि यह देश ऐसा कैसे है? हम हिंदू ऐसे कैसे है? यों मोदी के राज में भारत की सुबह मीडियाकर्मी के लिए सिर्फ एक ही कैनवस लिए होती है। वह यह कि आज कैसे आरती उतारे? आज मोदीजी की मूर्ति का कैसे श्रृंगार हो? 

अब लिखते बैठते ही ऐसी बात निकलना नरेंद्र मोदी की कृपा की बदौलत है। मोदी ने अपने आपको जन-जन के मन मंदिर में ऐसा पैंठाया है कि और कुछ सोचने का विषय नहीं बनता। इसलिए सुबह की आरती हो, सन्ध्या आरती हो या रात्रि का निशाचारी आनंद, सबमें नरेंद्र मोदी की ही मूर्ति भक्तों के आगे होगी। मैंने कल सुबह जब संसद के सेंट्रल हॉल में जीएसटी कार्यक्रम में बजी बीन को पढ़ा, सुना तो सुबह इसी सोच से शुरू हुई कि नरेंद्र मोदी ने क्या अपने आपको गांधी, नेहरू पटेल तीनों की मूर्तियों से बडी मूर्ति नहीं बना डाला। दस-पंद्रह साल बाद यह देश जब उनकी मूर्ति लगाएगा तो पटेल की मूर्ति का सरदार सरोवर, छत्रपति शिवाजी की मूर्ति का अरब सागर भी छोटा पडेगा। 32 करोड मूर्तियां एक तरफ और नरेंद्र मोदी की अकेली मूर्ति हिमालय का फैलाव और एवरेस्ट की ऊंचाई लिए हुए होगी!

वाह! क्या बात निकली। प्रमाण है कि नरेंद्र मोदी से मेरे पर विचार करने की छप्पर फाड ईश्वरीय कृपा हुई है तो हिंदूओं के लिए भी नई मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा का छप्पर फाड़ जज्बा बना है। पर मैं ब्राह्यण होते हुए भी कर्मकांडी नहीं हूं। मेरा मंदिर मेरे मन की आस्था है और दिमाग का अध्यात्म है। मैंरे लिए मंदिर का प्रसाद गले उतारना मुश्किल होता है। मूर्ति की मान्यता, उसकी भव्यता,श्रृंगार का उसका अंदाज ईश्नरीय लीला के रस जरूर बिखेरती है लेकिन उसके आगे फिर दिमाग सनातनी हिंदू माफिक बौद्विक तर्क-कुतर्क में घूमता है। मुझे हिंदू होने का गौरव इसलिए है क्योंकि मैं अपने को आजाद मानता हूं। मूर्ति से बंधे होने के बावजूद हम हिंदूओं के पास विकल्प होता है कि इस मूर्ति से भला नहीं तो दूसरे मंदिर को अपना लो। यदि किसी भी मंदिर से कृपा नहीं नहीं तो अपने मन को मंदिर बना डालो। इसलिए कि मूर्ति से परे प्रकृति के, जीवन के सत्व-तत्व की भी हम हिंदूओं ने व्याख्याएं की हुई है। समझी हुई है। और उन सबकी दस तरह से विवेचनाएं है।  

सचमुच यह वह सनातनी हिंदू की, आदि हिंदू ऋषियों की वह चिरंतन धारा है जिसके कारण हिंदू होने के गौरव की अनुभूति अवर्णनीय है। इससे आगे और इसके चलते ही फिर गडबड शुरू होती है। सवाल बनता है  कि ऐसा अस्तित्व, धरोहर, समझ होते हुए भी इतिहास ने हमारा डीएनए क्यों गडबड बना डाला। इतिहास की गडबडी और उसके अंधेरे वक्त की प्रतिछाया से हमारा चेतन, अवचेतन अब मुक्त हुआ या नहीं? अब हम किस दशा में है? क्यों और ऐसा कब तक? 

मैं भटक गया हूं। कहां से कहां जा पहुंचा हूं! फिलहाल नरेंद्र मोदी को शुक्रिया है। इसलिए कि वे हर दिन नई बांसुरी के साथ नए सुर में हम हिंदुओं को जैसे नचा दे रहे है, जो नित नई झांकिया दिखलाते है उस सबकी लीला ने मुझे मंदिर से दूर, मंदिर से बाहर खडे रह कर भी विचार के लिए जैसे उत्प्रेरित किया हुआ है वह कल्पनातीक है। वे क्या –क्या माया रच रहे है और उस माया पर लिखना क्या गजब दिमाग खंपाना है।  

सोचें आधी रात के उत्सव पर!  ससुरी जीएसटी भी भगवत्ा् गीता के 18 अध्याय की पर्याय हो गई। मेरी मूर्खता जो मैंने यह विहंगम रूप नहीं समझा! इसमें 500 रियासतों के विलय का सरदार पटेल का कर्म भी समाहित है तो नेहरू और गांधी के सपने भी समाए और जीएसटी के देशी संस्करण ने दुनिया की सर्वाधिक सरल, पारदर्शी टैक्स व्यवस्था अपनी बनवा डाली। मानो आधी रात में संसद का सेंट्रल हॉल पूरे भारत के लिए तिरूपति मंदिर का गर्भगृह बना था और जिसने भी उसे देखा वह आरती के विहंगम दृश्य से चमत्कृत हो बोल उठा वाह मोदी वाह! 

यही प्रभु की लीला है। आधी रात के अंधेरे में खुदी जीएसटी की सुरंग से मैं भले भारत को न बनता देखू पर हिंदू तो देख रहा है वैसे ही जैसे नोटबंदी से भारत बना दिखा है, देखा है! 

तभी आज की सुबह, फिर विचार के नित्य कर्म में आधी रात का सपना है। जो आधी रात में हुआ क्या वह किसी कौम का उजियारा हो सकता है? जो हो रहा है वह है क्या? 

जान ले, यह सोचना ही मेरे लिए नरेंद्र मोदी की बदौलत है। नरेंद्र मोदी वह वजह है जिससे हर सुबह पिछले दिन की घटनाओं को पढ़, सुन दिल इस बौद्विक विचार, आलाप में विचरता है कि अर्थ क्या इसका? हिसाब से भारत को ले कर यह यक्ष प्रश्न पुरी दुनिया में रहा है कि इन लोगों का अर्थ क्या है? तथ्य है कि दुनिया की बाकि सभ्यताओं, राष्ट्र-राज्यों के लिए भारत के हम हिंदू अबूझ पहेली थे और है। जिन्हे हम सबसे करीबि मानते है वे भी गले मिलते हुए मन ही मन सवाल लिए हुए होते है कि ये है क्या! दुनिया की मोटी धारणा भारत को सपेरों का देश मानने की रही है। हिंदू बतौर अंधविश्वासी, जादू-टोनों, चमत्कार में जीने वाले माने जाते है। दुनिया के लिए हमारे 32 करोड देवी-देवता और उनकी कृपा अजूबा रहा है।  

तभी आज फिर निष्कर्ष बन रहा है कि हम हिंदुओं ने नरेंद्र मोदी के रूप में वह मूर्ति पा ली है जिसमें सभी 32 करोड़ मूर्तियों की ताकत समाहित है। वे भगवान विष्णु जैसे सृष्टि निर्माता है। हर-हर महादेव वाले त्रिकालदर्शी है। राम की मर्यादाएं लिए हुए है तो कृष्ण की बांसुरी, लीला भी रचे हुए है और इसी के चलते 18 अध्यायों वाली, 18 सत्रों की देववाणी से निकली नई गीता, जीएसटी रच गई है!  

हिंदू धन्य है। उनका अहोभाग्य! देखिए, मैं अंधेरा देख रहा था पर भगवद् गीता का नया रूप, कृष्ण के नए अवतार का कैसा नया उजियारा,  चमत्कार हुआ है। 

यह भी सोचिए कि ऐसे सोचने और लिखने की प्रेरणा का उत्प्रेरक कौन है? नरेंद्र मोदी! तभी सुबह मन हुआ दिल से नरेंद्र मोदी का आभार, धन्यवाद व्यक्त हो! वाह मोदीजी, आप भागवत रच दे रहे है तो मुझे भी महाभारत लिखने को मिल रही है!

Tags: , , , , , , , , , , , ,

1070 Views

आगे यह भी पढ़े

सर्वाधिक पढ़ी जा रही हालिया पोस्ट

बेटी को लेकर यमुना में कूदा पिता

उत्तर प्रदेश में हमीरपुर शहर के पत्नी और पढ़ें...

पाक सेना प्रमुख करेंगे जाधव पर फैसला!

पाकिस्तान की जेल में बंद भारतीय और पढ़ें...

© 2016 nayaindia digital pvt.ltd.
Maintained by Netleon Technologies Pvt Ltd