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त्रासदी और इस सबके पीछे कौन जिम्मेदार?

पिछले सोमवार को जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में बस से अमरनाथ जा रहे शिव-भक्तों पर आतंकी हमला हुआ, वह बिल्कुल भी अनपेक्षित नहीं था। इस घटना को लेकर राजनीतिक दलों से लेकर समाज के अन्य सभी वर्गों ने जो प्रतिक्रिया दी, वह भी उम्मीद के मुताबिक ही रही। तीर्थ यात्रियों पर हुए कायराना आतंकी हमले को निंदनीय, कश्मीरियत और कश्मीर की आत्मा पर हमला बताया गया, जिसमें केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, प्रदेश की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के वक्तव्य प्रमुख है। 

इस्लामी आतंकवाद एक सच्चाई है, जिसका दंश आज न केवल भारत अपितु समस्त विश्व अलग-अलग और विकराल रुपों में झेल रहा है। इस्लामी कट्टरता के विकृत स्वरुपों में लव-जिहाद, जो मतांतरण का उपयोगी अस्त्र है, उसे देश-विदेश के तथाकथित उदारवादी और प्रगतिवादी आज भी मिथक व काल्पनिक बताने का प्रयास कर रहे है। अनंतनाग से ही गिरफ्तार हुआ आतंकवादी आदिल (संदीप), लव-जिहाद के अस्तित्व का एक और प्रत्यक्ष व जीवंत प्रमाण है। 

आदिल (संदीप) पेशेवर छोटा-मोटा अपराधी था, जो हत्या, लूट व डकैती में लिप्त रहा है। सार्वजनिक विमर्श में केवल उसके अतीत का बार-बार उल्लेख किया जा रहा है। कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह जैसे छद्म-पंथनिरपेक्षकों के साथ-साथ अधिकतर मीडिया, आतंकवादी आदिल को हिंदू बताकर फिर से "हिंदू आतंकवाद" का हौव्वा खड़ा करने का प्रयास कर रहा है। जब प्रसिद्ध गायक और संगीतकार ए.आर रहमान का जिक्र होता है, जिनका जन्म का नाम ए.एस दिलीप कुमार था, तब हम मतांतरण से पूर्व उनकी पहचान पर बल क्यों नहीं देते? यदि ए.एस दिलीप कुमार की एकमात्र पहचान केवल रहमान है, तो आदिल की मतांतरण से पूर्व की पहचान पर चर्चा क्यों हो रही है? आदिल आतंकवादी अपनी अपराधिक प्रवृतियों से नहीं, बल्कि इस्लाम में मतांतरण के बाद बना है। 

पश्चिमी उत्तरप्रदेश में मुजफ्फरनगर का निवासी संदीप शर्मा 2012 में रोजगार की तलाश में कश्मीर आया था और यहां वैलडिंग का काम करने लगा। इस दौरान संदीप एक मुस्लिम लड़की के प्रेमजाल में फंस गया। जब बात शादी तक पहुंची, तब संदीप के सामने उस लड़की ने इस्लाम अपनाने की शर्त रखी। मतांतरण के बाद संदीप शर्मा का नाम आदिल हो गया और वह किसी सामान्य मुस्लिम की भांति मस्जिद में नमाज अता करते हुए कुरान में लिखी आयतों का उच्चारण करने लगा। 

कश्मीर के विषाक्त वातावरण में एक मुस्लिम लड़की का गैर-इस्लामी संदीप, जोकि वैलडिंग का काम करता था, उसके साथ प्रेम-प्रसंग, इस्लाम में उसका मतांतरण और फिर उस लश्कर-ए-तैय्यबा आतंकी संगठन से जुड़ना, जिसका एकमात्र उद्देश्य गजवा-ए-हिंद अर्थात् भारत में काफिरों (हिंदुओं) पर किसी भी तरह विजय प्राप्त कर यहां निजाम-ए-मुस्तफा स्थापित करना है- क्या यह सुनियोजित षड़यंत्र की कड़ियां मात्र नहीं? 

बात केवल आदिल (संदीप) तक सीमित नहीं है। केरल में गत वर्ष लापता हुए 21 लोगों में से कई ऐसे मुसलमान भी थे, जिन्हे प्यार के नाम पर धोखे से इस्लाम मतांतरित कर इराक भेज दिया गया, जिसमें कुछ महिलाएं भी थी। 

वर्ष 2004 को गुजरात पुलिस की मुठभेड़ में इशरतजहां सहित चार लश्कर आतंकी मारे गए थे। वह सभी तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की योजना बना रहे थे। इन्हीं आतंकियों में जावेद गुलाम शेख भी लव-जिहाद का शिकार और इस्लाम मतांतरित था। जावेद मूल रुप से हिंदू था और उसका असली नाम प्रनेश पिल्लई था। पिता गोपीनाथ पिल्लई के अनुसार, उनके बेटे की पुणे में साजिदा नाम की मुस्लिम लड़की से दोस्ती थी। मुंबई में नौकरी के बाद भी वह हर सप्ताहांत पुणे आता और अधिकतर समय साजिदा के घर रुकता। जब मित्रता का रंग गहरा हुआ और दोस्ती प्यार में परिवर्तित हुई, तब साजिदा ने प्रनेश पर निकाह के लिए इस्लाम कबूल करने का दवाब डाला। मतांतरण के बाद प्रनेश, जावेद गुलाम शेख बन गया। यहां से उसे इस्लाम के उस स्वरुप से रुबरु कराया गया, जो "काफिर-कुफ्र" के दर्शन पर आधारित था। प्रनेश उर्फ जावेद का अंत लश्कर की उस आतंकी इशरतजहां के साथ हुआ, जिसके लिए देश के स्वघोषित सेकुलरिस्टों ने वोटबैंक के लिए आंसू तक बहाए। यदि पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रमुख शासकों, राजनेताओं और व्यक्तियों का इतिहास खंगाला जाए, तो उनकी जड़े भी भारत की मूल सनातनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी मिलेंगी। किंतु उनके पूर्वजों के इस्लाम में मतांतरण के बाद उनकी सभी जड़े कट गई। 

लगभग हम सभी भारतवासी स्वामी विवेकानंद के प्रति श्रद्धा का भाव रखते है। वह न केवल प्रख्यात समाज सुधारक थे, साथ ही इतिहास पर भी उनकी दृष्टि काफी पैनी थी। अप्रैल 1899 में "प्रबुद्ध भारत" पत्रिका के संपादक के साथ गंगा नदी के तट पर साक्षात्कार करते हुए स्वामी विवेकानंदजी ने हिंदू मतांतरण पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी, जो वर्तमान परिदृश्य में प्रासंगिक है। उनके अनुसार, "जब हिंदू समाज का एक सदस्य मतांतरण करता है, तो समुदाय में एक संख्या कम नहीं होती, बल्कि हिंदू समाज का एक शत्रु बढ़ जाता है।" - द कंपलीट वर्क ऑफ स्वामी विवेकानंद- खंड पांच- पृष्ठ संख्या- 233। संदीप-प्रनेश के मतांतरण के बाद का व्यवहार स्वामीजी की उपरोक्त उक्ति को सही ठहराता है। 

अमरनाथ तीर्थ यात्रियों पर आतंकी हमले को कश्मीरियत पर चोट की संज्ञा दी जा रही है। किंतु कड़वी सच्चाई तो यह है कि घाटी में कश्मीरियत तभी दफन हो गई थी, जब जिहादियों ने कश्मीर की मूल संस्कृति और उसके जीवंत ध्वजावाहकों के खिलाफ रक्तरंजित मजहबी अभियान छेड़ा था और तत्कालीन सरकारें मौन थी। यह विडंबना ही है कि इस भीषण क्षति की पूर्ति ढाई दशक बाद भी संभव नहीं हो पाई है। 

कश्मीर में असंतोष का कारण गरीबी, विकास न होना और बेरोजगारी में नहीं, बल्कि कट्टर इस्लाम के प्रति उस प्रतिबद्धता में छिपी है, जो 7वीं शताब्दी से अबतक अपरिवर्तित है। इस लंबे सफर में उस विषाक्त चिंतन ने कश्मीर में केवल अपना नाम और चेहरा बदला है। वर्ष 1931 में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में मुस्लिमों का कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह के कथित सामंतवाद के विरुद्ध संघर्ष हो। अगस्त 1947 में मजहब के आधार पर भारत का बंटवारा हो। अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान के कश्मीर पर हमले में अधिकतर रियासती मुस्लिम सैनिकों की तात्कालीन रियासत से गद्दारी हो। घाटी में पूर्ण स्वायत्तता हेतु आंदोलन हो। 1980-90 के कालखंड में कश्मीरी पंडितों पर जिहादियों का दमन हो। 2000 के बाद कश्मीर में भारतीय सेना के तथाकथित शोषण के खिलाफ जन-आक्रोश हो। वर्तमान समय में आए दिन होते आतंकी हमले या फिर जिहादियों को ठिकाने लगा रही भारतीय सेना पर पत्थरबाजी हो। सभी उपरोक्त घटनाक्रम उस दर्शन की कड़ियां है, जो भारत की कालजयी संस्कृति और बहुलतावाद को "कुफ्र" मानकर खत्म करना अपना दायित्व समझते है। अमरनाथ जा रहे तीर्थ यात्रियों पर आतंकी हमला, उसी का एक हिस्सा है। 

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी कहते है, "प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों के कारण कश्मीर में आतंकियों को जगह मिली है।" क्या यह सत्य नहीं कश्मीर की स्थिति के लिए पं.नेहरु की घोर सांप्रदायिकवादी शेख अब्दुल्ला से मित्रता, दोनों का जम्मू-कश्मीर के अंतिम महाराजा हरिसिंह से बैरभाव, नेहरुवादी कांग्रेस सरकार की नीतियां और जिहादियों व अलगाववादियों से सहानुभूति जिम्मेदार नहीं है? 

यह देश का दुर्भाग्य है कि भारत में जब-जब कट्टर इस्लामी शक्तियां बलवित हुई, देश के तत्कालीन नेतृत्व और सत्ता-अधिष्ठानों ने उसे कुचलने के बजाय उससे समझौता करना उचित समझा। पाकिस्तान का निर्माण और कश्मीर की दयनीय स्थिति उसकी तार्किक परिणति है। क्या इतिहास में घटित हिमालयी गलतियों को कश्मीर में आए दिन होने वाले आतंकी हमलों से अलग करके देखा जा सकता है? 

मैं पाठकों से पूछना चाहता हूं, यदि भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकतर मुसलमानों के हिंदू पूर्वजों ने इस्लामी आक्रांताओं की तलवार के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया होता, तो क्या आज विश्व में पाकिस्तान और बांग्लादेश का अस्तित्व होता या इस भू-भाग में हिंदू-मुस्लिम समस्या होती? 

आवश्यकता इस बात की है कि भारत महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, सभी सिख गुरुओं और इस श्रृंखला में आने वाले उन सभी महापुरुषों का अनुसरण करें, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर इस धरती की बहुलतावादी संस्कृति को सुरक्षित रखा। यदि वह सभी हथियार नहीं उठाते और बाकियों की तरह विदेशी शक्तियों के सामने नतमस्तक हो जाते या अपना मजहब बदल लेते तो भारत निश्चित रुप से आज पाकिस्तान और अफगानिस्तान का भाग या उसका एक संस्करण होता। जहां शरीयत का राज होता और गैर-मुस्लिमों के लिए दोयम दर्जे की नागरिकता या मौत अंतिम विकल्प होता।

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