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राहुल का असली संघर्ष अब शुरू

सुशांत कुमार
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राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना अब सिर्फ औपचारिकता है। अगले हफ्ते इसकी घोषणा घोषणा हो जाएगी। 13 साल की सक्रिय राजनीति के बाद राहुल 132 साल पुरानी कांग्रेस की कमान संभाल रहे हैं। उनके साथ कई ऐसी बातें जुड़ी हैं, जिनसे उनका अध्यक्ष बनना खास हो जाता है। 

गांधी परिवार हमेशा कांग्रेस नेताओं की उम्मीदों का आधार रहा है। वे हमेशा इस परिवार के नेताओं के करिश्मे के दम पर सत्ता हासिल करते रहे हैं। कांग्रेस के बारे में कहा जाता है कि वह या तो सत्ता में रहती है या सत्ता का इंतजार करती रहती है। यानी उसे विपक्षी पार्टी के रूप में काम करने का तरीका नहीं आता है। 

ऐसा लग रहा है कि राहुल गांधी ने विपक्ष की राजनीति का तरीका सीखा है। वे अपनी पार्टी की सरकार के समय भी कई बार विपक्षी नेता की तरह काम करते थे और रही सही चीजें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की आक्रामक राजनीति ने सीखा दी है। 

अब एक तरफ कांग्रेस नेताओं की उम्मीदें हैं और दूसरी ओर भाजपा का आक्रामक और बेहद लोकप्रिय नेतृत्व, राहुल को इन दोनों से निपटना है। 

राहुल गांधी संभवतः सबसे बड़ी चुनौती के समय कांग्रेस अध्यक्ष बने हैं। पार्टी के लोकसभा में सिर्फ 45 सांसद हैं और राज्यसभा में भी वह दूसरे नंबर की पार्टी हो गई है। राज्यों में एक एक करके कांग्रेस की सरकारें चली गई हैं। अब गिनती के राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। उनकी तुलना अपनी मां सोनिया गांधी के कार्यकाल से भी होगी। 

सोनिया ने अध्यक्ष पद संभालने के बाद 19 साल में कांग्रेस को लोकसभा के दो चुनाव जिताए हैं और 26 राज्यों में कांग्रेस को जीत दिलाई। लेकिन राहुल के साथ उलटा है। हालांकि 2009 के लोकसभा चुनाव में जीत का श्रेय उनको दिया जाता है, पर आधिकारिक रूप से वह जीत सोनिया के खाते में दर्ज होती है। 

उस समय राहुल महासचिव थे और उन्होंने करीब डेढ़ सौ सभाएं की थीं। पर एक तथ्य यह भी है कि 2013 में उपाध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस के स्टार प्रचारक के रूप में उन्होंने 27 विधानसभा चुनावों में प्रचार किया है, जिसमें से कांग्रेस सिर्फ सात में जीती और 20 में हारी। 

सो, उनके ऊपर विफल नेता का ठप्पा लगा है। भाजपा उनको कमजोर नेता के रूप में प्रचारित करती है। उन्हें यह दोनों छवि तोड़ने के लिए काम करना होगा। 

राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने की टाइमिंग बहुत खास है। इस समय दो राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में वोटिंग हो चुकी है और गुजरात में नौ व 14 दिसंबर को वोट डाले जाएंगे। इनके नतीजों से ठीक पहले वे अध्यक्ष बन रहे हैं इसे उनका साहस माना जाएगा। इसके अलावा अगले डेढ़, दो साल में लोकसभा के अलावा 12 से ज्यादा राज्यों के विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। 

सो, राहुल के पास अब करीब डेढ़ साल का समय है कि वे कांग्रेस को इन चुनावों के लिए तैयार करें और उसे मुख्यधारा में वापस लाए। इसी तरह से वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के नारे को जवाब दे पाएंगे। 

उनके लिए यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अगर वे सफल नहीं हुए तो पार्टी के भीतर भी उनके नेतृत्व को चुनौती मिलेगी। अगर वे चमत्कार नहीं दिखा पाते हैं तो सत्ता की उम्मीद लगाए बैठे कांग्रेस के नेता प्रियंका लाओ, कांग्रेस बचाओ का नारा देने लगेंगे और तब बाहरी और भीतरी दोनों मोर्चों पर लड़ना राहुल के लिए आसान नहीं होगा। 

कांग्रेस में इस समय मूड उत्साह का है। इसका कारण गुजरात विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी  को मिल रहा रिस्पांस है। प्रदेश के चुनाव में कांग्रेस एक बड़ी चुनौती के रूप में भाजपा के सामने खड़ी हुई है। सबसे ताजा चुनाव पूर्व सर्वेक्षण ने दोनों पार्टियों के बीच लगभग बराबर की लड़ाई बताई है। 

यह लड़ाई प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई है। राहुल गांधी अकेले दोनों नेताओं की लोकप्रियता और रणनीति का जवाब दे रहे हैं। अगर कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो अध्यक्ष के नाते माना जाएगा कि राहुल की पारी की अच्छी शुरुआत हुई। 

इसके बाद कांग्रेस नेताओं को भाजपा विरोधी पार्टियों के बीच भी राहुल का नेतृत्व स्थापित कराने में दिक्कत नहीं होगी। इस समय सेकुलर गठबंधन की सभी पार्टियां गुजरात चुनाव के नतीजों पर नजर लगा हुए हैं। उसके बाद ही देश भर में भाजपा विरोधी पार्टियों का गठबंधन बनेगा। सो, यह लगभग तय है कि राहुल की कमान में कांग्रेस और आक्रामक होगी और भाजपा व केंद्र सरकार के साथ उसका टकराव बढ़ेगा। 

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