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गाय और राजनीति

शंकर शरण
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अभी जब डॉ. सुब्रहमण्यम स्वामी ने देश में गोहत्या बन्द कराने के लिए कानून बनाने का प्रस्ताव संसद में रखा, तो दिल्ली के एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने कार्टून छापा। उस में मजाक था कि ‘हार्वर्ड विश्वविद्यालय से प्रशिक्षित डॉ. स्वामी ने गोरक्षा का बिल विचार के लिए रखा’। भावार्थ था कि हार्वर्ड से पढ़ा-पढ़ाया विद्वान भी कैसा हास्यास्पद काम कर रहा है!

कमाल की बात है कि यही अंग्रेजी अखबार, बल्कि हमारे तमाम आधुनिक, सेक्यूलर-लिबरल बौद्धिक कुत्ते के प्रति प्रेम को बड़ा सम्मान देते हैं। कुत्ते के लिए भोजन, कपड़े, आदि पर बाकायदा अकादमिक सांस्कृतिक गतिविधियाँ चलती हैं। जबकि गाय के प्रति प्रेम, गाय की रक्षा उन्हीं के लिए हँसने और व्यंग्य का विषय है। यह दोहरापन पश्चिमी जीवन-शैली की मानसिक गुलामी है या मतिहीनता? 

वरना ऐसा मजाक नहीं उड़ाया गया होता। भारत की महान सांस्कृतिक परंपरा में गोप्रेम, गोपूजा का महत्वपूर्ण स्थान है। इसीलिए संविधान में भी गोरक्षा को राज्य का एक कर्तव्य रखा गया है। यह सब भूलने वाले या न जानने वाले बौद्धिक प्रमादग्रस्त हैं। उन में हर चीज को दलीय और जाने-अनजाने हिन्दू-विरोधी राजनीति से देखने की आदत है।

अन्यथा, भारत में गो-ब्राह्मण की रक्षा सदैव शासकों का निर्विवाद कर्तव्य था। यह ‘भारत के धर्म’ का अभिन्न अंग रहा है। यह शब्दावली कार्ल मार्क्स की है - यानी जिसे विदेशी लोग भी भारत का धर्म समझते हैं। वह स्थिति आज भी नहीं बदली। बाहरी रिलीजनों के आक्रमण, जोर-जबर्दस्ती और दुष्प्रचार के बावजूद आज भी भारतीय समाज, भारतीय चेतना मूलतः वही है जो गौतम बुद्ध के समय थी। अर्थात् ईसाइयत और मुहम्मदवाद (इस्लाम) के जन्म से भी पहले। 

इसीलिए, भारत में गोरक्षा का प्रश्न ही पहली बार तब उठा जब इस्लामी हमले शुरू हुए। उस के पहले यह कोई विषय ही न था। माता-पिता, देव-पितर, बड़-पीपल की तरह गो-ब्राह्मण संपूर्ण भारत में एक समान आदरणीय थे। 

सो, पूरी दुनिया में यह अभूतपूर्व है कि किसी देश के 80 प्रतिशत नागरिकों के धर्म, संस्कृति की हँसी उसी देश में उड़ायी जाए! उस धर्म की उपेक्षा बौद्धिक, राजकीय नीति बन जाए!   जरा आँख खोल कर दुनिया के कानून व व्यवहार देखें। किस देश की राज्य-प्रणाली वहाँ की बहुसंख्य जनता की धर्म-परंपरा की उपेक्षा करती है? भारत के सिवा कहीं नहीं। यही हमारी सारी समस्या की जड़ है। 

गोरक्षा केवल सैद्धांतिक बात नहीं। यहाँ हिन्दू जनता ने गोरक्षा के लिए जितने बलिदान दिए, उस के इतिहास से ग्रंथ-भंडार तैयार हो जाएंगे। लेकिन बात तथ्य-तर्क की है ही नहीं। यदि गाय के महत्व व भारतीय परंपरा से इस के अभिन्न संबंध पर तथ्यों से कुछ होना होता, तो बहुत पहले हो जाता। बात कुटिल राजनीति की है, जिसे दलीलों से नहीं जीता जा सकता। 

यह इस्लामी जिद को वरीयता देने की राजनीति है। शेष सभी कारण महत्वहीन हैं। गोरक्षा समस्या समझने के लिए ध्यान रहे कि इस्लाम इस उद्देश्य को लेकर भारत आया था कि वह हिन्दू धर्म-संस्कृति का समूल विनाश करेगा। अनेक देशों में वहाँ की धर्म-संस्कृतियों का नाश करने में वह सफल भी हुआ था। यहाँ भी वही निश्चय पूरा करने के अंग के रूप में गो-हत्या और गो-मांस का भरपूर उपयोग किया गया। इस्लामी सेनाएं यहाँ युद्धों में कई बार अपने सामने गाय रखकर लड़ती थीं, ताकि प्रतिरोधी भारतीय सैनिकों को हतप्रभ कर रोका जा सके। मंदिरों का ध्वंस कर वहाँ गाय का रक्त बहाया जाता था, ताकि हिन्दू फिर से कब्जा न करें। कुएं, तालाब और नदी-नालों को गाय के रक्त से भ्रष्ट किया जाता था, ताकि हिन्दू प्यासे रह कर आत्मसमर्पण कर दें। असहाय हिन्दुओं के मुँह में जबरन गोमांस ठूँस कर उन्हें मुसलमान बनने के लिए विवश करना इस्लामी शासन की सामान्य घटना थी। कश्मीर में यह अभी हाल तक हुआ है। मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा ही लिखा गया इतिहास यहाँ गोवध के वर्णनों, इस के राजनीतिक उपयोग की चालों से भरा पड़ा है। 

आज वह संपूर्ण इतिहास छिपाया जाता है, तो इसलिए नहीं कि किसी सामुदायिक सदभाव की चिन्ता है। जी नहीं, इस के पीछे हिन्दू धर्म-संस्कृति के प्रति वितृष्णा रखने वाली कुटिल राजनीति है। अनेक बुद्धिजीवी, नेता समझते हैं कि सचाई को छिपा कर, झूठी-मीठी बातें कह कर इस्लामी मतवाद को नरम कर सकेंगे। वास्तव में, इस का फल उलटा होता रहा है। 

मामला संपूर्ण समझने के लिए यह भी नोट करें कि यहाँ अंग्रेजों ने भी बड़े पैमाने पर गोहत्या की थी। लेकिन यह केवल भोजन के लिए था। अपनी समझ से वे गोरक्षा को बेसिर-पैर मान कर गाय को अपना सहज आहार समझते थे। पर हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए उन्होंने इस का प्रदर्शन कभी नहीं किया। न राजनीतिक दबाव के लिए गोरक्त बहाया, न हिन्दू स्थानों को अपवित्र किया। यह बुनियादी अंतर ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि इस्लामी आक्रांता भोजन के लिए कम और हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए अधिक गाय मारते थे। वह प्रवृत्ति आज भी खत्म नहीं हुई। समस्या की जड़ यह है।

डॉ. अंबेदकर के अनुसार, यहाँ मुस्लिम नेता हिन्दुओं पर दबदबा रखने के लिए गोहत्या करते और इस का प्रदर्शन करते हैं। अर्थात् गोहत्या मूलतः राजनीतिक जिद है। डॉ. अंबेदकर के शब्दों में, ‘धार्मिक उद्देश्य से गो-बलि के लिए मुस्लिम कानूनों में कोई बल नहीं दिया गया है, और जब वह मक्का और मदीना की तीर्थयात्रा पर जाता है, गो-बलि नहीं करता है। परन्तु भारत में दूसरे किसी पशु की बलि देकर वे संतुष्ट नहीं होते हैं।’ (डॉ. अंबेदकर, ‘संपूर्ण वाङमय’, खंड 15, पृ. 267)। यह प्रवृत्ति आज भी लागू है। इस पर हमारा अंग्रेजी संपादक क्यों नहीं कुछ कहता? 

केवल बौद्धिक, आर्थिक तर्कों से यहाँ गोहत्या के विरुद्ध लिखने-बोलने वाले भी असली बात भूलते हैं। यह हिन्दू धर्म-संस्कृति का विषय है, इस बुनियादी बिन्दु से बचना हिन्दुओं की राजनीतिक हार है। जिस तरह यीशू का ईश्वर-पुत्र होना, मुहम्मद का प्रोफेट होना, आदि किसी आर्थिक-बौद्धिक तर्क के प्रश्न नहीं – उसी तरह हिन्दुओं के लिए गोरक्षा कोई आर्थिक प्रश्न नहीं है। यद्यपि, गाय की उपयोगिता पर हिन्दू ज्ञान-भंडार में अंतहीन सामग्री है। किन्तु उसे सामने रखना बेकार है, क्योंकि यहाँ मामला ही और है। 

जो राष्ट्रवादी भी केवल गोरक्षकों पर गुस्सा दिखा कर अपने को होशियार समझते हैं, वे वास्तव में बेवकूफ हैं। इस से मुस्लिम नेता समझते हैं कि हिन्दू उन से डरते हैं, इसलिए सचाई छिपाकर दूसरी बातें करते हैं। ऐसी मानसिकता में वास्तविक सदभावना या मैत्री असंभव रहती है। 

वस्तुतः स्वतंत्र भारत में, वह भी मुसलमानों के लिए अलग देश बना चुकने के बाद, भी गोहत्या बंद न करना और विविध मुस्लिम विशेषाधिकार दिए रखना सब से गंभीर विभीषिका हुई। इस में महान हिन्दू ज्ञान-ग्रंथों को शिक्षा से बाहर कर देना और संगठित धर्मांतरण पर रोक न लगाना भी जोड़ दें। यह उन्हें भी समझना चाहिए जो गो-रक्षा या अयोध्या-काशी-मथुरा जैसे विषयों को केवल दलीय प्रचार और चुनावी हथकंडा बनाने की चतुराई करते हैं। हिन्दू धर्म-संस्कृति की रक्षा मानवीय सभ्यता के प्रश्न हैं। इन्हें राजनीतिक मुद्दे बनाकर दलीय हित साधना भयंकर भूल रही हैं। अभी जो हो रहा है, वह उसी का कुपरिणाम है।

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