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ऐसे डेरों, ऐसे बाबाओं के भक्त क्यों?

बलबीर पुंज
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डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह आखिरकार निपट गए। सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हे दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराते हुए 20 वर्षों के लिए जेल भेज दिया। इस पूरे घटनाक्रम में कई ऐसे मोड़ आए, जिसमें से कुछ पर हम भारतीयों का सिर शर्म से झुक गया, तो कुछ पर हमें गौरवान्वित होने का अवसर भी प्राप्त हुआ। कुछ ऐसे प्रश्न भी उठ खड़े हुए, जिनके उत्तरों को खोजना अनिवार्य है। 

15 अगस्त 1967 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्मे गुरमीत सिंह वर्ष 1990 में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बने। इस डेरे की स्थापना अप्रैल 1948 में शाह मस्ताना ब्लोचिस्तानी ने की थी, जिसके हरियाणा सहित देशभर में 50 से अधिक आश्रम और लाखों की संख्या में अनुयायी हैं। डेरा का मुख्य काम सामाजिक कार्य, रक्तदान और गरीबों के लिए सहायता जुटाना आदि है। 

डेरा प्रमुख बनने के बाद से गुरमीत सिंह कई बार विवादों में घिरे। उनपर पर हत्या, यौन उत्पीड़न से लेकर नपुंसक बनाने तक के आरोप हैं और सभी मामले अदालत में विचाराधीन भी है। पहला चर्चित विवाद 1998 में तब सामने आया, जब एक गांव का बालक डेरा के वाहन के नीचे आ गया। सबसे बड़ा और गंभीर आरोप गुरमीत सिंह पर मई 2002 में तब लगा, जब दो गुमनाम साध्वियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर डेरा प्रमुख पर यौन शोषण का आरोप लगाया। उसी वर्ष 24 अक्टूबर को गुरमीत पर उस पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या का भी आरोप लगा, जिसने डेरे में होने वाली इन काली करतूतों का खुलासा किया था। 15 वर्ष पूर्व दो साध्वियों से दुष्कर्म के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत का निर्णय आ चुका है। निकट भविष्य में छत्रपति सहित अन्य हत्याकांड के मामलों में भी फैसला आने वाला है। 

न्यायाधीश जगदीप सिंह ने गत सोमवार सजा की घोषणा करते हुए बलात्कार पीड़ितों के प्रति गुरमीत सिंह के व्यवहार को "जंगली जानवर" जैसा बताया। साथ ही यह भी कहा, "इस तरह के आपराधिक कृत्यों से इस प्राचीन भूमि की विरासत, पवित्र आध्यात्मिक और संस्कृति को अपूरणीय क्षति हुई है।" 25 अगस्त को अदालती निर्णय के पश्चात जिस प्रकार सिरसा सहित हरियाणा के विभिन्न भागों और दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में डेरा अनुयायियों का उग्र बर्ताव रहा, जिसमें 38 लोगों की मौत हो गई, लाखों-करोड़ों रुपयों की संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया- इन सभी कृत्यों ने न केवल मानवता को शर्मसार किया, अपितु हिंसा में लिप्त डेरा अनुयायियों के पाशविक चरित्र को भी सबके सामने ला दिया। 

राजनीतिक रुप से भी प्रभावशाली गुरमीत सिंह आज जिन कारणों से जेल की सलाखों के पीछे है- जिसपर हम सभी भारतीयों को गर्व भी है- उसमें उन पीड़ितों का अविस्मरणीय साहस का स्थान सर्वोच्च है, जो निडर होकर डेरा प्रमुख के कुकर्मों का पर्दाफाश करने के लिए आगे आई। गौरव के पात्र सतीश डागर, मुलिंजो नारायनन सहित वह जांच अधिकारी भी है, जिन्होंने पीड़ितों को ढूंढा, साक्ष्य एकत्र किए और हत्या की धमकियों के बीच अपनी जांच को अंतिम पड़ाव तक पहुंचाया। 

इस निर्णय से देश के करोड़ों नागरिकों का विश्वास- न्यायिक व्यवस्था और मीडिया के प्रति और मजबूत हुआ है, जिसमें न्यायाधीश जगदीप सिंह और दिवंगत पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हैं। इन दोनों ने ही गुरमीत सिंह के लाखों समर्थकों के विरोध और डेरा के आडंबर को नगण्य सिद्ध करते हुए केवल सच्चाई का साथ दिया। 

इस पूरे घटनाक्रम के बीच मीडिया (सोशल मीडिया सहित) में गुरमीत सिंह की राजनीतिज्ञों के साथ तस्वीरें और वीडियो चर्चा का केंद्र बने। यह बात तो स्पष्ट है कि इन राजनेताओं का गुरमीत सिंह के प्रति आस्था का कोई भाव नहीं होता है। वह केवल चुनाव के समय इन तथाकथित संतों के समर्थकों के समर्थन की अपेक्षा में इनके द्वार पर नतमस्तक नजर आते है। 

प्रश्न उठता है कि आखिर गुरमीत सिंह, राधे-मां, निर्मल बाबा, रामपाल, आसाराम बापू जैसे कथित संतों से इतनी बड़ी संख्या में लोग क्यों जुड़ते है? जिनकी जीवन-शैली, वेशभूषा और आचार-व्यवहार भारत के पारंपरिक संतों से बिल्कुल भिन्न है और वह कोई प्रकांड विद्वान भी नहीं होते है, फिर भी क्या कारण है कि इन तथाकथित साधु-संतों के लिए उनके अनुयायी मरने-मारने के लिए भी तैयार हो जाते है? 

मेरा निजी रुप से मानना है कि गुरमीत सिंह, राधे-मां, निर्मल बाबा, रामपाल आदि ढोंगी संतों की अपार सफलता के तीन मुख्य कारण है। पहला- सत्तातंत्र की विफलता। देश में किसी भी ग्रामीण या शहरी क्षेत्र के अधिकतर निगम, विभाग, थाने, बैंक, अस्पताल, स्कूल इत्यादि सरकारी उपक्रम भ्रष्टाचार और जनता के उत्पीड़न के अड्डे बन चुके है। जन-सरोकार के लिए स्थापित इन सरकारी संस्थानों में जनता स्वयं को उपेक्षित और अपमानित महसूस करती है। इस व्यवस्था में लोग खुद को लावारिस समझने लगते है। किंतु डेरे सहित देशभर में फैले अन्य इस तरह के शिविर, जहां निशुल्क या सस्ते सुविधायुक्त अस्पताल, दवा केंद्र, विद्यालय-विश्वविद्यालय, खेल-उद्यान आदि भी उपलब्ध होते है, वहां आने वाले लोग स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित अनुभव करता है। समाज में उन्हे एक नई पहचान मिलती है। ऐसे शिविर व डेरे लोगों को पंथ सुरक्षा भी प्रदान करते है। अर्थात् राजकीय शासन प्रणाली और उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था की विफलता की पूर्ति अधिकतर इस तरह के डेरे या शिविर करते है, तभी हजारों-लाखों लोग गुरमीत सिंह जैसे स्वयंभू संतों से जुड़कर व्यक्ति-पूजा में लीन हो जाते है। 

दूसरा- मजहबी संस्थाओं का "गैर-व्यक्तिगत" चरित्र होना भी लोगों को इन डेरों के प्रति झुकाव के लिए प्रोत्साहित करते है। मजहबी संस्थाओं में आने वाले लोग, जो किसी न किसी समस्या से घिरे होते है- चाहे वह पारिवारिक हो, आर्थिक हो या व्यक्तिगत- इनमें से अधिकतर लोगों की अवहेलना की जाती है। प्रतिकूल इसके डेरों में अपनापन, संकट के समय साथ देने का भाव और पारिवारिक वातावरण लोगों को आकर्षित करने में सफल हो जाता है। 

तीसरा- अध्यात्म के प्रति राजकीय उदासीनता। भारत की जीवन-पद्धति और उसकी शैली के मूल में अध्यात्म है। करोड़ों लोग इसके उपासक भी है। वैदिक और सनातन संस्कृति से जनित इस आध्यात्मिक चेतना को गत कई दशकों में महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद से लेकर गांधीजी और विनोबा भावे आदि प्रमुखों ने आगे बढ़ाया है। किंतु आज छद्म-सेकुलरवाद के नाम पर स्वतंत्र भारत में जिस तरह की विकृत व्यवस्था स्थापित की गई है, उसमें लोगों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को "सांप्रदायिक" चश्मे से देखा जाने लगा है। समाज में इसी खालीपन की भरपाई स्वघोषित संत या गुरु अपने निजी लाभ के लिए बड़ी चतुराई, छल-फरेब और आधुनिक विशेष प्रभावों के साथ करते है। इसी कारण देश के अधिकतर स्वयंभू "भगवान के रुप" अकूत धन-संपदा के स्वामी बन बैठे है। गुरमीत सिंह जैसे कथित संतों का आचार-व्यवहार और जीवन-शैली इसकी तार्किक परिणति है। 

दुष्कर्म या यौन उत्पीड़न या फिर महिला संबंधित कोई भी अपराध सामाजिक कलंक है। चाहे इसका आरोपी किसी भी पंथ से क्यों न हो, दोषी सिद्ध होने पर उसे कड़ी सजा देने का प्रावधान भारतीय दंड संहिता में है। इसी वर्ष फरवरी में केरल में एक कैथोलिक पादरी रॉबिन को नाबालिग से बलात्कार, जिसने बाद में शिशु को भी जन्म दिया, उस मामले में गिरफ्तार किया गया था। गुरमीत सिंह, आसाराम जैसे कथित संतों के घृणित मामलों पर स्वघोषित सेकुलरिस्ट, उदारवादी और मीडिया के बड़ा भाग का ध्यान इस ओर केंद्रित तो हो जाता है, किंतु फादर रॉबिन जैसे दुष्कर्म के आरोपियों पर इसी तरह का रवैया क्यों नहीं दिखता?

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