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इजराइल से रिश्तों को पंख!

बलबीर पुंज
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इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की 14 जनवरी से भारत की चार दिवसीय यात्रा शुरू हो रही है। निश्चित रुप से इस यात्रा से दोनों देशों के संबंध और प्रगाढ़ होंगे। प्रस्तावित द्विपक्षीय वार्ता और सामरिक-व्यापारिक समझौतों के बीच मुंबई में नेतन्याहू का "फिल्मी" दौरा यात्रा का सबसे रोचक पक्ष होगा, जो भारत और इजराइल के रिश्तों को नया आयाम प्रदान करेगा। 

वैश्विक मनोरंजन व्यवसाय में इजराइल मजहबी कारणों से "सांस्कृतिक बहिष्कार" का दंश झेल रहा है। इस पृष्ठभूमि में एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई में व्यापारिक सम्मेलन के अतिरिक्त ‘शालोम बॉलीवुड’ नामक रंगारंग कार्यक्रम का आयोजन होना है। यहां नेतन्याहू बॉलीवुड के सफल भारतीय फिल्म निर्माता-निर्देशकों को इजराइल में शूटिंग करने के लिए आमंत्रित करेंगे, जिसमें वह करों में छूट और अन्य सुविधा देने की घोषणा भी कर सकते है। खबरों की माने तो- गत वर्ष अक्टबूर में एक बॉलीवुड फिल्म की शूटिंग इजराइल के जफा और तेल-अवीव में हो भी चुकी है। 

इजराइली प्रधानमंत्री द्वारा मुंबई में फिल्मकारों से प्रस्तावित मुलाकात का मूल उद्देश्य केवल भारतीय फिल्म उद्योग को इजराइल में आमंत्रित ही करना नहीं है, अपितु वैश्विक स्तर पर इस एकमात्र यहूदी देश के खिलाफ चल रहे प्रायोजित ‘बहिष्कार, विनिवेश और प्रतिबंध’ अर्थात ‘बीडीएस’ अभियान को मुंहतोड़ जवाब भी देना है। 

बॉलीवुड से पहले इजराइल हॉलीवुड को लुभाने का प्रयास कर चुका है। गत वर्ष ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामित 26 हस्तियों को इजराइल ने निशुल्क यात्रा सहित अन्य कई प्रस्ताव दिए गए थे। लगभग उसी दौरान ही "बीडीएस" संगठन की ओर से ऐसे प्रस्तावों का उपयोग न करने का आह्वान किया गया, जिसके बाद इजराइल की यह कोशिश विफल हो गई। इस आंदोलन का समर्थन अंतरराष्ट्रीय जगत की कई नामी हस्तियां कर रही है, जिसमें वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंस भी शामिल है।

आखिर ‘बीडीएस’ का मूल उद्देश्य क्या है? इस संगठन की स्थापना 9 जुलाई 2005 में 170 फिलस्तीनी गैर-सरकारी संगठनों ने कथित रुप से इजराइल द्वारा फिलीस्तीनियों के मानवाधिकारों के हनन और उनपर सैन्य कार्रवाई के विरोध में की थी। जिसके मूल एजेंडे में इजराइली उत्पादों और कंपनियों का बहिष्कार और उनपर प्रतिबंध की मांग करना है। 

इजराइल- लगभग 13 वर्षों से वैश्विक स्तर पर सक्रिय इस आंदोलन को खत्म करने का प्रयास कर रहा है। इस दिशा में गत वर्षों में नेसेट अर्थात इजराइली संसद ने एक कानून में संशोधन को स्वीकृति दी गई है, जिसमें इजराइल का बहिष्कार करने वाले विदेशियों के देश में प्रवेश पर प्रतिबंध का प्रावधान है। इस आंदोलन से निपटने के लिए इजराइली सरकार ने रणनीतिक मामलों के मंत्रालय को साढ़े तीन करोड़ डॉलर आवंटित किए है। 

इसी कानून के अंर्तगत, इजराइली अधिकारियों ने पिछले साल मार्च में ब्रितानी संस्था फिलिस्तीन सॉलिडेटरी कैंपेन के अध्यक्ष हग लैनिंग को तेल अवीव स्थित गुरियन हवाईअड्डे पर रोक दिया था। इजराइली सरकार का तर्क था, ‘लैनिंग के संगठन ने बीडीएस के एक अभियान का नेतृत्व किया था। यह संगठन ऐसी संस्थाओं के साथ मिलकर काम करता है, जो इजराइल का बहिष्कार और उसके विरुद्ध गतिविधियां चलाने के लिए उत्तरदायी है। यही नहीं, लैनिंग का गाजा में हमास प्रमुखों के साथ भी संबंध रहा है।’ 

इजराइल ने हाल ही में 20 अंतरराष्ट्रीय समूहों की एक काली सूची भी जारी की है, जिसमें मुख्य रूप से यूरोपीय और अमेरिकी संगठनों के साथ-साथ लैटिन अमेरिका के समूहों, दक्षिण अफ्रीका के एक समूह और कई अंतरराष्ट्रीय संगठन शामिल हैं। फिलिस्तीन सॉलिडेटरी कैंपेन के साथ-साथ अमेरिकी फ्रेंड्स सर्विस कमेटी (एएफसीसी) पर भी इजराइल ने कार्रवाई की है, जिसने 1947 में नोबेल शांति पुरस्कार जीता था। भारत में भी कई गैर-सरकारी संगठन और वामपंथी भी इसी बीडीएस अभियान का हिस्सा बने हुए है। 

बीडीएस आंदोलन की मानसकिता और इस्लामी कट्टरपंथ को प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन व उसके अस्तित्व को नकारना- दोनों एक दूसरे के पूरक है। विश्व के अधिकतर इस्लामी राष्ट्रों की आंखों में इजराइल मजहबी कारणों से खटकता रहा है, जिसका एक लंबा और प्राचीन इतिहास इंटरनेट पर उपलब्ध भी है। इस आंदोलन से पहले ही इजराइली पासपोर्ट-धारकों या फिर इजराइल की यात्रा कर चुके लोगों पर ईरान, पाकिस्तान, सऊदी अरब सहित 16 इस्लामी या मुस्लिम बहुल देशों ने गत कई वर्षों से प्रतिबंध थोपा हुआ है। यही नहीं- हमास, आईएस जैसे खूंखार इस्लामी आतंकी संगठनों के लिए यहूदियों को मौत के घाट उतारना मजहबी कर्तव्य बना हुआ है। फिर भी इजराइल अकेले दम पर 13 मुस्लिम और अरब देशों के हमलों को खम ठोकर झेल रहा है और उन्हें परास्त भी कर रहा है। 

भारत और इजराइल में कई समानताएं है, जिसमें इन दोनों पर विदेशी आक्रांताओं के हमले का इतिहास- प्रमुख है। जहां भारत पर प्राचीनकाल में शक, यवन, हूण आदि के आक्रमण हुए और मध्यकाल में इस्लामी अतातायियों और गिरजाघरों व ईसाई मिशनरियों के "मजहबी हमले" का शिकार हुआ, किंतु कोई भी इस कालजयी संस्कृति को नष्ट नहीं कर सका। वहीं इजराइल पर पहले ईसाइयत और बाद में इस्लामी हमलों का अविरत दमनचक्र चला। भयावह उत्पीड़न और नरसंहार के कारण उन्हें अपने ही वतन से पलायन कर अन्य देशों में शरण लेनी पड़ी। रूस, यूक्रेन, पूर्वी यूरोप में भी उन्हें घोर नृशंस यातनाएं सहनी पड़ीं। इजराइल यह सहर्ष स्वीकार करता है कि अपने दो हजार वर्ष के लंबे प्रवासकाल में यहूदी समुदाय को भारत में कभी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। इजराइल ने भी पच्चीस हजार भारतीय यहूदियों, जो अधिकतर महाराष्ट्र और केरल से थे और 1950-60 के दशक में इजराइल गए थे, उनको अपनी मुख्यधारा में अंगीकार किया। 

भारत-इजराइल के बीच कूटनीतिक संबंध 26 वर्ष पुराने है, किंतु इतिहास साक्षी है कि दोनों देशों के लगभग ग्यारह शताब्दी के अत्यंत लंबे प्रवास से व्यापारिक रिश्ते घनिष्ठ है। गत वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनके ऐतिहासिक इजराइल दौरे में बेंजामिन नेतन्याहू को भेंट स्वरुप में दिए दो विशिष्ट उपहार- उसका प्रत्यक्ष उदारहण है। वह दोनों तोहफे केरल से संबंधित थे, जिसमें प्राचीन ताम्र पट्टिकाएं की वह प्रतिलिपि है, जिन्हे तत्कालीन हिंदू सम्राट चेरमन पेरुमल, जो भास्कर रवि वर्मा के नाम से भी विख्यात हैं, उन्होंने यहूदी नेता जोसेफ रब्बान को दी थी। जहां एक ताम्र पट्टिका में यहूदी समुदाय को दी सुविधाओं का उल्लेख था, तो दूसरी में यहूदियों से व्यापार का विस्तृत विवरण। 

भारत और इजराइल में विपत्ति के समय साथ देने की परंपरा, प्रथम विश्व युद्ध से जारी है। जहां इजराइल ने नि:स्वार्थ भाव से चीन के 1962 और 1965, 1971 व 1999 में पाकिस्तान के कायराना हमलों में भारत की सहायता की, वहीं इजराइल के हाइफा को वर्ष 1918 में स्वतंत्र बनाने में भारतीय शूरवीरों को बहुत बड़ा योगदान है। जहां हाइफा (इजराइल) में प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को इन योद्धाओं के शौर्य को स्मरण किया जाता है, वहीं भारत में संकीर्ण राजनीति के कारण इस ऐतिहासिक युद्ध का कहीं उल्लेख तक नहीं है। 

इसी संकुचित मानसिकता का एक प्रमाण हमें वर्ष 1978 में भी मिलता है- जब इजराइली राष्ट्रपति अपने भारत दौरे के क्रम में दिल्ली हवाईअड्डे पहुंचे थे, तो तत्कालीन सरकार ने औपचारिक शिष्टतावश उनका स्वागत किया। सन् 1992 में गैर नेहरु-गांधी परिवार से रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री दिवंगत नरसिम्हा राव ने सर्वप्रथम इजराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए। बाद में अटलजी के कार्यकाल में इजराइल के साथ राजनीतिक, वाणिज्यिक, सांस्कृतिक, विज्ञान व प्रौद्योगिकी, रक्षा आदि क्षेत्रों में व्यापक संबंध कायम हुए। जब सितंबर 2003 में तत्कालीन इजराइली प्रधानमंत्री एरियल शेरोन भारत आए थे, तब भी वामपंथियों और कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया। किंतु अटलजी ने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी। 

अब देखना होगा है कि नेतन्याहू के आगामी भारत दौरे में पुरानी घोषित अवधारणाएं टूटेंगी या इतिहास स्वयं को दोहराएगा?

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