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केवल नीयत भरोसे राजनीति के खतरे

रूस की अक्तूबर (नवंबर) क्रांति के सौ साल हुए, और कहीं किसी ने नाम तक न लिया! पचास वर्ष पहले, उसी की स्वर्ण जयंती पर भारत समेत दुनिया में धूम थी। पर अब कम्युनिज्म खत्म है। अब 7 नवंबर 1917 की घटना को रूसी  ‘क्रांति’ नहीं, तख्तापलट कहते हैं जो दुर्योगवश सफल हो गया था। कम्युनिज्म का पूरा दौर अब वहाँ लंबे दुःस्वप्न सा याद करते हैं। जिस में अपने ही करोडों लोगों को मार डाला गया, पूरा देश कारागार बन गया, साहित्यिक-सांस्कृतिक जीवन नष्ट होकर केवल पार्टी प्रचार रहा और अर्थव्यवस्था बैठ गई। 

अंततः रूसी कम्युनिज्म का दम निकल गया। लेकिन इस बीच तीन-चार पीढियों को जो झेलना पड़ा, उस के सबक क्या हैं? कई सबक हैं। पहला यही कि राजनीतिक-आर्थिक परिवर्तन कैसे नहीं करना चाहिए! यह सबक पूरी दनिया के लिए है। ध्यान रहे, लेनिन और उन की पार्टी ने बड़ी अच्छी नीयत से कम्युनिस्ट तानाशाही कायम की। तमाम विरोधियों को यह सोच कर खत्म किया कि समाज से शोषण, विषमता के स्थाई खात्मे हेतु वह जरूरी था। इसी अंधविश्वास पर उन्होंने लाखों किसानों को बाल-बच्चों-स्त्रियों समेत मार डाला जो कम्युनिस्ट शासन के विरोधी थे या हो सकते थे।

वह विध्वंस किस जुनून से किया गया, इसे स्वयं लेनिन के उस निर्देश से देखें जब उन्होंने कहा था कि ‘उदाहरण के लिए किसी भी व्यापारी को मार कर खंभे पर लटका दो।’ यानी कम्युनिस्ट राज में किसी का अपराध करना जरूरी नहीं था! वह कोई व्यापारी या धनी किसान है - इतना ही काफी था उसे मार डालने के लिए। इसे ‘क्रांतिकारी आतंक’ कहा गया, ताकि कम्युनिस्ट जम सकें। यह सब शोषण-उत्पीड़न खत्म करने और समाजवाद बनाने के लिए किया गया। वह न बनना था, न बना। पर अच्छी नीयत से तबाही बरपाने वाले तो एक-एक कर दुनिया से विदा ले गए। उन से कौन हिसाब ले कि आपकी अच्छी नीयत से क्या बना?

पर यदि स्वर्ग/नरक में लेनिन, स्तालिन, माओ, जैसों से किसी ने पूछा हो, तो जबाव यही मिला होगा कि हम ने तो सब सही किया; वो तो अलाँ-फलाँ ने गलती की जिस से वह न बना जिस के लिए हम ने क्रांति की थी, आदि। यानी, चूँकि बड़े कामरेड की नीयत सही थी, इसलिए दोषी वे नहीं। सभी तानाशाह या मतवादी नेताओं की यही दलील होती है। वे अपने कामों के परिणाम नहीं, अपनी नीयत से हर गलत को सही ठहराते हैं। 

भारत में यही गाँधी नेहरू ने किया। बार-बार किया। मुसलमानों को अपने पीछे लाने के लोभ में गाँधी 1920 में खलीफत आंदोलन में कूद पड़े। तुर्की खलीफा के लिए यहाँ कुछ मुसलमान आंदोलन कर रहे थे। गाँधी-समर्थन से आंदोलन और बढ़ा। पर जब खुद तुर्की लोगों ने खलीफा की छुट्टी कर दी, तो यहाँ मुसलमानों ने अपना रोष निरीह हिन्दुओं पर उतारा। मोपला से मुलतान तक हजारों हिन्दू कत्ल किए, जबरन मुसलमान बना कर गोमांस खिलाया, उन की स्त्रियों-बच्चों के साथ बलात्कार किया। यह सब इतना वीभत्स था कि पूरे देश के हिन्दुओं में झुरझुरी फैल गई। इस पर एनी बेसेंट, टैगोर, श्रद्धानन्द, अंबेदकर, जैसे कई महापुरुषों ने लिखा जो विस्तार से दर्ज है (जिसे व्यवस्थित रूप से छिपाया गया है)।

मगर गाँधी ने कभी न माना कि उन्होंने मतांध इस्लामियों को उभार कर कोई गलती की थी। जबकि पहले ही जिन्ना समेत अनेक बड़े नेताओं ने गाँधी को चेतावनी दी थी कि मुल्ले-मौलवियों को राजनीति में न लाएं। मगर गाँधी अपनी तरंग को ही कसौटी मानते थे, उन्हें किसी की सुनने-समझने की जरूरत नहीं रहती थी। बाद में भी वे बार-बार वही करते रहे।

उसी तरह, नेहरू ने भी कश्मीर, शेख अब्दुल्ला, तिब्बत-चीन, माओ पर और भारत को दी जा रही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की स्थाई सीट ठुकराने, आदि कई गंभीर विषयों में किया। नेहरू की नीयत भी अच्छी थी। पर भारत की अतुलनीय हानि हुई। कश्मीर से हिन्दुओं का सफाया हो गया। तिब्बत से भारत का पुराना संबंध खत्म हो गया। कैलाश-मानसरोवर तक हमारी बेरोक-टोक पहुँच जाती रही। संयुक्त राष्ट्र में भारत को मिल रही विशेष शक्ति कम्युनिस्ट चीन को चली गई। देश के अंदर कम्युनिस्टों ने राजनीति व शिक्षा का खासा विध्वंस किया। यह सब इसलिए क्योंकि नेहरू भी दुनिया और भारत से गरीबी, शोषण, विषमता खत्म करना चाहते थे। चाहे उन के निर्णयों से सत्यानाश हुआ। 

जो लोग नेहरू-निंदक हैं, उन्हें नेहरू की आत्मकथा और भाषण पढ़ने चाहिए। तब कइयों को नेहरू से सहानुभूति हो जाएगी। क्योंकि वास्तव में नेहरू कोई बुरे नहीं, बल्कि अच्छे दिल के कवित्वमय इंसान थे। उन में सच्ची मानवतावादी भावना थी, और यही चीज नोट करने की है। कि केवल नीयत भरोसे राजनीति करना कितना घातक हो सकता है!  आगे प्रधान मंत्री वाजपेई जी को भी देख सकते हैं। उन्होंने 1999 में भारी ताम-झाम से लाहौर बस-यात्रा की। पूरे देश में ऐसा ज्वार फैलाया मानो अब पाकिस्तान से दुश्मनी खत्म हुई! कई सप्ताह यहाँ पत्र-पत्रिकाएं रंगी रही। भाजपा नेता मूँछों में मुस्कुराते थे कि ‘देखा, हमारे सत्ता में आते ही कमाल हो गया। ये हम ही कर सकते थे।’ लेकिन यह भी अच्छी नीयत से मूर्खता की ही मिसाल बनी, जब उसी समय पाकिस्तानी सेना ने तैयारी से कारगिल पर चुपचाप कब्जा कर लिया था। उसे हटाने में सैकड़ों भारतीय सैनिक बलिदान हुए। यदि केवल अपनी नीयत से नीति न बनी होती, तो कारगिल घात न होता।   

वस्तुतः भारत की राजनीति पिछले सौ साल से इस बचपने की शिकार है। यूरोप अमेरिका में वैसी एक भी गलती करने वाले नेता का राजनीतिक जीवन वहीं समाप्त हो जाता! वहाँ किसी कुपरिणाम के बाद नेता न अपनी नीयत की दुहाई देता है, न फिर नेतृत्व में रहता है। पर यहाँ मूल्याकंन काम के नतीजे नहीं, बल्कि नेकनीयती से किया जाता है। सारी भूलों का बचाव यही कि गाँधीजी, नेहरूजी, वाजपेईजी का क्या दोष! उन्होंने तो अच्छा सोच कर यह या वह किया। साफ भुलाया जाता है कि उस से असंख्य देशवासियों की गर्दन नप गई। अन्य राष्ट्रीय, सामाजिक हानियाँ तो अलग रही। 

समझना चाहिए कि राज्यकर्म रॉकेट साइंस से भी जटिल, अतः अधिक विवेकबुद्धि का काम है। इसे केवल नीयत से चलाना अक्षम्य अपराध है। राजनीति में राक्षसी शक्तियाँ भी होती हैं। उन का उपाय नीयत नहीं, सधी नीति बना और उपयुक्त कदम उठा कर ही हो सकता है। केवल लोकरंजक, चुनाव-जिताऊ काम करने अथवा हानि-भय से सही काम करने से बचने वाले, ये दोनों ही प्रकार के नेता अयोग्य होते हैं। 

पर भारत प्रायः ऐसे ही नेताओं के हाथ रहा है। जिस तरह के सांसद, विधायक, मंत्री, अधिकारी, आदि बनाए जाते हैं वह अधिकांश नकारा जमात है। नेता जिन बातों का रोना रो या ढिंढोरा पीट जीतते हैं, वे म्युनिस्पल काम हैं जिन्हें कोई कर्मठ अधिकारी या अच्छी कंपनी मजे से कम खर्च, कम समय में बढ़िया करके दे सकती है। उन सड़क, सफाई, बिजली, जैसे काम जिन्हें भी अधकचरा किया जाता है, को ‘विकास’ कहना दुर्भाग्यपूर्ण है। इस के पीछे सरकार के मूल काम – अपराध नियंत्रण, राष्ट्रीय सुरक्षा, विश्वसनीय शासन, चुस्त न्याय और सर्वांगीण खुशहाली जैसे बुनियादी विषयों की दुर्दशा छिप जाती है। 

कई लोग अपने ही जयकारे पर मोहित होकर यह सब भूलते हैं। पर याद करें, भारत में गाँधी और दुनिया में लेनिन की जयकार करने वाले सब से अधिक संख्या में हुए। अतः जयकारियों की संख्या भी कोई प्रमाण नहीं। राष्ट्र-हित और धर्म-रक्षा की कसौटी कुछ और होती है। 

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