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कैसे रूके मजहब प्रेरित हिंसा?

क्‍या विश्व में मजहब के नाम पर होने वाली हिंसा को रोकना संभव है? अभी हाल ही में म्यांमार के यांगून में विश्व शांति, सद्भाव, सुरक्षा, संघर्ष से बचाव और पर्यावरणीय चेतना हेतु दो दिवसीय "संवाद-2" का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम के लिए जो संकल्पना नोट जारी हुआ, उसके आठवें बिंदु में स्विस कैथोलिक पादरी, दर्शनशास्त्र और लेखक हांस कूंग की एक महत्वपूर्ण उक्ति का उल्लेख किया गया। वह कहते हैं- "मजहबों के बीच शांति के बिना राष्ट्रों के बीच शांति संभव नहीं है और मजहबों के बीच शांति तब तक संभव नहीं है, जब तक संवाद के माध्यम से अलग-अलग मजहब के मूल सिद्धांतों की जांच ना कर ली जाए।" क्या मजहबों के बीच बढ़ते रक्तरंजित संघर्ष के संदर्भ में यह सुझाव क्रांतिकारी नहीं है?

हांस कूंग, चर्च के पारंपरिक सिद्धांत- पोप अचूकता, ईसा मसीह की दिव्यता और वर्जिन मैरी संबंधी शिक्षाओं के विरोधी रहे हैं। वर्ष 1962 में उन्हें तेईसवें पोप ने वैटिकन परिषद में "पेरिटस" (धार्मिक परामर्शदाता) के रुप में नामित किया था। किंतु कूंग के उदारवादी विचारों और चर्च की परंपराओं पर प्रश्न उठाने के कारण उन्हे वर्ष 1979 में वेटिकन ने एक वर्ष के लिए प्रतिबंधित कर दिया।

यदि कोई भी अपराध या फिर सामाजिक कुरीति मजहब या किसी विशेष विचारधारा से प्रेरणा लेने का दावा करे तो यह स्वभाविक है कि उसकी पवित्र पुस्तकों, उसके जन्मदाता, पथ-प्रदर्शकों के जीवन का विस्तृत अध्ययन किया जाए और उस पर ईमानदारी से संवाद हो। हिंदू समुदाय लंबे समय से अस्पृश्यता की समस्या से जूझ रहा है। समाज के भीतर से ही न केवल इस बुराई की निंदा की गई, बल्कि उसके उन्मूलन के लिए कई ठोस कदम भी उठाए गए। क्या विकृतियां केवल हिंदू समाज तक ही सीमित है? क्या इस्लाम और ईसाई मजहब इससे बिल्कुल दोषमुक्त है?

यांगून में ‘संवाद-2’ सम्मेलन का शुभांरभ भारत और जापान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व शिंजो आबे के वीडियो संदेशों के साथ हुआ था। भारत सहित 30 विभिन्न देशों के 100 से अधिक राजनीतिज्ञ, राजनयिक, प्रतिष्ठित विचारकों, प्रख्यात विद्वानों और आध्यात्मिक गुरुओं ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के अंत में एक सामूहिक घोषणापत्र भी जारी किया गया, जिसके 10वें बिंदु में कहा गया- ‘सभी आध्यात्मिक पथ और सभी मजहबों की परंपराएं समान रुप से स्वीकार्य है।’

इसका निहितार्थ क्या है? क्या विश्व में सभी मजहब संबंधी विवाद, संघर्ष, हत्याएं व युद्ध- इस भावना और विश्वास से प्रेरित नहीं होते है कि केवल मेरा मजहब सच्चा है और अन्य मिथ्या? इसी विचार से प्रभावित होकर जो लोग स्वयं को सच्चा अनुयायी मानते है, वह दूसरे मजहब के मतावलंबियों की या तो हत्या करते है या उन्हे लालच, भय, धोखे और फरेब के माध्यम से मतांतरण का काम करते है। यदि हम अपने चारों ओर ध्यान से देखें तो हमको इसके असंख्य उदाहरण मिलेंगे।

यदि सभी मजहबों के अनुयायी, इस घोषणा को मान ले कि सभी मजहबों की परंपराएं समान रुप से स्वीकार्य है, तो स्वाभाविक रुप से न तो मजहब के नाम पर हत्या होगी और न ही जबरन किसी का मतांतरण। इस पृष्ठभूमि में मजहब प्रेरित हिंसा पर भी लगाम लगेगी।

वास्तव में, अपने मजहब को श्रेष्ठ सिद्ध करने की प्रवृति, अन्य मतों के प्रति घृणा का भाव और जबरन मतांतरण ने विश्व में मजहबी संघर्ष का बीजारोपण किया है। आज विश्व जिस आतंकवाद का दंश झेल रहा है, उसका दार्शनिक आधार "काफिर-कुफ्र" की अवधारणा है। चाहे सातवीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम का भारत पर आक्रमण हो, मध्यकाल में औरंगजेब सहित कई मुस्लिम शासकों का तलवार के बल पर मजहब बदलने का अभियान, हिंदुओं के मान-बिंदुओं को जमींदोज करना, 1947 में मोहम्मद अली जिन्नाह का मजहब के आधार पर भारत का रक्तरंजित बंटवारा, एकमात्र यहूदी राष्ट्र इजराइल से मुस्लिम देशों की घृणा, कश्मीर में हिंदुओं को खदेड़ना, ओसामा बिन लादेन का न्यूयॉर्क पर 9/11 हमला, 2008 में जमात-उद-दावा सरगना हाफिज सईद का मुंबई पर 26/11 हमला और वर्तमान समय में यूरोप सहित विश्व के अलग-अलग कोनों में होने वाले आतंकी हमलों का दौर। क्या सत्य नहीं कि इन सभी कुकर्म करने वालों ने "इस्लाम" को अपना प्रेरणास्रोत नहीं बताया है? क्या आतंकी या जिहादी अपनी जान देने से पहले और दूसरे को मारने के समय कुरान में लिखित आयतों को उद्धृत नहीं करते है?

ईसाई मत में भी सदियों से अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने हेतु "बुतपरस्तों" के मतांतरण और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की रूढ़ परंपराएं रही है। यही नहीं, यूरोपीय ईसाइयों ने फिलिस्तीन और उसकी राजधानी यरुशलम में स्थित अपनी पवित्र भूमि, ईसा की समाधि पर अधिकार करने के लिए सन् 1095 और 1291 के बीच सात बार आक्रमण किया था, जिसे क्रूसेड या क्रूश युद्ध के नाम से जाना जाता है। विश्व के इस भूखंड में आज भी मजहबी संघर्ष निरंतर जारी हैं। क्रिस्टोफर कोलंबस ने ईसाई मत के प्रचार-प्रसार अभियान का हिस्सा बनकर ही 1492 में अमेरिका की खोज की थी, जहां के मूल निवासियों को कालांतर में रेड इंडियंस का नाम दिया गया।

क्या यह सत्य नहीं है कि इस खोज के पश्चात श्वेत शासकों की विस्तारवादी नीति और मजहबी दायित्व ने आज इस धरती के मूल ध्वजवाहक और उनकी संस्कृति को खत्म कर दिया? "क्रूसेड" के नाम पर ही पुर्तगाली, डच और अंग्रेज भारतीय तटों पर उतरे और जबरन लोगों को मसीह के चरणों में शरण लेने के लिए बाध्य किया था। आज भी भारत के पिछड़े और आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियां व चर्च मतांतरण के खेल में लिप्त है। देश में इन कैथोलिक संस्थाओं का शिकार हिंदू समाज का शोषित वर्ग ही होता है, ताकि वह शेष समाज के विरुद्ध खड़े हो सके।

गत एक शताब्दी के इतिहास पर प्रकाश डाले तो विश्व कई हिंसक संघर्षों का साक्षी बना है। पहला विश्वयुद्ध 1914-1918 के कालखंड में हुआ, जिसके पश्चात दुनिया में शांति हेतु जनवरी 1920 में "लीग ऑफ नेशन" की स्थापना की गई। दूसरा विश्वयुद्ध 1939-1945 के कालांतर में हुआ। अमेरिका, फ्रांस आदि देशों ने मिलकर इस अंतरराष्ट्रीय संघर्ष में हस्तक्षेप करने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासंघ को स्थापित किया। इस संगठन का मूल उद्देश्य ही यही है कि भविष्य में अब पुन: विश्वयुद्ध न हो। प्रतिकूल इसके दुनिया में छोटे-मोटे युद्ध या संघर्ष सामने आए है। जिसमें 1947, 1965, 1971, 1999 में भारत-पाकिस्तान का युद्ध, 1962 में भारत-चीन का युद्ध, 1945 और 1950-53 का कोरिया संघर्ष, 1948-49 और 1967 में इजराइल-अरब युद्ध, 1946 का ईरान संघर्ष, 1956 में स्वेज युद्ध, 1978 का सोवियत-अफगानिस्तान युद्ध, 2003-11 का इराक युद्ध आदि शामिल है। यूरोपी शहर, कश्मीर सहित शेष विश्व में आए दिन होते आतंकवादी हमले भी मानवता के खिलाफ युद्ध के समान ही है। इस कालावधि में जितने भी युद्ध या संघर्ष हुए, उनमें अधिकतर मजहब से प्रेरित रहे।

विश्व में एक धारणा यह भी प्रचलित है कि यदि सभी लोग अनीश्वरवादी या नास्तिक हो जाए, तभी दुनिया में शांति और समरसता संभव है। क्या मजहब-विहीन समाज विश्व में अमन का मार्ग प्रशस्त कर सकता है? मार्क्सवादी विचारधारा में "ईश्वर" का कोई स्थान नहीं है। इसलिए कम्युनिस्टों ने सोवियत संघ, उत्तरी कोरिया और चीन आदि देशों में मजहब का सफाया करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विश्व के जिस भूखंड को अनीश्वरवादी मार्क्स दर्शन ने अपनी चपेट में लिया, वहां न केवल खूनी हिंसा उसकी नीति बनी, साथ ही वैचारिक विरोधियों को मौत के घाट उतार दिया गया और संबंधित क्षेत्र की परंपराओं, संस्कृति, मानवाधिकारों व मजहबी स्वतंत्रता का भी गला घोट दिया गया।

 ‘मर्ज बढ़ता गया ज्यो ज्यो दवा की’- कहावत, यांगून में हुए ‘संवाद-2’ के निष्कर्ष का सटिक चित्रण करता है। यदि विश्व का सभ्य समाज मजहबी हिंसा और संघर्ष के मूल कारणों, दर्शन और विचारधारा पर खुलकर चर्चा करने से इसी तरह बचता रहा या उसमें विरोधाभास रहा, तो दुनिया हिंसा रुपी दानवी दमनचक्र से कभी उभर नहीं पाएगा।

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