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कांग्रेसः परिवारवाद की अनंत कथा

बलबीर पुंज
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आखिर जैसी संभावना थी, वैसा ही हुआ। 47 वर्षीय राहुल गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अगले अध्यक्ष होना तय है। नामांकन दाखिल करने के आखिरी दिन (4 दिसंबर) किसी भी अन्य कांग्रेस नेता ने राहुल गांधी को चुनौती नहीं दी, जोकि अपेक्षित ही था। अब बतौर कांग्रेस मुखिया राहुल गांधी के नाम की घोषणा केवल औपचारिकता भर है। 

राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने का मार्ग साफ होने के साथ एक बार फिर से यह स्थापित हो गया है कि कांग्रेस अब भी न केवल वंशवाद के जकड़ में है, अपितु इसकी जड़ें पहले से और भी अधिक गहरी भी हो गई है। साथ ही आगे भी पार्टी का भविष्य गांधी-नेहरु परिवार से ही जुड़ा रहेगा। यह ठीक है कि कांग्रेस ने अपने अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए एक लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया था। किंतु वास्तविकता क्या है?- इसका वर्णन पूर्व केंद्रीय मंत्री, पार्टी के वरिष्ठ नेता और गांधी-नेहरु परिवार के सबसे वफादारों में से एक मणिशंकर अय्यर ने बड़े ही सटीक शब्दों में किया है। 

नामांकन के अंतिम दिन वंशवाद के आरोपों पर सफाई देते हुए श्रीमान अय्यरजी ने कहा, "जब शाहजहां ने जहांगीर की जगह ली थी, क्या तब चुनाव हुए थे? जब औरंगजेब ने शाहजहां की जगह ली तब चुनाव हुए? यह सब जानते हैं कि जो बादशाह है, उसकी संतान को सत्ता मिलेगी।" ऐसा नहीं है कि गांधी-नेहरु परिवार से जुड़े लोग वंशवादी परंपरा से घृणा करते है, अपितु अपने आगे-पीछे चक्कर काटते युवा, वरिष्ठ और बुजुर्ग कांग्रेसियों को देखना भी इस परिवार को दशकों से रास आ रहा है। तभी इसी वर्ष सितंबर में अमेरिका गए राहुल गांधी ने कांग्रेस में परिवारवाद के समर्थन में कई तर्क दिए और कहा, "हमारा देश इसी तरह काम करता है।" 

नेहरू-गांधी परिवार के राहुल गांधी छठे सदस्य होंगे, जो कांग्रेस की कमान संभालेंगे। स्वतंत्र भारत के सर्वप्रथम प्रधानमंत्री दिवंगत पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने जीवनकाल में ही अपनी इकलौती पुत्री इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्षा बनवाकर वंशवाद का बीजारोपण कर दिया था। मोतीलाल नेहरू इस परिवार के पहले सदस्य थे, जिन्होंने स्वतंत्रता से पहले 1919 में कांग्रेस अध्यक्ष का पद अमृतसर अधिवेशन में संभाला था। 1928 के कलकत्ता अधिवेशन में भी वह फिर से अध्यक्ष बने। जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर सत्र में 1929-30 में कांग्रेस की कमान पिता मोतीलाल से अपने हाथ में ले ली। 1936-37 में पं.नेहरू पुन: कांग्रेस अध्यक्ष बने। भारत के पहले प्रधानमंत्री होते हुए पं.नेहरु 1951 से 1954 तक कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर आसीन रहे। 

राहुल गांधी की दादी श्रीमती इंदिरा गांधी वर्ष 1959 में पहली बार कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। उन्हीं की ज़िद और हठधर्मिता ने पं.नेहरु को जनता द्वारा चुनी केरल की तत्कालीन वाम सरकार को बर्खास्त करने और वहां राष्ट्रपति शासन थोपने के लिए विवश कर दिया। इस घटनाक्रम ने कांग्रेस में एक व्यक्ति और एक परिवार के साथ पूर्ण देश और पार्टी की पहचान को जोड़ने की गैर-लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी परंपरा की नींव डाल दी। 

वर्ष 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने व्यक्तिवाद से प्रेरित होकर कांग्रेस का विभाजन किया और उनके नेतृत्व वाले कांग्रेस का नामकरण ‘कांग्रेस-आई’ के रूप में हुआ। सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए उन्होंने वामपंथियों से हाथ मिला लिया। यह वही दौर था, जब नेहरु काल में गांधीजी के विचारों का परित्याग चुकी कांग्रेस में इंदिरा के समय वामपंथी चिंतन और उसके वमनजनक बौद्धिक दर्शन का संचार शुरू हुआ, जिससे वह आजतक जकड़े हुए है। इसी कारण पार्टी के नेता देशविरोधी शक्तियों का समर्थन और सार्वजनिक रुप से गाय के बछड़े का गला काटते दिखाई देते है। यही नहीं, जिस प्रकार मार्क्सवाद में एक नेता और एक विचार के प्रति समर्पण का सिद्धांत है। ठीक उसी तरह कांग्रेस में भी एक परिवार की पूजा और उसके सदस्यों की चापलूसी में ही पार्टी के अन्य सदस्यों की स्वामीभक्ति निहित है। 

प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिराजी ने अपने छोटे बेटे संजय गांधी को राजनीति में लाने का प्रयास किया, क्योंकि बड़े बेटे राजीव गांधी की इस क्षेत्र में तब कोई रुचि नहीं थी और वह एयर इंडिया में बतौर पायलट नौकरी कर रहे थे। किंतु होनी को कुछ और ही मंजूर था। जब 23 जून 1980 को संजय गांधी ने विमान उड़ाने का प्रयास किया, तो वह दुर्घटना के शिकार हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। तब जाकर राजीव गांधी 16 फरवरी 1981 को औपचारिक रुप से राजनीति में आए। 

इंदिरा गांधी सरकार द्वारा थोपे आपातकाल में मौलिक जनाधिकारों के हनन और "इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा" जैसे अधिनायकवादी नारे ने 1977 के चुनाव में कांग्रेस को औंधे मुंह गिरा दिया। 1980 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने वापसी की और प्रधानमंत्री बनीं। इस दौरान श्रीमती गांधी 1978 से लेकर अपनी मृत्यु तक कांग्रेस की अध्यक्ष भी रहीं। 

अक्टबूर 1984 में इंदिराजी की हत्या से उभरे सहानुभूति लहर से कांग्रेस को अप्रत्याशित सफलता मिली। राजीव गांधी अपनी मां के पदचिन्हों पर चलते हुए देश के प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष बने। 1991 में अपनी मृत्यु तक वह कांग्रेस के मुखिया बने रहे। राजीव के निधन के बाद पार्टी अध्यक्ष की कमान सात वर्षों तक गैर-परिवार पीवी नरसिम्हा राव व सीताराम केसरी से होते हुए 1998 में एक बार फिर नेहरू-गांधी परिवार की हाथों में पहुंची और राजीव गांधी के पत्नी और मूल रुप से इतालवी सोनिया गांधी पार्टी की अध्यक्ष बनीं। उनका कार्यकाल सबसे लंबा रहा, वह लागातार 19 वर्षों से पार्टी की अध्यक्ष पद पर विराजमान हैं। श्रीमती इंदिरा द्वारा स्थापित परिपाटी को आगे बढ़ाने हुए सोनियाजी ने 2004 में प्रधानमंत्री बनना चाहा, किंतु संवैधानिक कारणों से उनकी यह महत्वकांशा पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद देश के अगले प्रधानमंत्री को उन्होंने ही नामित किया और 10 वर्षों तक गद्दी पर बनाए रखा। इस कालखंड में बिना वह किसी संवैधानिक पद और जवाबदेही के सत्ता का "मुख्य" केंद्र बनी रहीं। तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए उन्होंने 'राष्ट्रीय परामर्श समिति' के रुप में संविधानेत्तर सत्ता का केंद्र स्थापित किया था। यदि 1978 से कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर एक परिवार के कब्जे का हिसाब लगाया जाए, तो कांग्रेस पर गांधी-नेहरु परिवार का ही एकक्षत्र राज रहा है। गत 39 में 32 वर्षों से नेहरु-गांधी परिवार के सदस्य पार्टी अध्यक्ष पद पर आसीन है और आने वाले समय में भी यही स्थिति रहने वाली है। गांधी-नेहरु परिवार के अधीन कांग्रेस पार्टी वर्तमान समय में राजनीतिक दल न होकर एक निजी कंपनी में परिवर्तित हो गई है, जिसका एकमात्र लक्ष्य धनबल से सत्ता प्राप्त करना और सत्तासीन होने पर प्रचूर मात्रा पैसा अर्जित करने तक सीमित हो गया है। संप्रग शासन में सामने आए हजारों-लाखों करोड़ रुपये के घोटाले इसका उदाहरण है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का तमगा लिए कांग्रेस गत चार दशकों से एक परिवार के नेतृत्व पर इतना आश्रित है कि उसके लिए अपनी मूल विचारधारा ही अप्रासंगिक हो गई है। 

कांग्रेस के नेता ‘वंशवादी’ खूंटे से बंधे रहने में ही स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं। बस उन्हे परिवार का खूंटा मिलना चाहिए, ताकि उसके इर्द-गिर्द चक्कर काटते रहे। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर का वक्तव्य इसी कटु सत्य को रेखांकित करता है।

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