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रोहिंग्या मुस्लिमों की समस्या विकट

तन्मय कुमार - सुप्रीम कोर्ट ने भारत में शरण लिए करीब 40 हजार रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस म्यांमार भेजने की केंद्र सरकार की योजना पर कई भी अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया है। दो रोहिंग्या मुसलमानों मोहम्मद सलीमुल्ला और मोहम्मद शाकिर की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट ने याचिका देकर केंद्र सरकार की योजना पर रोक लगाने की मांग की है। 

अदालत इस मामले पर अब 11 सितंबर को सुनवाई करेगी। भारत के लिए रोहिंग्या शरणार्थी एक बड़ा सिरदर्द बन रहे हैं, लेकिन इस समस्या के कई बड़े अंतरराष्ट्रीय पहलू हैं, जिस पर विचार करने की जरूरत है। 

एक अनुमान के मुताबिक करीब 14 हजार रोहिंग्या शरणार्थी ऐसे हैं, जो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में पंजीकृत हैं, जबकि भारत के अलग अलग हिस्सों में शरण लिए शरणार्थियों की संख्या 40 हजार बताई जा रही है। 

ये हैदराबाद से लेकर जम्मू कश्मीर, राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में फैल गए हैं और बस्तियां बना कर रह रहे हैं। इन्हें वहां से हटाना और वापस म्यांमार भेजना आसान काम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में दी गई याचिका में संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संधियों का हवाला देकर उनको यहां रहने देने की मांग की गई है। इस पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट दोनों का रुख बेहद अहम है। 

भारत और दूसरे पड़ोसी देशों के सामने सबसे बड़ा खतरा आतंकवाद का है। केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से सभी राज्यों को भेजे गए एक परामर्श में कहा गया है कि पिछले कुछ दशकों से दुनिया के सारे देशों के लिए अवैध शरणार्थी बड़ी चुनौती बन गए हैं क्योंकि उनके आतंकवादी संगठनों में भरती होने की संभावना ज्यादा रहती है। 

यह भी रिपोर्ट आई है कि पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन खास कर लश्कर ए तैयबा ने रोहिंग्या शरणार्थी में सेंध लगाई है और आतंकवादी गतिविधियों के लिए उनको भरती करना शुरू किया है। लश्कर और दूसरे आतंकवादी संगठनों ने बांग्लादेश में सबसे ज्यादा भरतियां की हैं। गौरतलब है कि सबसे ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थियों ने बांग्लादेश में ही शरण ली है। 

अराकान रोहिंग्या सालवेशन आर्मी नाम से एक संगठन बना है, जिसकी कमान अताउल्ला के हाथ में है। वह पाकिस्तान में जन्मा था और मक्का में पला बढ़ा। उसने पिछले कुछ समय में म्यांमार में कई हमलों को अंजाम दिया है। इस तरह की घटनाओं से भारत को भी सावधान रहने की जरूरत है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की म्यांमार यात्रा आज से शुरू हुई है। तीन से पांच सितंबर तक चीन के शियामेन में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के बाद वे दोपक्षीय यात्रा के बाद म्यांमार पहुंचे हैं। वहां उनकी बातचीत में रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों का मामला प्रमुखता से उठेगा। भारत पहले भी यह मुद्दा उठाता रहा है। पर मुश्किल यह है कि म्यांमार की सरकार और वहां की सेना का दावा है कि रोहिंग्या आतंकवादी संगठन सेना को और बेकसूर लोगों के निशाना बना रहे हैं, जिसकी वजह से जवाबी कार्रवाई करनी पड़ रही है। 

गौरतलब है कि पुराना अराकान और मौजूदा राखाइन प्रांत में रोहिंग्या बस्तियों पर पिछले कुछ समय से लगातार हमले हो रहे हैं और उनके घरों को आग लगाई जा रही है। इसकी वजह से हजारों की संख्या में रोहिंग्या मुस्लिम पलायन कर रहे हैं। वे भारत में आ रहे हैं या बांग्लादेश जा रहे हैं। 

इस संकट को सुलझाने में विश्व समुदाय की बड़ी भूमिका होनी चाहिए। म्यांमार में मानवाधिकार और लोकतंत्र के लिए लड़ने वाली नोबल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की सत्तारूढ़ पार्टी की प्रमुख हैं। दूसरी नोबल पुरस्कार विजेता मलाला युसूफजई सहित कई प्रमुख लोगों ने आंग सान सू की से अपील की है कि वे मामले को सुलझाएं। इसमें संयुक्त राष्ट्र संघ, एशियाई देशों और दुनिया की बड़ी ताकतों को पहल करके म्यांमार में शांति बनवानी होगी। अगर म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों पर हमले नहीं रूके तो पलायन भी नहीं रूकेगा और भारत व पड़ोसी देशों को शरणार्थी समस्या से जूझते रहना पड़ेगा। सत्तर के दशक के पूर्वी पाकिस्तान जैसे हालात बन जाएंगे।

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