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टैगोर नहीं, तैमूर

शंकर शरण
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हाल में फिल्म एक्टर सैफ अली खान के बेटे तैमूर की पहली सालगिरह थी। कई हस्तियो ने ‘तैमूर’ को बधाई दी। जब यह नामकरण हुआ था, तो भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश में चर्चित हुआ। पर सेक्यूलर, लिबरल बंधुओं ने कहा कि नाम रखना तो किसी की अपनी इच्छा है। उस पर दूसरे को बुरा क्यों लगे!

पर इसी तरह कोई बड़ा आदमी अपने बेटे का नाम नाथूराम गोडसे रख ले, तो क्या यही दलील और बधाई दी जाएगी? तैमूर का निहितार्थ समझने से भारतीय चूक नहीं सकते। तैमूर चौदहवीं सदी का तुर्क-मंगोल हमलावर था। भारत में उस की कुख्याति दिसंबर 1398 में दिल्ली जीतने के बाद लाखों के कत्ल और उसे रौंदने के कारण है। तब दिल्ली दुनिया का प्रसिद्ध वैभवशाली नगर था। हालाँकि दिल्ली पहुँचने से पहले तैमूर को अहीरों, जाटों और मेरठ ने कड़ी चुनौती दी थी। पर तैमूर के बाद दिल्ली को पुनः खड़े होने में पूरी शताब्दी लगी। फिर सात-आठ पीढ़ी बाद तैमूरी वंश के ही बाबर ने भारत पर हमला कर यहाँ मुगल साम्राज्य कायम किया। 

वही तैमूर नाम अपने बेटे को देकर सैफ ने इतिहास और वर्तमान दोनों की याद दिलाई। अभी भारत में ऐसे सेक्यूलरिज्म का दबदबा है, जिस में इस्लामी आक्रांताओं, हत्यारों, अत्याचारियों को भी आदर देना लाजिमी बना दिया गया है। वरना यहाँ तैमूर से लेकर औरंगजेब तक सब का मान न होता। यानी उन का जिन के सामने आसोमा बिन लादेन बच्चा ही था!  

हालाँकि इस तैमूर बच्चे के वंश-वृक्ष में छः पीढ़ी पहले नोबेल-पुरस्कार सम्मानित महान कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर भी हैं। लेकिन, चूँकि बच्चे की दादीजान शर्मिला टैगोर 1969 में ही इस्लाम कबूल कर आयेशा सुल्ताना बन गईं। सो टैगोर नाम फीका पड़ गया। ‘आयेशा सुलताना’ का भी अर्थ है ‘खुश ताकतवर’। सो शर्मिला जी हिन्दू धर्म और टैगोर शब्द की गरिमा त्याग, इस्लामी ताकत से खुश भई थीं।   

शायद वही तैमूर नामकरण का भी महत्व है। टैगोर नहीं, तैमूर में दम है। महान हिन्दू कविता, धर्म-दर्शन नहीं, हमलावर इस्लामी तलवार आकर्षक है। क्योंकि तलवार तो राणा प्रताप और शिवाजी की भी थी, जिन का नाम नहीं लिया गया। अतः टैगोर वंशज होने में नहीं, पर तैमूर कहलाने में फख्र का कोई और ही मतलब लगता है। 

कितना रोचक कि स्वयं रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस पर ऊँगली रखी थी! उन्होंने 1923 में एक व्याख्यान में कहा था कि सीमाप्रांत (अब पाकिस्तान) में पठान आक्रमणकारी जब-तब हिन्दू बस्तियों पर टूट पड़ते और लड़कियों को उठा ले जाते थे। स्थानीय हिन्दू चुप देखते रहते थे। अपहृत लड़की हिन्दू और उस के अपहरण के प्रति उदासीन भी हिन्दू! इसी पर टैगोर ने दुःख से कहाः ‘‘दोनों में शास्त्रगत योग हो सकता है लेकिन प्राणगत योग नहीं है। एक पर आघात होता है तो दूसरे के मर्म तक आवाज नहीं पहुँचती।’’ आज भी वही हाल है। कश्मीरी पंडितों के बचाव के लिए शेष भारत के हिन्दुओं ने क्या किया?   

इसे टैगोर ने हिन्दुओं में ‘सामाजिक बल का अभाव’ कहा था, जिस की तुलना में मुसलमानों का सामाजिक बल मजबूत है। इतना कि, टैगोर के शब्दों में, ‘‘विशेष प्रयोजन न होने पर भी हिन्दू एक-दूसरे पर आघात करते हैं, और प्रयोजन होने पर भी किसी परकीय पर आघात नहीं करते। इस के विपरीत मुसलमान प्रयोजन न होने पर भी अपनी रक्षा के लिए एक हो जाते हैं और प्रयोजन हो तो दूसरों पर तीव्र आघात कर सकते हैं। इस का कारण यह नहीं कि मुसलमान का शरीर ताकतवर है, हिन्दू का शरीर कमजोर। कारण यह है कि मुसलमानों का समाज शक्तिशाली है, हिन्दुओं का नहीं। एक पक्ष आभ्यंतरित रूप से प्रबल है, दूसरा निर्जीव।’’

कहें कि सैफ द्वारा बेटे का नाम तैमूर रखने में उसी सामाजिक बल की ठसक है। तैमूर-बाबर-औरंगजेब द्वारा पीड़ित हिन्दुओं के वंशज इसे आज भी विवश स्वीकारते हैं। क्योंकि इन में सामाजिक बल की चेतना नहीं है। राष्ट्रवादी हिन्दू राजनीतिकों में भी इस की समझ नहीं। वे अपना पार्टी-ढोल बजाने में ही पूरी ताकत और समय लगाते रहे हैं। फलतः हिन्दू समाज अभी भी नेतृत्वहीन है। हिन्दू अपने को चाहे राम, कृष्ण, अर्जुन, भीम, प्रताप, गुरू गोविन्द, शिवाजी, विवेकानन्द या रवीन्द्रनाथ से जोड़ते रहें, किन्तु उन में आपस में प्राणगत-योग बनाने की चिन्ता नहीं है। 

मुस्लिम नेता अपने को गर्व से मुस्लिम कहता है। ईसाई अपने को ईसाई कहता है। पर अपने को हिन्दू कहते हुए, लिखते, बोलते और इस की खुली चिन्ता करते हुए कौन हिन्दू नेता है? बाल ठाकरे और योगी आदित्यनाथ के सिवा कोई ध्यान नहीं आता। सारे हिन्दू अपने को सेक्यूलर, उदारवादी, वामपंथी, आदि कहते हैं। इसीलिए हिन्दू धर्म-संस्कृति या समाज की चिंता नहीं करते। राष्ट्रवादी नेता देश के चालू संविधान को ही ‘धर्म-ग्रंथ’ तक कह डालते है! तब उपनिषद, रामायण क्या है? 

यह सब देख कर हिन्दू धर्म के शत्रुओं को लगता है कि हिन्दू समाज अचेत झुंड है, आसान शिकार। इस का कोई नेतृत्व, कोई रखवाला नहीं। अतः अलग-अलग या समूह में भी हिन्दुओं को निपटाने में कोई बड़ी बाधा नहीं। आखिर, हाल में ही कश्मीरी हिन्दू सब के सामने मारे गए। भारत के हिन्दूवादी संगठन, अपनी सरकार, सेना, आदि के रहते हुए भी उसे वैसे ही देखते रहे, जैसे सौ साल पहले हिन्दू स्त्रियों को उठा ले जाना देखते थे!

इस भीरुता में सामाजिक और राजनीतिक अर्थ भी है। इसीलिए अब अनेक हिन्दू संस्थान अपने को ‘हिन्दू’ नहीं, बल्कि हिन्दुओं से अलग स्वतंत्र ‘अल्पसंख्यक’ कहलाना चाहते हैं। स्वयं स्वामी विवेकानन्द द्वारा स्थापित संस्था अपने को हिन्दू नहीं कहना चाहती। क्योंकि दुर्बल, उपेक्षित, लांछित, मूक-बेबस, बेचारे के साथ कौन रहना चाहेगा? इसीलिए, सौ साल पहले तक विश्व-विख्यात हरि मंदिर अब हिन्दू मंदिर नहीं कहा जाता! ऐसा कहने पर उस संप्रदाय के लोग आपत्ति करते हैं। 

यह सब अंततः आत्म-चेतना, स्वाभिमान और ताकत का मामला है। इस का दूरगामी महत्व इस विडंबना में है कि विश्व में भारत की पहचान हजारों साल से जिस धर्म-दर्शन, मनीषा और संस्कृति से रही है, वह धीरे-धीरे नष्ट की जाती रही। वह स्थिति आज भी नहीं बदली, बल्कि कुछ मायनों में तेज हो गई है। असंख्य लोग नाम के हिन्दू हैं। उन की धर्म-चेतना, भाषा, शिक्षा सब कुछ बदल रही है। यदि यह ऐसे ही चलता रहा तो देश की आत्मा समाप्त हो जाएगी। नाम वैसे ही ‘इंडिया’ हो गया है। भारत धीरे-धीरे छूट रहा है। महान कविगुरू रवीन्द्रनाथ का घर पहले ही भारत से छिन चुका। उन का नाम भी वंशजा ने छोड़ दिया। तो सैफ मियाँ क्यों न गुमान करें और बेटे को तैमूर कहें! सेक्यूलर इंडिया उसे सलाम करेगा।

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