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गंगा में प्रदूषण रोकने, आजीविका बहाली पर जोर

नई दिल्ली। जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने कहा है कि गंगा में दूषित पानी जाने से रोकने और शोधित जल के उपयोग की पहल करने के साथ गंगा पर आश्रित समुदायों की आजीविका बहाल करने के लिए भी परियोजनाएं तैयार की गई हैं। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार पर गंगा की निर्मलता और अविरलता सुनिश्चित करने के कार्यो की सुस्त रफ्तार के आरोप लगाए जा रहे हैं।

जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि नदियों खासकर गंगा में प्रदूषण को रोकने के लिए कई पहल की गई है। इसके तहत मथुरा रिफायनरी के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए गए हैं, साथ ही रेल मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, बिजली मंत्रालय, सड़क परिवहन मंत्रालय आदि के साथ भी सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किया गया है। इसके माध्यम से हमारा मकसद गंगा में दूषित जल को जाने से रोकना और शोधित जल का उपयोग करना सुगम बनाना है।

मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जल संसाधन मंत्रालय ने मथुरा रिफायनरी के साथ एमओयू किया है। यह तय हुआ है कि गंदे पानी को शोधित करके युमना में नहीं गिराया जाए बल्कि मथुरा रिफायनरी में इसका उपयोग हो। इसी प्रकार से बिजली मंत्रालय से भी एमओयू हुआ है और इसके तहत गंगा नदी के करीब स्थित बिजली संयंत्र नदी के शोधित जल का उपयोग करेंगे। रेल मंत्रालय के साथ समझौता किया है ताकि शोधित अपशिष्ट जल के लिए तेजी से बाजार विकसित किया जा सके। इसी तरह के समझौते पेट्रोलियम व उद्योग मंत्रालय के साथ किए गए हैं। सरकार द्वारा यह भविष्य के लिए उठाया गया कदम है जिसमें शोधित जल के लिए बाजार विकसित किया जाएगा और संरचनात्मक सुधार परियोजनाओं के पूरक होंगे। इससे नामामि गंगे के कार्यक्रम के अंतर्गत किए गए सामान आबंटन के साथ अनेक परियोजनाएं शुरू की जा सकेंगी।

जल संसाधन मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत विशिष्ट तौर पर आजीविका पहल को शामिल किया गया है जो समुदाय गंगा पर आश्रित थे, उनकी आजीविका को बहाल करने की बात कही गई है। इसमें आधुनिक तकनीक के प्रयोग पर भी जोर दिया गया है। गंगा नदी के किनारे स्थित करीब 118 शहरों से रोजाना निकलने वाले 363.6 करोड़ लीटर अवशिष्ट और 764 उद्योगों के हानिकारक प्रदूषकों के कारण नदी की धारा को निर्मल बनाना बहुत बड़ी चुनौती है। इस बारे में विभिन्न वर्गो की ओर से समय समय पर चिंता व्यक्त की गई है।

बहरहाल, सरकार का कहना है कि वह इन क्षेत्रों में उद्योगों से गंगा में आने वाले प्रवाह के आसपास आधुनिक प्रौद्योगिकी युक्त ऐसे यंत्र लगा रही है जिससे 15 मिनट से ज्यादा प्रदूषण फैलने पर उक्त उद्योग के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो सकेगी।

गंगा में प्रदूषण पर निगरानी रखने के लिए ‘गंगा कार्य बल’ के गठन के काम को आगे बढ़ाया गया है जिसमें पूर्व सैनिकों व अन्य लोगों को शामिल किया जा रहा है। ये गंगा नदी के सौ मीटर के दायरे में हर तरह के प्रदूषण पर नजर रखेंगे और उसे रोकने का काम करेंगे। कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी में इस पहल को सबसे पहले आगे बढ़ाया जा रहा है। वन व पर्यावरण मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि नदी के किनारे स्थित उद्योगों से निकलने वाले प्रवाह को हम 24 घंटे चलने वाले प्रदूषण निगरानी उपकरण से जोड़ने का काम आगे बढ़ा रहे हैं। यह नई प्रौद्योगिकी पर आधारित है और कई तरह की श्रेणियों में है।

इसके अतिरक्त कई परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। ये परियोजनाएं गंगा तथा इसकी सहायक नदियों के पास स्थित विभिन्न नगरों में शुरू किए जाने वाले नमामि गंगे कार्यक्रम के साथ घाटों, शवदाह गृहों के आधुनिकीकरण और विकास, जैव विविधता केंद्र स्थापित करने, नदी तल की सफाई के लिए ट्रेश स्कीमर का उपयोग करने, सीवेज शोधन संयंत्र स्थापित करने, सीवेज पंपिंग स्टेशन, मछली पालन केंद्र, नालों के अपशिष्ट जल के परिशोधन के लिए प्रायोगिक परियोजनाओं एवं वनीकरण आदि से संबंधित हैं।

मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुल 123 घाट, 65 शवदाह गृह, 8 जलमल अवसंरचना और 35 अन्य परियोजनाएं शुरू की गई हैं। 110 शहरों की पहचान की है जहां नदी-झीलों में अशोधित जलमल बहाया जाता है और सफाई के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। गंगा में जलमल बहाए जाने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में 114 नालों की पहचान की गई है। वे प्रतिदिन औसतन 6,614 मिलियन लीटर जलमल और उद्योगों से निकलने वाला पानी बहा रहे हैं । इसके अलावा अनेक छोटे नालों से उत्सर्जन पर भी ध्यान देने की पहल की जा रही है।

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