केदारनाथ आपदा की शिव व्याख्या- जो उसकी भयावहता को महसूस करवा देगी। - Naya India
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केदारनाथ आपदा की शिव व्याख्या- जो उसकी भयावहता को महसूस करवा देगी।

उत्तराखंड में स्थित विश्वप्रसिद्ध केदारनाथ का मंदिर हजारों श्रद्धालुओं का आस्था का केंद्र है। 16 जून 2013 का वो दिन आज भी याद करते रूह कांप जाती है। 16 जून 2013 का वो दिन शायद ही कोई भूला होगा। उस विनाश काली लीला ने पूरे भारत को झकझोड़ कर रख दिया। 16-17 जून 2013 को केदारनाथ में आई बाढ़ ने सब कुछ तबाह कर दिया सिवाय एक मंदिर के कुछ भी नहीं रहा। आज हम आपतो बताएंगे कि उस जलप्रलय ने कहां-कहां अपना आतंक मचाया था। आइये जानते है केदारनाथ घाटी में आई उस भयानक जलप्रलय के बारे में..

शरूआती बारिश सुहानी लग रही थी

14 जून की सुबह से ही बारिश लगातार हो रही थी लेकिन यह पर्टकों के लिए आनंद  बढ़ाने जैसी लग रही थी। 14 जून की बारिश से बद्रीनाथ मार्ग लंगासु के पास पुल टूट चुका था। तो प्रशासन ने भी अपना काम करते हुए यात्रियों को रूद्रप्रयाग से केदारनाथ की ओर भेज दिया। 15 जून का दिन भी सामान्य दिन की भांति प्रकृति की गोद में निकल गया। और बारिश की बूंदे यात्रियों को सहला रही थी। 16 जून भी आ गई और यह दिन भी सामान्य दिन की ही भांति था। केदारनाथ घाटी में हर सामान्य दिन की तरह आलौकिक। घाटी में भक्तों की कतीर चल रही थी। उसके साथ ही नदियों का पानी भी हिलोरे खाता हुआ चल रहा था मानों भक्तों के साथ यात्रा में साथ दे रहा था। भक्तों में भक्ति की धारा बह रही थी जैसे वहां के धरनों से पानी बह रहा था। भक्तों के मंदिर की तरफ बढ़ते कदम किस संगीत की तरह लग रहे थे तो उनका साथ दे रही थी कुदरत की हवा और बारिश जो पत्तों से टकराकर वातावरण को संगीतमय बना रही थी।

मंदाकिनी ने दिखया अपना रौद्र रूप

जैसे-जैसे दिन अपने ढ़लान पर आया वातावरण में कुछ हलचल सी लगी। 4:30 बजे केदारपुरी के सामने भंवरशिला में लैंड स्लाइड हुआ। तो केदारनाथ धाम में बह रही मंदाकिनी नदी रौद्र रूप में आ चुकी थी। रौद्र रूप के साथ बहती नदी के साथ समय गुजर रहा था। लेकिन रात 8 बजे तक रूप ऐसा भयानक हनुआ कि मंदाकिनी नदी के किनारे सभी होटल पुल बह गये। अब हालात सामान्य से असामान्य की ओर बढ़ चले थे। लोगों के अलग-अलग जगह बहने और फंसने की खबर आ रही थी। रात होते-होते नदी का रूप शांत होने लगा। और लोगों ने राहत की सांस ली। लेकिन आने वाली आपदा से बेखबर होकर। रात गुजर गई और सुबह हुई। इस खुशी में कि कोई बड़ा हादसा होने से बच गई। लेकिन प्रकृति को कौन समझ पाया है……

रामबाड़ा कस्बे का केवल नाम रह गया

दिन आ गया 17 जून 2013 सुबह 7 बजे चौराबारी ताल में हलचल होने लगी। बारिश के बाद चोराबारी लेक में ग्लेशियर आ गिरा। सोने पे सुहागा तब हुआ जब ग्लेशियर गिरने के बाद लेक में बादल फटा। चोराबारी लेक को चीरता हुआ पानी केदार घाटी में अपना तांडव करने लगा। और सभी को अपने आगोश में लेने लगा। उसके बाद यह हलचल किसी जलजले में परिवर्तित कितनी जल्दी हो गई इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते है कि 7ः30 बजे तक रामबाड़ा नाम का पूरा कस्बा पानी के आगोश में समा गया। उत्तराखंड के मानचित्र में रामबाड़ा एक नाम रह गया। उसका अस्तित्व पूरी तरह पानी के साथ बहकर साफ हो गया। 8 बजे केदारपुरी से आए पानी में गौरीकुण्ड से सोनप्रयाग तक का पुरा क्षेत्र समा गया।

मंदिर को नहीं आई कोई खरोंच

आपदा से पहले गौरीकुण्ड से केदाकनाथ जाने वाला पैदल मार्ग रामबाड़ा और गरूड़चट्टी से होकर गुजरता था। लेकिन मंदाकिनी की उफनती लहरों ने इस रास्ते को तबाह कर दिया। यह रास्ता तबाही की बेंट चढ़ गया। गरूड़चट्टी का भी अस्तित्व खत्म हो गया था। 2014 में रास्ता बदल दिया गया और चट्टी सूनी हो गई। 2017 में केदारनाथ पुनर्निमार्ण कार्यों ने जोर पकड़ा तो गरूड़चट्टी को सुधारने की कवायद भी तेज हुई। अक्टूबर 2018 में रास्ता चैयार कर लिया गया। उस आपदा में अगर कोई सुरक्षित था तो वह था केदैरनाथ का चमत्कारी मंदिर।

लाशें केदारनाथ से बहकर हरिद्वार तक आई

ऊपर आसमान से बरसती आफत और नीचे मंदाकिनी का रौद्र रूप मंजर ऐसा हो गया कि जो पानी के कहर से बच गया उसने ऐसे मंजर को देख जान गंवा दी। रूद्रप्रयाग, चमोली, उत्तकांशी, बागेश्वर, पिथौरागढ़ की नौ लाख आबादी आपदा से दहल गई। यही नहीं लाशे बह कर हरिद्वार कर आई थी।  4200 से ज्यादा गांवों से संपर्क टूट गया। कितने ही भवन क्षतिग्रस्त हो गए। कितने ही पानी में बह गए यह अंदाजा वहां के मंजर को देख कर लगाया जा सकता है। लेकिन कितने लोगों ने जान गंवाई यह जान भी ले तो कितने लापता हुए उस अंदाजे के तो शायद आस-पास बी नहीं भटक पाएंगे।

जिसने वह मंजर देखा सहम उठा

इस भयानक आपदा के मंजर जिस किसी ने भी प्रत्यक्ष देखा वह कितना सहम गया यह तो है ही। लेकिन उस जलजले के शांत होने के बाद जो मंजर पसरा उसे देखने वालों ने भी आपदा की भयावहता का अनुभव कर लिया। बाढ़ के बाद पसरा सन्नाटा ऐसा था जो कानों में चुभन पैदा कर दें। बाढ़ के बाद फैली लाशें ऐसी थी जो आंखें बंद करने पर भी मस्तिष्क में घूम रही थी। जिस घाटी में हमेशा चहल पहल रहा करती थी वहां पैला सुनापन इतना तीक्ष्ण ध्वनि में रो रहा था कि जान बचाने वालों नें बी होश गंवा दिए।

नया इंडिया टीम की तरफ से भावभीनी श्रद्धांजली

आपदा के जख्म शायद कभी नहीं भर पाएंगे। राहत और पुनर्निमाण के मरहन से हालात सुधारने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार ने अपना पुरा प्रयत्न किया है। केदारघाटी में बिछि लाशों को उठाने का साहस किसी में नहीं था। लाशों की संख्या इतनी अधिक थी कि सरकार ने मलबों को हटाए बिना ही काम करने का आदेश दे दिया। उस आपदा में जो लोग अपने परिवार वालों से बिछड़े से उनके घाव तो शायद कभी नहीं भरेंगे। नया इंडिया की पूरी टीम केदारनाथ आपदा में जान गंवाने वालों को भानभीनी श्रंद्धाजली देती है। और केदारनाथ बाबा से यह प्रार्थना करती है कि ऐसी आपदा भविष्य में कभी ना आए।

Kedarnath Temple is a Hindu temple dedicated to Lord Shiva, which located in the Garhwal Himalayas, India.

केदारनाथ की आपदा के बाद हुए चमत्कार

  1. जब केदारनाथ घाटी मे जनप्रलय का भीषण दौर चल रहा था। मंदिर के पीछ कई बड़े-छोटे पत्थर आ रहे थे। इन सभी के साथ अत्यंत विशालकाय चट्टान भी आई जो मंदिर के थोड़ी सी पीछे ही रूक गई। यह चट्टान बनी मंदिर की रक्षक। इसके बाद जब चट्टानों का भारी मलबा और तपफानी पानी मंदिर की ओर आया तो इस चट्टान ने सभी को दो भागों ने विभाजित कर दिया। मंदिर को कोई छू भी नहीं सका। इसके बाद इस चट्टान का नाम पड़ा- भीमशील। ऐसा कहते है कि इतनी शक्ति और बल केवल महाबली भीम में है जो इतने विशाल पत्थर को मंदिर की सुरक्षा के लिये ला सकें।

Kashmiri Pandit कश्मीरी पण्डित on Twitter: "AUM Namah Shivay !! Bhim Shila  - A massive boulder blocked path of water & saved temple from flood of 2013  Believed to be built by

  1. हैरान कर देने वाली यह है कि बाढ़ के दिन से कई महीनों तक मंद्र में कोई पुजा नहीं हुई। डोली को हैलिकॉप्टर के सहारे उखीमठ लाया गया। लेकिन जब बाढ़ गई तो शिवलिंग पर बेलपत्र मौजूद था। शिवलिंग का आध भाग मलबे में इस तरह दबा था ति मनो शिव समाधि में लीन बैठे है।
  2. विनाशकारी बाढ़ ने सबकुछ तबाह कर दिया। किसी को नहीं छोड़ा। केदारनाथ का मंदिर और सामने बैठे रक्षक नंदी महाराज आपदा के बाद सुरक्षित थे।
  3. आपको पता हो तो केदारनाथ में अखंड ज्योत हमेशा जलती रहती है जब आपदा आकर चली गई और पुजारियों ने देखा तो अखंड ज्योत जल रही थी। मंदिर के कपाट शीतकाल में 6 महीने बंद रहते है और 6 महीने ग्रीष्म काल में खपले रहते है। जब मंदिर के कपाट खुलते है तब अखंड ज्योत जलती रहती है। उसके दर्शन के लिए लाइन लगती है।

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