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एलोपैथी का नामकरण होम्योपैथी के जनक ने किया..आइये जानते हैं इसकी कार्यविधि

DELHI: इस समय देश में एलोपैथी और आयुर्वेद के बीच जंग छिड़ी हुई है। दोनों एक-दूसरे पर तीखे शब्दों से वार कर रही है। लेकिन ये वार कम होने का नाम नहीं ले रहा है। योग गुरु रामदेव ने बीते दिनों एलोपैथ पर विवादित बयान देते हुए उसे कम कारगर बताया। एक चैनल पर IMA और योगगुरु रामदेव पर बहस छिड़ गई थी। रामदेव बाबा का कहना है कि एलोपैथी  के पास एसिडिटी का इलाज नहीं है। कोरोना की दवांएं ज्यादा मंहगी होने पर भी हमला किया है। बाबा रामदेल ने एलोपैथी को नई विधा कहा था। वैसे ये बात किसी हद तक सही भी है कि एलोपैथ, आयुर्वेद की तुलना में ज्यादा आधुनिक विज्ञान है। वैसे एलोपैथी के बारे में एक बात दिलचस्प है कि इसका नामकरण उस चिकित्सक ने किया, जिसे होमियोपैथी का जनक कहा जाता है। जी हां, जर्मन वैज्ञानिक और चिकित्सक सैमुअल हेनिमैन ने होमियोपैथी की जोड़ पर ये नाम दिया।

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एलोपैथी के काम करने का तरीका

एलोपैथ टर्म का सबसे पहले इस्तेमाल साल 1810 में हुआ था, जिसे जर्मन चिकित्सक सैमुअल हेनिमैन ने दिया था। ये शब्द ग्रीक टर्म से आया, एलोस यानी अलग और पैथोज यानी सफरिंग। इसके तहत जो दवाएं दी जाती हैं, वो होमियोपैथी (वैकल्पिक चिकित्सा) से एकदम अलग होती हैं। होमयोपैथी में उस तत्व की हल्की खुराक दी जाती है, जिसके कारण बीमारी होती है। वहीं एलोपैथी में लक्षण के विपरीत यानी उसे दबाने की दवा दी जाती है। जैसे कब्जियत के मरीज को लैक्जेटिव दिया जाता है। या फिर शरीर का तापमान बढ़ने पर बुखार घटाने की दवा देते हैं।

सर्जरी किसी और मैथड़ में नहीं

शुरुआत में लोग इलाज के इसके तरीकों से दूर भागते लेकिन कुछ ही समय में ये लोकप्रिय विधा हो गई। इसे आधुनिक या पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान भी कहते हैं। कई बार इसे ऑर्थोडॉक्स मेडिसिन भी कहा जाता है। इसके तहत डॉक्टर, नर्स, फार्मासिस्ट, और दूसरे हेल्थकेयर प्रोफेशनल डिग्री-डिप्लोमा लेकर और फिर लाइसेंस लेकर प्रैक्टिस कर सकते हैं।इसके तहत दवाएं, सर्जरी, रेडिएशन और दूसरी तरह की थैरेपी आती हैं। सर्जरी एलोपैथी की सबसे अहम खूबी मानी जाने लगी है, जो चिकित्सा के दूसरे किसी वैकल्पिक मैथड में नहीं।होमयोपैथी, नैचुरोपैथी, यूनानी या आयुर्वेद में फिलहाल सर्जरी नहीं होती है।

इस तरह की हैं दवाएं

ट्रीटमेंट के इस दायरे को बढ़ाकर देखें तो इसके तहत एंटीबायोटिक, ब्लड प्रेशर से जुड़ी दवाएं, डायबिटीज की दवा, कीमोथैरेपी जैसी चिकित्सा विधियां अपनाई जाती हैं। हॉर्मोन से जुड़ी समस्याओं का इलाज भी एलोपैथी में खूब होता है। ये तो वे दवाएं हुईं, जिन्हें चिकित्सक अपने प्रिस्क्रिप्शन में लिखता है। इसके अलावा कई ओवर-द-काउंटर (OTC) दवाएं भी होती हैं, यानी वो दवा जो दवा दुकान से सीधे खरीदी जा सकती है। जैसे दर्द की दवा, कफ और दूसरी तरह की ड्रग्स।

संगठित तरीके से काम करती है एलोपैथी

फिलहाल एलोपैथिक दवाओं पर भरोसा करने वाले लोग काफी ज्यादा हैं तो इसकी वजह भी है. असल में इसका पूरा हेल्थकेयर सिस्टम है, जिसमें पढ़ाई और अनुभव के साथ लोग डॉक्टर, नर्स या फॉर्मासिस्ट बनते हैं। किसी दवा को देने से पहले उसकी क्लिनिकल रिसर्च और फिर ह्यूमन ट्रायल होता है ताकि दवा से कोई खतरा न हो. अलग-अलग चरणों के ट्रायल में तय किया जाता है कि किस आधार पर, किसे दवा की कितनी खुराक दी जानी चाहिए। इसका अर्थ है, बीमारी से पहले ही उसे रोका जा सकना। ये काम एलोपैथी की शुरुआत में नहीं होता था। अमेरिकन कॉलेज ऑफ प्रिवेंटिव मेडिसिन ने अपनी स्टडी में पाया कि तब वैक्सीन या ऐसी दवाएं नहीं थीं, जिससे किसी बीमारी को आने से रोका जा सके।

वैश्विक संस्थाएं रखती हैं कड़ी निगरानी

साथ ही इसपर नजर रखने के लिए कई संस्थाएं हैं, जिन्हें न्यूट्रल माना जाता है। फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन और अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन ऐसी ही संस्थाएं हैं। वहीं आयुर्वेद, होमियोपैथी, या नैचुरोपैथी में इस तरह की रिसर्च और संस्थाओं का अभाव दिखता है।मॉर्डन चिकित्सा विज्ञान के अलावा बहुत से लोग वैकल्पिक तरीकों पर भी भरोसा करते हैं। इसे कॉम्प्लिमेंटरी एंड अल्टरनेटिव मेडिसिन कहते हैं.। हॉपकिन्स मेडिसिन वेबसाइट के मुताबिक अकेले अमेरिका में ही 38% व्यस्क और 12% बच्चे ये इलाज लेते हैं। इनमें आयुर्वेद, होमियोपैथी, नैचुरोपैथी, एक्युप्रेशर, एक्युपंक्चर और चाइनीज मेडिसिन आते हैं।

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