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चारधामयात्रा2021 : पूरे विधि-विधान के साथ ब्रह्म मुहुर्त में खुले भगवान बद्रीनाथ के कपाट, 8 क्विटल फूलों से सजाया गया भगवान का द्वार..

आज सुबह ब्रह्म मुहुर्त में बद्रीविशाल के कपाट खुल चुके है। बद्रीनाथ के कपाट खुलने के साथ चारों धाम के कपाट भी खुल चुके है। इसी के साथ चारधाम यात्रा का श्री गणेश हो चुका है।उत्तराखंड में बद्रीविशाल धाम के कपाट पुष्य नक्षत्र और वृष लग्न में धार्मिक परम्पराओं के साथ मंगलवार को ब्रह्ममुहूर्त में खोल दिए गए। सोमवार को मंदिर की सजावट शुरु कर दी गई थी। भक्तों को चारधाम यात्रा का बेसब्री से इंतज़ार रहता है। लेकिन इस वर्ष श्रद्धालुओं के लिए चारधाम यात्रा स्थगित कर दी गई है। भारत में कोरोना के हालात ज्यादा खराब है। इस कारण लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए उत्तराखंड सीएम ने चार धाम यात्रा पर रोक लगा दी है। महज पुजारी-रावल व देवस्थानम बोर्ड के सदस्य ही मंदिर की व्यवस्थाओं को संभालने के लिए बद्रीनाथ धाम में रुक सकेंगे। मंगलवार को भगवान बद्रीविशाल की विशेष पूजा-अर्चना कर कोरोना महामारी से पूरे विश्व को निजात पाने की प्रार्थना की गई। इस अवसर पर मंदिर परिसर को भव्य रूप से लगभग आठ कुंतल फूलों और मालाओं से सजाया गया। मंगलवार को ब्रह्ममुहूर्त पर 4:15 बजे भगवान बदरीनाथ के कपाट छह माह के लिए खोले गए। यहां प्रतिदिन भगवान बद्रीविशाल जी का अभिषेक और पूजा-आरती निरन्तर चलती रहेंगी। कपाट खुलते समय कुछ ही लोगों के आने की अनुमति थी। सामाजिक दूरी और मास्क का पालन किया गया। इस अवसर पर भगवान बदरीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी रावल ईश्वरप्रसाद नमूदारी और धर्माधिकारी, वेदपाठी व पूजारीगण, देवस्थानम बोर्ड के अधिकारी उपस्थित रहे। साथ ही देवस्थानम बोर्ड के अधीनस्थ मंदिरों के अलावा श्री आदिकेदारेश्वर, श्री शंकराचार्य मंदिर के कपाट भी धार्मिक परम्पराओं के अनुसार पूजा-अर्चना के साथ खोल दिए गए।

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भगवान बद्रीनाथ के कपाट खुलने की विधि

ऐसा कहते है जिस मनुष्य ने जीवन में एक बार बद्रीनाथ के दर्शन कर लिए उस मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती है। बद्रीनाथ को बैकुंठ धाम भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार यहां भगवान विष्ण और माता लक्ष्मी निवास करते है। भगवान बद्रीनाथ कपाट शीतकाल में छः माह के लिए बंद कर दिये जाते है और ग्रीष्मकाल आते ही खोल दिए जाते है। मंदिर के कपाट खुलते ही सबसे पहले प्रथम पुज्य श्री गणेश की पुजा की जाती है। भगवान गणेश की स्थपना और पुजन विधि के बाद भगवान विष्ण और माता लक्ष्मी को स्नान करवा कर अभिषेक किया जाता है। कपाट बंद करते समय भगवान विष्ण और माता लक्ष्मी की मुरत का चंदन से लेप किया जाता है। और किसी कपड़े से लपेटकर चंदन के कुंड में छः माह के लिए रख दिया जाता है। भगवान विष्ण और माता लक्ष्मी की मुर्ति शालिग्राम की बनी है। जिससे शीतकाल में कोई खराबी ना हो। बद्रीनाथ धाम के समीप दो कुण्ड है गर्म पानी का कुण्ड और ठंडे पानी का कुंड। ऐसा कहते है गर्म पानी का कुण्ड कहां से आया कुछ पता नहीं है। वैज्ञानिकों ने भी इस पर कई बार खोड की। इसको खोद कर देखा भी गया लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। ऐसी मान्यता है कि गर्म पानी में एक बार स्नान करने से त्वचा संबंधी सभी रोग दूर हो जाते है।  ठंडे पानी का कुंड हिमालय से बर्फ पिघलकर आती है जिस से इस कुंड का निर्माण हुआ।

बद्रीनाथ का नामकरण कैसे हुआ

हिमालय में स्थित बद्रीनाथ क्षेत्र भिन्न-भिन्न कालों में अलग नामों से प्रचलित रहा है। स्कन्दपुराण में बद्री क्षेत्र को “मुक्तिप्रदा” के नाम से उल्लेखित किया गया है,जिससे स्पष्ट हो जाता है कि सत युग में यही इस क्षेत्र का नाम था। त्रेता युग में भगवान नारायण के इस क्षेत्र को “योग सिद्ध”, और फिर द्वापर युग में भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन के कारण इसे “मणिभद्र आश्रम” या “विशाला तीर्थ” कहा गया है। कलियुग में इस धाम को “बद्रिकाश्रम” अथवा “बद्रीनाथ” के नाम से जाना जाता है। स्थान का यह नाम यहाँ बहुतायत में पाए जाने वाले बद्री (बेर) के वृक्षों के कारण पड़ा था। एडविन टी॰ एटकिंसन ने अपनी पुस्तक, “द हिमालयन गजेटियर” में इस बात का उल्लेख किया है कि इस स्थान पर पहले बद्री के घने वन पाए जाते थे, हालाँकि अब उनका कोई निशान तक नहीं बचा है।

बद्रीनाथ नाम की उत्पत्ति पर एक कथा भी प्रचलित है, जो इस प्रकार है – मुनि नारद एक बार भगवान् विष्णु के दर्शन हेतु क्षीरसागर पधारे, जहाँ उन्होंने माता लक्ष्मी को उनके पैर दबाते देखा। चकित नारद ने जब भगवान से इसके बारे में पूछा, तो अपराधबोध से ग्रसित भगवान विष्णु तपस्या करने के लिए हिमालय को चल दिए। जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बद्री के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं। माता लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गयीं। कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि “हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बद्री वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बद्री के नाथ-बद्रीनाथ के नाम से जाना जायेगा। तभी से मातालक्ष्मी और भगवान विष्णु की की यहां पूजा की जाती है।

पंच बद्रीनाथ की विशेष मान्यता

जिस प्रकार पंच केदार है , पंच प्रयाग है उस प्रकार बद्रीनाथ के भी पांच मंदिर है। इन मंदिरों में भगवान बद्रीनाथ अथार्त भगवान विष्णु की अलग-अलग प्रतिमाएं स्थापित है। बद्रीनाथ, योग ध्यान बद्री, भविष्य बद्री, वृद्ध बद्री, आदिबद्री…ये है बद्रीनाथ के पांच मंदिर है। इन मंदिरों में भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है।

भव्ष्यि में लुप्त हो जाएंगे भगवान बद्रीनाथ

बद्रीनाथ जाते समय दो पहाड़ आते है -नर और नारायण। ऐसा कहते है वो पहाड़ पास आते जा रहे है और एक दिन ये दोनों पहाड़ आपस में मिल जाएंगे। इस कारण बद्रीनाथ धाम जाने के रास्ते बंद हो जाएंगे। बद्रीनाथ जाते समय ये दो पहाड़ रास्ते में आते है जिस दिन नर और नारायण नाम के पर्वत मिल जाएंगे उस दिन बद्रीनाथ जाने का रास्ता भी बंद हो जाएगा।

मुख्यमंत्री रावत ने दी शुभकामनाएं

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने समस्त देशवासियों को बद्रीनाथ के कपाट खुलने की खुलने की खुशी में शुभकामनाएं दी है। भगवान बद्रीनाथ के कपाट सुबह 4ः15 बजे ब्रह्म मुहुर्त में खोले गये। मैं बाबा बद्रीनाथ से सभी को निरोगी रखने की प्रार्थना करता हूं। भगवान बद्रीनाथ के रावल की अगुवाई में तीर्थ पुरोहित सीमित संख्या में मंदिर में बाबा बद्रीनाथ की पूजा-अर्चना नियमित रूप से करेंगे। मेरा अनुरोध है कि महामारी के इस दौर में श्रद्धालु घर में रहकर ही पूजा-पाठ और धार्मिक परंपराओं का निर्वहन करें।

भगवान बद्रीनाथ के बारे में पौराणिक लोक कथाएं

पौराणिक लोक कथाओं के अनुसार, बद्रीनाथ तथा इसके आस-पास का पूरा क्षेत्र किसी समय शिव भूमि (केदारखण्ड) के रूप में अवस्थित था। जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह बारह धाराओं में बँट गई, तथा इस स्थान पर से होकर बहने वाली धारा अलकनन्दा के नाम से विख्यात हुई। मान्यतानुसार भगवान विष्णु जब अपने ध्यानयोग हेतु उचित स्थान खोज रहे थे, तब उन्हें अलकनन्दा के समीप यह स्थान बहुत भा गया। नीलकण्ठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतार लिया, और क्रंदन करने लगे। उनका रूदन सुन कर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा, और उन्होंने बालक के समीप उपस्थित होकर उसे मनाने का प्रयास किया, और बालक ने उनसे ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया। यही पवित्र स्थान वर्तमान में बद्रीविशाल के नाम से सर्वविदित है।

विष्णु पुराण में इस क्षेत्र से संबंधित एक अन्य कथा है, जिसके अनुसार धर्म के दो पुत्र हुए- नर तथा नारायण, जिन्होंने धर्म के विस्तार हेतु कई वर्षों तक इस स्थान पर तपस्या की थी। अपना आश्रम स्थापित करने के लिए एक आदर्श स्थान की तलाश में वे वृद्ध बद्री, योग बद्री, ध्यान बद्री और भविष्य बद्री नामक चार स्थानों में घूमे। अंततः उन्हें अलकनंदा नदी के पीछे एक गर्म और एक ठंडा पानी का चश्मा मिला, जिसके पास के क्षेत्र को उन्होंने बद्री विशाल नाम दिया।यह भी माना जाता है कि व्यास जी ने महाभारत इसी जगह पर लिखी थी, और नर-नारायण ने ही क्रमशः अगले जन्म में क्रमशः अर्जुन तथा कृष्ण के रूप में जन्म लिया था। महाभारतकालीन एक अन्य मान्यता यह भी है कि इसी स्थान पर पाण्डवों ने अपने पितरों का पिंडदान किया था। इसी कारण से बद्रीनाथ के ब्रम्हाकपाल क्षेत्र में आज भी तीर्थयात्री अपने पितरों का आत्मा का शांति के लिए पिंडदान करते हैं।

ऑनलाइन चारधाम के दर्शन कराएगी उत्तराखंड सरकार

कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामले और देश दुनिया के तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सरकार की ओर से इस साल चारधाम यात्रा को स्थगित किया गया है। ऐसे में संकट के इस समय श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए भक्तों के लिए सरकार चारधाम के वर्चुअल दर्शन कराने की तैयारी कर रही है। जिससे घर बैठे लोग चारधाम के दर्शन कर सकेंगे। इस संबंध में पर्यटन मंत्री  सतपाल महाराज ने मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के साथ भी चर्चा की।

यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ के वर्चुअल दर्शन की व्यवस्था करने से चारों धामों के दर्शन के इच्छुक श्रद्धालु मंदिर के गर्भगृह को छोड़कर बाकी मंदिर परिसर के ऑनलाइन दर्शन और ऑडियो के माध्यम से पूजा अर्चना कर सकेंगे। पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने चारधाम देवस्थानम बोर्ड के सीईओ रविनाथ रमन को ऑनलाइन दर्शन की व्यवस्था करने के निर्देश दिए। पर्यटन मंत्री ने कहा कि देश-विदेश के तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार की ओर से चारधाम को स्थगित करने का फैसला लिया है। श्रद्धालुओं की भावना का आदर करते हुए चारधाम के वर्चुअल दर्शन करने के लिए व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं। जिससे कोरोनाकाल में घर पर सुरक्षित रहकर तीर्थयात्री चारधाम के वर्चुअल दर्शन करने के साथ पूजा-पाठ और भोग लगाने के साथ आरती भी कर सकेंगे।

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