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Good news : ब्लैक फंगस के लिए भी आया इंजेक्शन- एम्फोटेरिसन-बी लाइपोसोमल..आइये जानते है कैसे काम करता है ये इंजेक्शन

कोरोना महामारी अपने साथ कई बीमारियां लाई है। कोरोना से ठीक हो रहे मरीजों में ब्लैक फंगस की समस्या सामने आ रही है। ब्लैक फंगस का समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। देश के विभिन्न इलाकों से ब्लैक फंगस के मरीज बढ़ने की खबरें सामने आ रही हैं। बता दें कि ब्लैक फंगस से मरीज की आंखों की रोशनी भी जाने का डर है और साथ ही यह मरीज की जान पर भारी भी पड़ सकता है। कई मरीजों की आंखे जा चुकी है और उनकी आंखें निकाली जा चुकी है। लेकिन हर मर्ज़ की दवा होती है। कोरोना की वैक्सीन आई तो ब्लैक फंगस की  दवा बनाई जा चुकी है। इस बीमारी का इलाज है एम्फोटेरिसिन-बी लाइपोसोमल इंजेक्शन। अगर मरीज को इस इंजेक्शन की डोज दी जाएं तो कोई खतरा नहीं है। हालांकि इस ब्लैक फंगस के मामले बढ़ने के साथ ही देश में एम्फोटेरिसिन बी लाइपोसोमल इंजेक्शन की कमी देखने को मिल रही है। बीमारी इतनी बड़ी संख्या में फैल रही है कि इंजेक्शन की हो रही है।

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क्या है एम्फोटेरिसिन बी लाइपोसोमल इंजेक्शन

यह एक एंटी फंगल इंजेक्शन है। यह शरीर में फंगस की ग्रोथ को रोक देता है, जिससे संक्रमण बढ़ने का खतरा खत्म हो जाता है। कोरोना संक्रमण के बाद कई मरीजों में ब्लैक फंगस या म्यूकरमाइकोसिस के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे में एम्फोटेरिसिन बी लाइपोसोमल इंजेक्शन इसके इलाज में काफी कारगर है। ये इंजेक्शन मरीज को रोजाना लगाने की जरूरत पड़ती है और 15-20 दिन तक इस इंजेक्शन की डोज देने पड़ती है। इस इंजेक्शन की भारतीय बाजार में कीमत 7-8 हजार रुपए हो सकती है. चूंकि आजकल इस इंजेक्शन की काफी मांग है, इसलिए इसकी भारतीय बाजार में कमी भी देखी जा रही है। इस बात का ध्यान जरूर रखें कि इस इंजेक्शन के साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं।इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के इस इंजेक्शन का इस्तेमाल ना करें। कोरोना काल में कुछ भी खुद से ना ले एक बार डॉक्टर से सलाग-मशवरा जरूर कर लें।

कैसे होते हैं मरीज ब्लैक फंगस के शिकार

विशेषज्ञों का कहना है कि ब्लैक फंगस या म्यूकरमाइकोसिस बीमारी म्यूकरमाइसिटीज नामक फंगस से होती है। यह फंगस हमारे वातावरण जैसे हवा, नमी वाली जगह, मिट्टी, गिली लकड़ी और सीलन भरे कमरों आदि में पाई जाती है। स्वस्थ लोगों को यह फंगस कोई नुकसान नहीं पहुंचाती है लेकिन जिन लोगों की इम्यूनिटी कमजोर है, उन्हें इस फंगस से इंफेक्शन का खतरा है।

कोरोना मरीजों को क्यों है ब्लैक फंगस से ज्यादा खतरा

कई कोरोना मरीजों में उनकी इम्यूनिटी ही उनकी दुश्मन बन जाती है और वह हाइपर एक्टिव होकर शरीर की सेल्स को ही तबाह करना शुरू कर देती है। ऐसे में डॉक्टर मरीज को इम्यूनिटी कम करने वाली दवाएं या स्टेरॉयड देते हैं।यही वजह है कि कोरोना मरीजों में ब्लैक फंगस का खतरा बढ़ गया है। इसके अलावा डायबिटीज और कैंसर के मरीजों में भी इम्यूनिटी कमजोर होती है, जिससे उन्हें भी ब्लैक फंगस का खतरा ज्यादा होता है।

ब्लैक फंगस आंखों और ब्रेन को पहुंचा रहा नुकसान

म्यूकोरमाइकोसिस या ब्लैक फंगस मरीज के शरीर में घुसकर उसकी आंखों और ब्रेन को नुकसान पहुंचा सकता है।साथ ही स्किन को भी हानि पहुंचा सकता है। यही वजह है कि ब्लैक फंगस के मरीजों में आंख की रोशनी जाने और जबड़ा या नाक में संक्रमण फैलने की खबरें आ रही हैं। जिन्हें कई बार ऑपरेशन से निकालने की नौबत भी आ रही है। कई मामलों में यह मरीज की जान भी ले सकता है।

ये हैं लक्षण

ब्लैक फंगस के लक्षण की बात करें तो इससे मरीज के चेहरे में एक तरफ दर्द या सुन्न होने की समस्या हो सकती है। इसके अलावा आंखों में दर्द, धुंधला दिखना या आंख की रोशनी जाना भी इसके संक्रमण के लक्षण हैं। नाकसे भूरे या काले रंग का डिस्चार्ज आना और चेहरे पर काले धब्बे, बुखार, सीने में दर्द, सांस लेने में तकलीफ, जी मिचलाना, पेट दर्द और उल्टी आदि की समस्या भी हो सकती है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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