आइये जानते है तरबूज का इतिहास और इसका नया शोध, सबसे पहले तरबूज मिस्र में उगाए गए.. - Naya India
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आइये जानते है तरबूज का इतिहास और इसका नया शोध, सबसे पहले तरबूज मिस्र में उगाए गए..

वैसे तो फलों का राजा आम है लेकिन हर फल का अपना महत्व है। हर फल का एक इतिहास है आज हम तरबूज के इतिहास के बारे में जानेंगे। वे सबसे पहले कहां उगाए गए। सबसे ज्यादा कहां उगाए, कहां कहां और कैसे फैले।इनके उगाने के पीछे क्या धारणाथी? आज बात करेंगे तरबूज की..इनके इतिहास के बारे में। इनमें तरबूज की कहानी जरा रोचक है क्योंकि हाल ही में हुए एक शोध ने तरबूज की वास्तविक उत्पत्ति के बारे में दशकों पुरानी धारणा को तोड़ा है। अब नए शोध के मुताबिक तरबूज दक्षिणी अफ्रिका में नहीं बल्कि सबसे पहले मिस्र में उगाए गए थे।

4,000 वर्ष पहले नील नदी के रेगिस्तान में खाए जाते थे

प्रोसिडिगंस ऑप द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित इस नए अध्ययन में घरेलू तरबूज के उत्पत्ति की कहानी फिर से लिखी गई है। वैज्ञानिकों ने सभी और सैकड़ों प्रजातियों वाले तरबूज जो ग्रीनहाउस पौधों से पैदा किए थे, के डीएनए का अध्ययन किया और पाया कि तरबूज उत्तरपूर्वी अफ्रिका के जगंली फसल से आए थे। इस अध्ययन ने 90 साल पुरानी गलती को सुधारा है। तब से कहा जा रहा है कि रसीले तरबूज दक्षिणी अफ्रीकी सिट्रॉन मेलन की श्रेणी में ही आया करते हैं। लेकन इस अध्ययन के प्रमुख लेखक और सेंट लुईस में वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी ने पाया कि सूडान का मीटा सफेद तरबूज जिसे कोरडोफैन तरबूज कहते हैं वह खेती कर उगाया जाना वाला सबसे नजदीकी तरबूज है। इस जेनेटिक शोध के नतीजे हाल ही में पाई गई मिस्र की एक पेंटिंग से मेल खाते है जिसमें दिख रहा है कि तरबूज 4 हजार साल पहले के समय से नील नदी के रेगिस्तान में खाए जाते थे।

अनेक प्रोफेसर का तरबूज पर अध्यन

वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के आर्ट्स एंड साइंसेस में जीवविज्ञान की प्रोफेसर सुजैन एस रेनर ने बताया कि डीएनए के आधार उनकी टीम ने पाया कि जिस तरह का तरजूब आज प्रचलित है, जो मीठा, लाल और कच्चा खाने वाला होता है, वह पश्चिम और उत्तर पूर्व अफ्रीका के जंगली तरबूज के सबसे करीब है। रेनर इवोल्यूशनरी बायोलॉजिस्ट है जो 17 साल तक जर्मनी की म्यूनिख में लुडविंग मैक्जिमिलन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के तौर पर काम करने के बाद हाल में वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी से जुड़ी है।

जर्मनी में रेनर म्यूनिख बॉटेनिकल गार्डन और म्यूनिख हर्बेरियम के निदेशक भी रही हैं। उनकी लैब ने लंबे समय तक हनी मेलन और ककड़ी की प्रजातियों पर ध्यान केंद्रित किया, लेकिन पिछले 10 सालों ने वे तरबूज और करेले पर शोध कर रही थीं। यह अनुवांशिकी अध्ययन न्यूयॉर्क में अमेरिकी कृषि विभाग, लंदन में क्वे के द रॉयल बॉटेनिक गार्डन, और शेफील्ड यूनिवर्सिटी के साथियों के सहयोग से पूरा हुआ। रेनर का कहना है कि यह अध्ययन और ज्यादा रोगप्रतिरोधी तरबूज विकसित करने में काम आ सकता है।

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