भारतीय संस्कृति का प्रतिबिम्ब है मॉरीशस : गोवरधन - Naya India
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भारतीय संस्कृति का प्रतिबिम्ब है मॉरीशस : गोवरधन

बीकानेर। भारत में मॉरिशस गणराज्य के उच्चायुक्त जगदीश्वर गोवरधन ने कहा है कि मॉरीशस भारतीय संस्कृति और जीवनशैली का प्रतिबिम्ब है। गोवरधन ने बताया आज यहां विशेष भेंट में बताया कि लोगों की सेवा कैसे की जाए इसके लिए पूरी दुनिया को मॉरिशस से सीखना चाहिये।

मॉरिशस में लोगों के कल्याण के लिए जो सुविधाएं दी जा रही हैं, वह दुनिया में कहीं नहीं हैं। मॉरिशस में किसी भी धर्म, सम्प्रदाय का व्यक्ति हो उसके लिए रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मुलभूत सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। उनकी जरुरतों की पूर्ति करने का भरसक प्रयास किया जाता है।

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उन्होंने कहा कि मॉरिशस की गणना वर्तमान में विकसित देशों में की जाती है। विश्व के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक मॉरिशस समुद्र के मध्य स्थित छोटा सा अत्यंत सुंदर टापू है। सम्पूर्ण धन-धान्य सम्पन्न देश में लोगों का जीवन काफी सुख व समृद्धिमय है। मॉरिशस की स्वतंत्रता से लेकर प्रगति तक के सूत्रधार एवं पुरोधा आध्यात्मिक संत स्वामी श्रीकृष्णानंदजी सरस्वती थे। उन्होंने बताया कि राजस्थान में बीकानेर जिले के दासौड़ी गांव में जन्मे स्वामी कृष्णानंदजी सरस्वती ने विश्वस्तर पर भारतीय संस्कृति की पताका फहरायी है।

मॉरिशस में हजारों लोगों को शिक्षा-दीक्षा का समुचित प्रबंध एवं धार्मिक जागरण के माध्यम से एकजुट करने वाले स्वामी कृष्णानंदजी की वजह से ही मॉरिशस में अद्भुत कार्य हुए। इन्हीं कार्यों की बदौलत स्वामी जी द्वारा प्रशिक्षित 40 शिष्य मॉरिशस की सत्ता संभालते रहे हैं।
श्री गोवरधन ने बताया कि मॉरिशस में तमिल, तेलूगू सहित विभिन्न राज्यों के लोग न केवल भारत की तरह हर त्यौहार जैसे जन्माष्टमी, रामनवमी, दीपावली मिल-जुलकर मनाते हैं। वहां स्वास्थ्य, परिवहन और शिक्षा यूनिवर्सिटी तक शिक्षा निशुल्क है।

पेंशन भी मिलती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रभाषा, मातृभाषा से ही हमारी पहचान है, उसे छोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि भारत की संस्कृति, हिंदूत्व ऐसा है जैसा कहीं नहीं है। वहां नौजवानों को धर्म, योग, संस्कृति का प्रशिक्षण दिया जाता है। स्वामी कृष्णानंदजी सरस्वती की प्रेरणा से मॉरिशस में लोगों की आस्था को संबल प्रदान करते हुए धर्म-संस्कृति का ध्यान रखा गया है। इसी के चलते एक लाख रामायण (रामचरित मानस), एक लाख हनुमान चालीसा, एक लाख गांधीजी के चित्र घर-घर बांटे गए और भारतीय सनातन संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया।

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