कोरोना से निपटने के लिए देश में दवाओं की कमी नहीं : मंत्री - Naya India
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कोरोना से निपटने के लिए देश में दवाओं की कमी नहीं : मंत्री

नई दिल्ली। केन्द्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री वी.सदानंद गौड़ा ने कहा कि कोरोना वायरस के प्रकोप से निपटने के लिए देश में दवाओं की कोई कमी नहीं है। इंडिया फार्मा एंड मेडिकल डिवाइस 2020 सम्मेलन को संबोधित करते हुए गौड़ा ने आश्वासन दिया कि अब तक, सरकार मजबूत निगरानी तंत्र के माध्यम से देश में कोरोना के प्रसार को सीमित रखने में सफल रही है।

गौड़ा ने कहा वैश्विक स्तर पर कोरोना के प्रकोप ने फार्मा क्षेत्र के समक्ष एक बड़ी चुनौती खड़ी करने के साथ ही इस क्षेत्र के लिए अवसरों के द्वार भी खोले हैं। केन्द्रीय मंत्री ने कहा कोरोना वायरस के संक्रमण से जुड़ी किसी भी घटना से निपटने के लिए सरकार, अस्पतालों, चिकित्सा संस्थानों और फार्मा क्षेत्र की ओर से पूरी तैयारी की गई है। उन्होंने कहा फार्मा क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। बढ़ती आबादी, समृद्धि और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता इस क्षेत्र में आगे निवेश करने के लिए एक बहुत अच्छा अवसर प्रदान करती है। यदि इन अवसरों का ठीक से लाभ उठाया जाए, तो भारतीय फार्मा उद्योग का बाजार 2025 तक 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का और चिकित्सा उपकरण उद्योग 2025 तक 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हो सकता है।

उन्होंने बताया कि सरकार ने बड़ी संख्या में औषधि और चिकित्सा उपकरण पार्क विकसित करने की योजना बनाई है, जिसके तहत केंद्र सरकार इन पार्को में सामान्य सुविधा केंद्रों के निर्माण के लिए राज्य सरकारों को सहायता के रूप में एकमुश्त राशि प्रदान करती है। ऐसे पार्को के लिए गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों से कई प्रस्ताव मिले हैं जो विचाराधीन हैं। गौड़ा ने कहा कि विकासशील देशों में जहां आबादी का एक बड़ा वर्ग अभी भी गरीब है और जहां चिकित्सा खर्च आय की तुलना में बहुत अधिक हैं, दवाएं खरीदने का सामथ्र्य समाज की प्रमुख चिंताओं में से एक है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि घरेलू फार्मा उद्योग ने देश और विदेश में विनिर्माण और आपूर्ति के मामले में काफी सफलता हासिल की है, हालांकि, इस मोर्चे पर बहुत कुछ किया जाना अभी बाकी है।

केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने के लिए भारत सरकार ने प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि योजना (पीएमबीजेपी) लागू की है। इसका उद्देश्य आम जनता तथा विशेष रूप से गरीब और वंचित तबके को सस्ती दरों पर दवाएं उपलब्ध कराना है। जन औषधि की दुकानों पर बेची जाने वाली जेनेरिक दवाओं की कीमत बाजार में बेची जाने वाली दवाओं की तुलना में 50 प्रतिशत और कुछ मामले में 90 प्रतिशत तक कम है। ऐसी दवाओं के मामले में लोगों की प्रतिक्रिया काफी अच्छी रही है। उन्होंने दवा कंपनियों से अनुसंधान और विकास पर ध्यान केंद्रित करने और विकासशील देशों में जनता के सामथ्र्य को ध्यान में रखते हुए बाजार में नई दवाएं लाने का आग्रह किया।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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