बढ़ सकती है सांसद निधि

नई दिल्ली। सांसदों को अपने क्षेत्र में विकास के लिए मिलने वाली धनराशि एक बार फिर बढ़ सकती है। वित्तीय मामलों पर संसद की स्थाई समिति ने इस बाबत सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय को रिपोर्ट दे दी है। सांख्यिकी मंत्रालय फिलहाल इस प्रस्ताव पर चर्चा कर रहा है।

प्रस्ताव के मुताबिक, माननीय सांसदों को अब तक जो पांच करोड़ रुपये सालाना सांसद निधि के तौर पर मिलते थे, अब उस रकम को दो-तीन गुना तक बढ़ाया जा सकता है। यानी अब सांसद 10 से 15 करोड़ रुपये तक अपने क्षेत्र में विकास कार्यो पर खर्च कर सकेंगे।

दरअसल, क्षेत्रीय विकास निधि के मुद्दे पर सांसदों और विधायकों से प्रतियोगिता होने लगी है। लिहाजा स्थाई संसदीय समिति ने सरकार से महंगाई और विधायकों के लिए किए जा रहे आवंटन को ध्यान में रखकर सांसद निधि को तय करने की बात कही है। वित्तीय मामलों की संसद की स्थाई समिति ने केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय से कहा है कि सांसदों को मिलने वाली सांसद क्षेत्रीय विकास निधि में खर्च होने वाली रकम के बजटीय अनुमान और संशोधित अनुमान के बीच बड़ा अंतर है।

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यही नहीं रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अधिकतर राज्यों में विधायकों को विधायक निधि के तौर पर चार करोड़ रुपये सालाना खर्च करने के लिए मिलते हैं। वहीं एक लोकसभा क्षेत्र में पांच से सात विधायक आते हैं। इस तरह सांसदों को दी जाने वाली रकम काफी कम है। इस मुद्दे पर रानाघाट, पश्चिम बंगाल के सांसद जगन्नाथ सरकार का कहना है, मेरे हिसाब से इसे सांसद निधि की जगह जन कल्याण राशि के तौर पर देखा जाना चाहिए। अंतिम बार साल 2011 और 2012 में इसे बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये किया गया था।

तब से अब तक महंगाई काफी बढ़ चुकी है, साथ ही मोदी सरकार के समय सांसदों की कार्यशक्ति और इच्छाशक्ति दोनों में इजाफा हुआ है। लिहाजा उन्हें सांसद निधि के तौर पर ज्यादा धनराशि की जरूरत है। बीजद सांसद अच्युतानंद सावंत कहते हैं, इस राशि को तुरन्त बढ़ाया जाए, ताकि क्षेत्र के समुचित विकास पर ध्यान दिया जा सके। महाराष्ट्र से भाजपा सांसद सुभाष भामरे कहते हैं, इस पर और चर्चा की जरूरत है। पार्टी इस पर जो भी फैसला लेती है हमें स्वीकार है।

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वैसे सांसद निधि में बढ़ोतरी की मांग 2015 से हो रही थी। अप्रैल 2016 में भी कांग्रेस नेता थंबीदुरई ने लोकसभा में इस निधि को 25 करोड़ रुपये करने की मांग रखी थी। लेकिन इस मांग से उलट बहुत सारे सांसद ऐसे भी हैं, जो सांसद निधि को ही खत्म कर देने की वकालत करते हैं। इसमें राकांपा की सुप्रिया सुले और भाजपा के निशिकांत दुबे पहली कतार में हैं।

वैसे सांसद निधि की शुरुआत 1993 में की गई थी। तब सांसदों को पांच लाख रुपये खर्च करने के लिए दिया जाता था। वर्ष 2011-12 में इसे बढ़ाकर सालाना पांच करोड़ रुपये कर दिया गया। सांसद निधि को खर्च करने के मामले में नागालैंड देश का पहला राज्य है, जहां इसका शत प्रतिशत उपयोग हुआ है। जबकि उत्तराखंड में इस फंड का सबसे कम इस्तेमाल हुआ है। 31 मार्च, 2019 तक देश के 25 फीसदी सांसद ऐसे थे, जो सांसद निधि का समुचित उपयोग नहीं कर पाए थे।

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