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भविष्य की सियासत के संकेत देंगे उप्र उपचुनाव के नतीजे

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में इन दिनों हुई सियासी उठापटक के बीच आ रहे उपचुनाव के नतीजे भविष्य की सियासत के संकेत देंगे। वर्तमान परिस्थितियों तथा समीकरणों ने उपचुनाव के नतीजों को अहम बना दिया है।

राज्यसभा चुनाव में सपा और बसपा के बीच जो कुछ हुआ, वह भी सियासी रूख तय करेगा। सत्ता पक्ष को लगता है कि राममंदिर के रूप में उसके पास मजबूत विकल्प पहले से मौजूद हैं।

इन नतीजों से जहां कोरोना संकट के दौरान सरकार व भाजपा संगठन की तरफ से किए गए कामों के दावों का सच सामने आएगा, वहीं विपक्ष की तरफ से सरकार के खिलाफ उठाए गए मुद्दों का असर भी दिखेगा। उपचुनाव के पहले प्रदेश में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम हुए। मसलन, राज्यसभा चुनाव में नौ सदस्य निर्वाचित कराने की ताकत होते हुए भी भाजपा का सिर्फ आठ उम्मीदवार उतारना। बसपा का आश्चर्यजनक तरीके से एक उम्मीदवार का पर्चा भरवाना तथा सपा का बसपा विधायकों में तोड़फोड़ कराना।

सात सीटों के परिणाम से ये संकेत भी सामने आएंगे कि प्रदेश के भविष्य की सियासत और सियासी पार्टियों के रिश्तों तथा उनके संभावित समीकरणों की दिशा व दशा क्या होगी। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा, बसपा और कांग्रेस सियासी बिसात पर भाजपा के खिलाफ अपने मोहरे अलग-अलग ही चलने वाले हैं या कोई किसी से मिलकर खेल खेलेगा।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रसून पांडेय बताते हैं कि वैसे उपचुनाव को सत्ता पक्ष का माना जाता है। लेकिन जब 2022 में मुख्य चुनाव होने हैं, ऐसे में इस उपचुनाव को सेमीफाइनल माना जा रहा है। यदि सत्तारूढ़ दल को सफलता मिलेगी तो उसे अपने कामकाज पर भरोसा होगा। वहीं अगर विपक्ष को सफलता मिलेगी तो कार्यकतार्ओं का मनोबल बढ़ेगा। आगे आने वाले समय में यह चुनाव नतीजे सियासी सफर की तस्वीर को साफ करेंगे।

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