ठाकरे सरकार के बहुमत परीक्षण की प्रक्रिया सवालों के घेरे में

नई दिल्ली। महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत परीक्षण के दौरान महा विकास आघाड़ी के पक्ष में 169 विधायकों ने मतदान किया, इसलिए उद्धव ठाकरे सरकार के राजनीतिक बहुमत में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं बची, मगर शनिवार को विशेष सत्र में बहुमत परीक्षण की प्रक्रिया जिस ढंग से हुई, उससे कई संवैधानिक सवाल जरूर उठ खड़े हुए हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने मंत्रियों के शपथ ग्रहण और विधानसभा के विशेष सत्र को ‘असंवैधानिक’ बताते हुए राज्यपाल को कारवाई के लिए ज्ञापन भी दिया है। फडणवीस के अनुसार, मंत्रियों का शपथ ग्रहण नियमों के अनुरूप नहीं हुआ।

किसी ने शिवसेना संस्थापक तो किसी ने कांग्रेस प्रमुख का नाम लिया। इसके जवाब में सत्तारूढ़ गठबंधन की तरफ से कहा गया कि इस पैमाने पर संसद और अन्य विधानसभाओं में भाजपा के कई सदस्य और मंत्री अयोग्य घोषित हो जाएंगे। आखिर ऐसे सवालों पर संवैधानिक नियम-कायदे क्या कहते हैं, संविधान विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता ने बिंदुवार जवाब दिया।

विराग के अनुसार, विधायकों और मंत्रियों द्वारा संविधान की अनुसूची तीन और विधायी नियमों के तहत शपथ ली जाती है। उस फॉर्मेट से अलग कोई विधायक या मंत्री यदि अन्य विवरण भी देता है तो वह गलत है। मगर इसके पहले की घटनाओं में कोई कारवाई नहीं हुई तो अब महाराष्ट्र मामले में शपथ ग्रहण को असंवैधानिक कहना मुश्किल है।

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फडणवीस के दूसरे आरोप के अनुसार, विधानसभा के नए सत्र की शुरुआत वंदे मातरम से नहीं करना भी असंवैधानिक है। विराग गुप्ता कहते हैं कि विधानसभा के नए सत्र की शुरुआत वंदे मातरम से नहीं किया जाना परंपरा का उल्लंघन हो सकता है, लेकिन यह संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं है।

फडणवीस ने तीसरा आरोप लगाया है कि विधानसभा के नए सत्र के लिए राज्यपाल के जरिए अधिसूचना जारी नहीं हुई है, जिससे सदन का सत्र असंवैधानिक है। इस आरोप पर विराग गुप्ता ने कहा कि यदि शनिवार का सत्र पुराने सत्र की निरंतरता में ही था तो राज्यपाल द्वारा एक दिसंबर के विशेष सत्र के लिए नई अधिसूचना क्यों जारी की गई? लेकिन इस बारे में विधानसभा की कार्यवाही के रिकॉर्ड और राज्यपाल की अधिसूचना के अनुसार ही सत्र की संवैधानिकता के बारे में निर्णय लिया जा सकता है।

पूर्व मुख्यमंत्री फडणवीस के चौथे आरोप के अनुसार, गठबंधन सरकार ने भाजपा के कालिदास कोलाम्बकर को हटाकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के दिलीप पाटिल को प्रोटेम स्पीकर बनाया, जो गलत है। इस बाबत अधिवक्ता विराग कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने 26 नवंबर के आदेश से विधानसभा के गठन, प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति और 27 नवंबर को विधायकों के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद बहुमत परीक्षण का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्यपाल ने कालिदास कोलाम्बकर को प्रोटेम स्पीकर पद पर नियुक्त किया, जिन्होंने अगले दिन विधानसभा सदस्यों का शपथ ग्रहण कराया, लेकिन फडणवीस के इस्तीफे की वजह से उस दिन बहुमत परीक्षण नहीं हुआ।

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विराग गुप्ता बताते हैं कि मुंबई हाईकोर्ट के एक फैसले में संविधान के अनुच्छेद 208 और विधानसभा नियमों के अनुसार, प्रोटेम स्पीकर को को विधानसभा अध्यक्ष के सभी अधिकार होते हैं। लेकिन परंपरा के अनुसार विधायकों के शपथ ग्रहण के बाद सदन द्वारा नए विधानसभा अध्यक्ष का चयन कर लिया जाता है।

अधिवक्ता के अनुसार, महाराष्ट्र के वर्तमान विवाद में दो बड़े पहलू हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा जब दिलीप पाटिल को प्रोटेम स्पीकर बनाया गया, तब उन्हें राज्यपाल से शपथ क्यों नहीं दिलवाई गई? दिलीप पाटिल यदि प्रोटेम स्पीकर थे तो उन्हें राज्यपाल से शपथ लिए बगैर कार्यवाही संचालित करने का कोई अधिकार नहीं था।

उन्होंने कहा, “सरकार का यदि यह मानना है कि विधानसभा के गठन के बाद प्रोटेम स्पीकर बने दिलीप पाटिल को गवर्नर द्वारा शपथ ग्रहण की कोई जरूरत नहीं है, तो फिर उस हालात में दिलीप पाटिल को पूर्णकालिक स्पीकर ही माना जाएगा। विधानसभा की शपथ लेने के बाद पूर्णकालिक स्पीकर को राज्यपाल से शपथ लेने की कोई जरूरत नहीं है।”

नियमों के अनुसार, पूर्णकालिक विधानसभा अध्यक्ष को 10 फीसदी सदस्यों के नोटिस के बाद ही निकाला जा सकता है। दिलीप पाटिल यदि पूर्णकालिक अध्यक्ष थे तो उन्हें निकाले बगैर नया स्पीकर नाना पाटले को चुना जाना गलत माना जाएगा। कांग्रेस के नाना पटोले निर्विरोध विधानसभा अध्यक्ष चुने गए हैं। अधिवक्ता ने कहा कि इन परिस्थितियों में विधानसभा के विशेष सत्र की कार्यवाही, बहुमत परीक्षण और प्रोटेम स्पीकर की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

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