symptoms treatment for addiction लत कोई हो, समय पर इलाज जरूरी अन्यथा.....
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लत कोई हो, समय पर इलाज जरूरी अन्यथा…..

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symptoms treatment for addiction लत का दिमाग पर ऐसा असर होता है कि आत्म-नियन्त्रण (सेल्फ कंट्रोल) खत्म होने के साथ इमोशन मरने लगते हैं जिससे वह किसी की परवाह नहीं करता। ऐसी स्थिति में दिमाग, इमोशन्स का इस्तेमाल लत पूरी करने के लिये करता है और मानता ही नहीं कि वह किसी को तकलीफ दे रहा है। वह शरीर का  तरसाव पूरा करने के लिये वह झूठ, चीखने-चिल्लाने, तोड़-फोड़ मचाने, चोरी करने या इमोशन्स का सहारा लेता है, यदि इनसे इच्छा पूर्ति न हो तो वह हमलावर हो जाता है।

लत यानी एडिक्शन ऐसा मनोरोग है जो स्वास्थ्य, धन, समय, मानसिक शांति और सामाजिक प्रतिष्ठा तक बर्बाद कर देता है। ड्रग्स, शराब, तम्बाकू, जुआ, सेक्स, चोरी या खरीददारी (शॉपिंग) जैसी लतें मुश्किल से छूटती हैं, इन्हें छुड़ाने के लिये दवाओं के साथ बिहैवियरल थेरेपी की जरूरत पड़ती है और महीनों लग जाते हैं। वर्तमान में लोग इंटरनेट से नयी-नयी लतों के शिकार हो रहे हैं जैसे मोबाइल फोन एडिक्शन, ऑन लाइन शापिंग, पोर्न सर्फिंग और ऑनलाइन गेमिंग। लत कैसी भी हो नुकसान ही करती है, यहां तक कि जिन लोगों तो काम करने की लत (वर्कोहॉलिक) होती है वे नींद पूरी न होने से मनोरोगी हो जाते हैं।

मेडिकल साइंस के मुताबिक लत, क्रोनिक ब्रेन डिस्फंक्शन है जिसमें इनाम (रिवार्ड), प्रेरणा (मोटीवेशन) और मेमोरी शामिल होती है। लत लगने पर हमारा शरीर किसी खास पदार्थ (जैसे ड्रग्स, शराब, तम्बाकू) या व्यवहार (जुआ, सेक्स, शापिंग, चोरी, गेमिंग इत्यादि) के लिये तरसता है, तरसाव की प्रक्रिया कम्पल्सिव (बाघ्यकारी) रूप लेकर धीरे-धीरे ज्यादा कम्पल्सिव हो जाती है, रिवार्ड मिलने पर ही कम्पल्सिव व्यवहार शांत होता है लेकिन दिमाग में यह दर्ज हो जाता है कि कम्पल्सिव होने से ही रिवार्ड मिलेगा, इससे व्यक्ति बार-बार वही करता है और एडिक्टिव हो जाता है। लत का दिमाग पर ऐसा असर होता है कि आत्म-नियन्त्रण (सेल्फ कंट्रोल) खत्म होने के साथ इमोशन मरने लगते हैं जिससे वह किसी की परवाह नहीं करता। ऐसी स्थिति में दिमाग, इमोशन्स का इस्तेमाल लत पूरी करने के लिये करता है और मानता ही नहीं कि वह किसी को तकलीफ दे रहा है। वह शरीर का  तरसाव पूरा करने के लिये वह झूठ, चीखने-चिल्लाने, तोड़-फोड़ मचाने, चोरी करने या इमोशन्स का सहारा लेता है, यदि इनसे इच्छा पूर्ति न हो तो वह हमलावर हो जाता है।

मेडिकल साइंस में ड्रग्स और शराब की लत को शरीर तथा दिमाग दोनों के लिये घातक माना गया है। ड्रग्स (मादक द्रव्यों) में निकोटीन (तम्बाकू), टीएचसी (गांजा-मेरीजुआना), अफीम (ओपियॉइड-नारकोटिक्स) और कोकीन सबसे ज्यादा एडिक्टिव हैं। इनके बाद नंबर आता है कैफीन (कॉफी), जुआ, सेक्स, क्रोध, भोजन (फूड), शॉपिंग, इंटरनेट और काम (वर्क)  का। आपने देखा होगा कि आजकल लोगों को मोबाइल फोन की लत है कि यदि उनका फोन ले लिया जाये तो वे अशांत हो जाते हैं। हालांकि वर्ल्ड साइकेट्रिक एसोसियेशन ने अभी तक काम (वर्क), इंटरनेट और सेक्स को एडिक्टिव मनोविकार नहीं माना है लेकिन लोगों की दिनचर्या और सोशल व्यवहार पर इनका असर दिखने लगा है। आमतौर पर व्यक्ति को तब एडिक्टिव मानते हैं जब रिवार्ड न मिलने की स्थिति में वह निगेटिव रियेक्शन दे। उदाहरण के लिये किसी को कॉफी की लत है, यदि उसे कॉफी न मिले तो वह सिरदर्द और चिड़चिड़ाहट जैसे मानसिक और शारीरिक विड्रॉल सिम्पटम महसूस करेगा।

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एडिक्शन स्टेजेज

  1. कभी-कभार: इस चरण में लोग शौक और एक्सपेरीमेंट के तौर पर ड्रग्स, शराब, जुआ, ऑनलाइन शॉपिंग, गेमिंग, सेक्स इत्यादि अपनाते हैं, ऐसा अक्सर युवाओं में देखा गया है।
  2. फ्रिकवेंसी बढ़ना: इस स्टेज में लोग कभी-कभार के बजाय सप्ताह में दो या तीन बार शौक पूरा करने लगते हैं। ऐसा वे दोस्तों का साथ पाने, तनाव, बोरियत, उदासी और अकेलापन दूर करने के लिये करते हैं।
  3. प्रॉब्लम्स: रोजाना शौक पूरे करने से प्रॉब्लम स्टेज आती है जिसमें एंग्जॉयटी, अनिद्रा (इन्सोमनिया) तथा उदासी व तबियत में ढीलापन आता है, इससे निजात पाने के लिये फ्रिकवेंसी बढ़ती है जिससे व्यवहार में अनिश्चितता आने के साथ सामाजिक गतिविधियां घटने से दोस्त कम हो जाते हैं। रिलेशनशिप में समस्यायें पैदा होती हैं तथा व्यक्ति अजनबियों से मिलने और बात करने से झिझकता है, इस स्टेज में लोग जिद्दी होने लगते हैं।
  4. डिपेन्डेंस: इस स्टेज में व्यक्ति की शौक पर निर्भरता बढ़ने से उसका शौक नियमित दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है, जिससे मतली, शरीर कांपना, पसीना आना, चिड़चिड़ापन, तेज धड़कन और नींद न आने जैसे लक्षण उभरते हैं। इसमें व्यक्ति को शौक के बुरे प्रभावों का पता रहता है लेकिन वह चाहकर भी खुद को कंट्रोल नहीं कर पाता।
  5. एडिक्शन (लत): इस स्टेज में व्यक्ति मजे के लिये शौक नहीं करता बल्कि शौक उसकी जरूरत बन जाता है। ऐसे में क्रेविंग (हुड़क) होती है और व्याकुलता से व्यवहार कम्पलसिव हो जाता है, वह शौक पूरा करने के लिये आसपास के लोगों से झूठ बोलने उन्हें भावनात्मक रूप से ब्लेकमेल करके या चोरी से धन का प्रबंध करता है। यदि यह स्टेज ज्यादा समय रहे तो वह लीवर-किडनी-हार्ट फेलियर, ब्रेन डैमेज या कुपोषण जैसी खतरनाक बीमारियों का शिकार हो सकता हैं, कुछ में तो सुसाइडल टेन्डेन्सी आ जाती है।

क्या लक्षण हैं एडिक्शन के?

एडिक्शन का पहला लक्षण आत्म नियन्त्रण समाप्त होना है, इसकी वजह से व्यक्ति चुपचाप उन स्थितियों की तलाश में रहता है जहां लत पूरी हो सके। स्वास्थ्य सम्बन्धी लक्षणों में सबसे पहले नींद खराब (इनसोमलिया) होने के साथ याददाश्त कमजोर (मेमोरी लॉस) होने लगती है। एडिक्शन पीड़ित अपनी लत छिपा नहीं पाता और कोई न कोई बहाना बनाकर लत पूरी करने का प्रयास करता है।

एडिक्शन से व्यवहार और भावनाओं में परिवर्तन आता है, वह मादक द्रव्यों या बुरी आदतों का अवास्तविक मूल्यांकन करते हुए उनके नकारात्मक पहलू इग्नोर करके अपनी समस्याओं के लिये दूसरों को जिम्मेदार मानता है। एंग्जॉयटी, डिप्रेशन, उदासी और संवेदनशीलता में वृद्धि से चिड़चिड़ाहट, भावनाओं को पहचानने में परेशानी से वह भावनाओं तथा शारीरिक संवेदनाओं के मध्य अंतर नहीं कर पाता। वह ड्रग्स, तम्बाकू या शराब की लत प्रयास के बाबजूद भी छोड़ नहीं पाता, सेहत से जुड़ी समस्याओं के बाद भी सेवन जारी रहता है व तनाव कम करने के लिये पुन: सेवन करता है। उन जगहों पर जाने से बचता है जहां मादक द्रव्यों के सेवन की मनाही हो। सेवन न करने पर हाथों में झनझनाहट, पसीना, चिड़चिड़ापन व घड़कन तेज होने जैसे लक्षण उभरते हैं।

क्यों लगती है लत?

मादक द्रव्यों और एडिक्टिव व्यवहार (सेक्स, शॉपिंग, चोरी, पोर्न सर्फिंग) से ज्यादा सुख या आन्नद मिलता है जिसे आम बोलचाल की भाषा में हाई होना कहते हैं, आन्नद के इसी स्तर या इससे ज्यादा को फिर से प्राप्त करने के लिये और ज्यादा की जरूरत होती है, लम्बे समय तक ऐसी क्रियायें  दोहराने से व्यक्ति एडिक्टिव हो जाता है।

मादक द्रव्यों में मौजूद रसायन फेफड़ों या आंतों से होते हुए ब्लडस्ट्रीम में मिलते हैं जिससे एड्रेनिल ग्रन्थि, न्यूरोट्रांसमीटर हारमोन एड्रेनालाइन (एपिनेफ्रीन) को अधिक मात्रा में रिलीज करती है परिणाम स्वरूप व्यक्ति में जोश व उत्तेजना (थ्रिल) आने से शरीर में डोपामाइन हारमोन का स्तर बढ़ता है जिससे खुशी मिलती है, क्योंकि डोपामाइन दिमाग के खुश रहने से जुड़े क्षेत्रों को उत्तेजित करता है। इनके सेवन से व्यक्ति को वही खुशी होती है जो किसी उपलब्धि, धन या इनाम मिलने पर होती है, इसलिये ऐसी खुशी की चाह में बार-बार सेवन करने से यह शारीरिक और मनोवैज्ञानिक जरूरत बनकर लत में बदल जाती है।

नुकसान क्या-क्या?

ड्रग्स लेने से शरीर में बड़ी संख्या में कैमिकल रिलीज होते हैं जो फेफड़ों, हृदय और शरीर के अन्य अंगों को डैमेज करते हैं। इनसे टीबी, इम्फसीमा, मुंह, गले और फेफड़ों का कैंसर, ल्यूकेमिया, हार्ट डिसीज, ब्रेन स्ट्रोक, डायबिटीज, क्रोनिक ब्रोन्काइटिस, आंखो के रोग, इरेक्टाइल डिस्फंक्शन (नपुन्सकता), इनफर्टिलिटी (बांझपन), पेप्टिक अल्सर, गर्भपात, कोल्ड-फ्लू, श्वसन-तन्त्र में संक्रमण, टेस्ट/ स्मेल में कमी, समय से पहले बुढ़ापा व ऑस्टियोपोराइसिस जैसी बीमारियों का रिस्क बढ़ता है। वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन के अनुसार दुनियाभर में प्रतिवर्ष करीब 6 करोड़ लोगों की मृत्यु मादक द्रव्यों के सेवन से होती है।

विड्रॉल सिम्पटम

मादक द्रव्यों और मदिरा सेवन से मूड बूस्ट होता है जिससे डिप्रेशन घटने के साथ खुशी महसूस होती है और चिड़चिड़ेपन में कमी आती है। शार्ट-टर्म मेमोरी और ध्यान-केन्द्रित करने की क्षमता बढ़ने के साथ दिमाग में भलाई की भावना जागती है व भूख कम लगने जैसे बदलाव आते हैं। ऐसी मनोदशा में यदि अचानक इनका सेवन बंद कर दिया जाये तो विड्रॉल सिम्पटम उभरते हैं जैसेकि क्रेविंग (हुड़क) के साथ हाथ-पैरों में झनझनाहट, शरीर में सूजन. पसीना और मतली, कब्ज, गैस, सिरदर्द, गले में खराश, खांसी तथा तेज धड़कन महसूस होती है। चिंता, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, उदासी और बेचैनी के अलावा अनिद्रा व ध्यान केन्द्रित करने में परेशानी तथा वजन बढ़ने लगता है।

एडिक्शन का इलाज क्या?

एडिक्शन के इलाज में मेडीकेशन, काउंसलिंग और लाइफस्टाइल परिवर्तन जैसे तरीकों का प्रयोग किया जाता है। सबसे पहले शरीर से मादक द्रव्यों का असर समाप्त करने के लिये डिटॉक्स और मरीज के व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिये काउंसलिंग की जाती है। गम्भीर कंडीशन में एडिक्टेड व्यक्ति को कुछ समय के लिये रिहैबलिटेशन सेन्टर में भरती करना पड़ता है। आमतौर पर इसकी अवधि एक या दो महीने होती है लेकिन ज्यादा गम्भीर स्थिति में ये छह महीने या एक साल भी हो सकती है। इस अवधि में डाक्टर, काउंसलिंग करके मरीज की उन भावनात्मक समस्याओं का समाधान करते हैं जो उसे शौक पूरा करने के लिये उकसाती हैं। काउंसलिंग के साथ दवाओं का प्रयोग किया जाता है। अमेरीका के म्यो क्लीनिक के डा. उलास एम. कैमसारी के मुताबिक मरीज के डिटॉक्सीफिकेशन के बाद दवाओं से क्रेविंग (हुड़क) कम करते हैं। एकमप्रोसेट नामक दवा मस्तिष्क को डिपेन्डेंसी से पहली वाली रासायनिक स्थिति में लाती है। डिसुल्फिरम (एंटाब्यूज़) नामक दवा से शारीरिक कष्टों जैसेकि मतली, उल्टी और सिरदर्द का इलाज होता है। विड्रॉल सिम्पटम उभरने पर मरीज को शांत रखने के लिये लोरज़ेपम (अतीवन), क्लोनज़ेपम (क्लोनोपिन), अल्प्राजोलम (ज़ानाक्स), डायजेपाम (वेलियम) जैसे सेडेटिव्स दिये जाते हैं। डिहाइड्रेशन और एडिक्शन से शरीर में कम हुए विटामिन्स और मिनरल्स जैसे पोषक तत्वों को पूरा करने के लिये इन्ट्रावेनस विधि से फ्लूड चढ़ाते हैं। सही मेडीकेशन और काउंसलिंग से एडिक्शन पूरी तरह ठीक हो जाता हैं हालांकि अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और थकान जैसी समस्यायें कुछ समय तक रहती हैं।

नजरिया

यदि एडिक्शन का इलाज शुरू में किया जाये तो जल्द छुटकारा मिल जाता है। लंबे समय से एडिक्ट व्यक्ति के इलाज में समय लगता है। इलाज के दौरान परिवार वालों और दोस्तों का सपोर्ट बहुत मायने रखता है, अपनों से मिले भावनात्मक समर्थन, उत्साह और प्यार से व्यक्ति जल्दी रिकवर होता है। इसमें मेडीकेशन के साथ ऐसे सपोर्ट सिस्टम की जरूरत होती है जो लत छुड़ाने में मददगार हो। एडिक्शन के शिकार व्यक्ति को किसी भी सूरत में अकेला न छोड़ें। यदि व्यक्ति का इलाज घर पर चल रहा है तो उसके साथ हमेशा किसी मित्र या रिश्तेदार का होना जरूरी है। यदि व्यक्ति एडिक्शन की अंतिम स्टेज में है और उसे कोई क्रोनिक डिसीस  नहीं है तो बिना देर किये दो या तीन महीने के लिये किसी अच्छे रिहैब सेन्टर में छोड़े। लत से मुक्ति दिलाने का यह एक मात्र उपाय है अन्यथा वह कभी भी किसी गम्भीर बीमारी का शिकार या आत्महत्या का प्रयास कर सकता है। ड्रग्स और शराब की लत से लीवर सिरोहसिस, जीआई ट्रैक में ब्लीडिंग, ब्रेन सेल्स डैमेज, जीआई ट्रैक कैंसर, पेनक्रियटाइटिस, नर्व डैमेज और वेर्निक कोर्साकोफ सिन्ड्रोम जैसी बीमारियां हो जाती हैं। इन बीमारियों के सफल इलाज के लिये इन्हें छोड़ना पहली शर्त है। इसलिये किसी अच्छे मनोचिकित्सक की देखरेख में जल्द से जल्द एडिक्शन का इलाज शुरू करें।

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