बर्ड फ्लू: घबरायें नहीं सावधानी बरतें..

बर्ड फ्लू यानी एवियन इन्फ्लूएंजा एक वायरल संक्रमण हैं जो पक्षियों के साथ मनुष्यों और अन्य जानवरों को संक्रमित करता है लेकिन इस वायरस की अधिकतर किस्में पक्षियों तक सीमित रहती हैं। इस वायरस की दो कॉमन किस्में (स्ट्रेन) एच5एन1 और एच7एन9 पक्षियों से होते हुए मनुष्यों को  संक्रमित कर देती हैं। जब मनुष्य बर्ड फ्लू से संक्रमित पक्षियों के सम्पर्क में आता है तो वह संक्रमित हो जाता है। ये दोनों स्ट्रेन मनुष्यों के गले, नाक और फेफड़ों पर अटैक करते हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के अनुसार मनुष्यों में इस वायरस का पता पहली बार हांगकांग में सन 1997 में चला था तब इससे संक्रमित व्यक्तियों में 60 प्रतिशत की मृत्यु हो गयी थी। जनवरी 2003 से दिसम्बर 2020 तक दुनियाभर में 862 व्यक्ति इससे संक्रमित हुए थे और 455 की मृत्यु हुई। मनुष्यों में इसके संक्रमण का अंतिम केस साउथ ईस्ट एशिया के देश लाओस में 13 अक्टूबर 2020 को रिपोर्ट हुआ।

कुछ केसों में पाया गया कि ये वायरस मनुष्यों से मनुष्यों में फैला लेकिन यह कैसे हुआ एक रहस्य है और इस पर शोध चल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है यह वायरस भविष्य में अगली महामारी की वजह बन सकता है। अभी तक हमारे देश में इस वायरस से किसी मनुष्य के संक्रमित होने का कोई मामला सामने नहीं आया है। यह वायरस 42 डिग्री सेल्सियस पर 18 घंटे, 37 डिग्री पर 24 घंटे, 24 डिग्री पर 5 दिन और 4 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर 8 सप्ताह जीवित रहता है।

बर्ड फ्लू के लक्षण कैसे-क्या?  

मनुष्यों में इसके लक्षण संक्रमित होने के 1 से 4 दिन में नजर आते हैं। बर्ड फ्लू (एच5एन1/एच7एन9) से संक्रमित व्यक्तियों में सामान्य फ्लू की तरह से ये लक्षण उभरते हैं- खांसी, डायरिया, रेसपिरेटरी दिक्कतें (सांस सम्बन्धी समस्यायें), 100.4 डिग्री फॉरेनहाइट तक बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, नाक बहना, गले में खराश, थकान, नाक बंद होना और असहज होना इत्यादि।

क्यों होता है बर्ड फ्लू?

वैसे तो बर्ड फ्लू वायरस की कई किस्में है लेकिन एच5एन1 प्रथम एवियन इन्फ्लूएंजा वायरस था जिसने मनुष्यों को संक्रमित किया और यह मामला सन् 1997 में हांगकांग में पोल्ट्री फार्म को गलत तरीके से हैंडिल करने से हुआ था। एच5एन1 और एच7एन9 वायरस प्राकृतिक रूप से जंगली जल स्रोतों जैसेकि झरने इत्यादि में होता है और मुर्गी या बत्तख पालन (पोल्ट्री) में आसानी से फैल जाता है। मनुष्यों को यह बीमारी संक्रमित पक्षी के मल या नाक, मुंह और आंख से हुए स्राव के सम्पर्क में आने से होती है।

यह अच्छी तरह से पकाये गये संक्रमित पक्षियों के अंडों और मांस से नहीं फैलता। 165 डिग्री फारेनहाइट (73.8 डिग्री सेल्सियस) या इससे अधिक तापमान पर पके मांस को सुरक्षित माना जाता है।

किन्हें ज्यादा रिस्क है?

सर्दियों में यह वायरस कई सप्ताह जिंदा रहता है और इससे संक्रमित पक्षी, संक्रमित होने के दस दिन बाद तक दूसरों में इस वायरस को फैला सकते  हैं। जिस सतह पर संक्रमित पक्षियों का मल या स्राव गिरा हो उस सतह को छूने से भी यह फैलता है। जिन लोगों को इस संक्रमण का सबसे ज्यादा रिस्क होता है उनमें पोल्ट्री वर्कर, पोल्ट्री फार्म या चिकन शॉप में जाने वाले लोग, संक्रमित पक्षी को छूने से, उस व्यक्ति से जिसने संक्रमित पक्षी का बिना पका मांस या कच्चे अंडे खाये हों, इससे बीमार व्यक्तियों की देखभाल करने वाले हेल्थकेयर वर्कर और पीड़ित के घर के सदस्य। इसके साथ इन लोगों को भी इसका रिस्क ज्यादा होता है-

– 5 साल से कम उम्र के बच्चे और 65 साल से ज्यादा उम्र के वयस्क।

– हार्ट, किडनी और डायबिटिक जैसी बीमारियों से ग्रस्त लोग।

– गर्भवती और हाल में मां बनी महिलायें।

– एसप्रिन या सेलीसाइलेट जैसी दवायें लेने वाले लोग।

पुष्टि कैसे होती है?

इसकी पुष्टि के लिये सीडीसी अर्थात सेन्टर फॉर डिसीस कंट्रोल एंड प्रवेन्शन ने एक टेस्ट निर्धारित  किया है जिसे एशियन लाइनेज या एन1/एच5 वायरस रियल टाइम आरटी-पीसीआर प्राइमर एंड प्रोब सेट कहते हैं। इसका प्राइमरी परिणाम 4 घंटे में मिल जाता है, लेकिन इस टेस्ट की सुविधा पूरी दुनिया में नहीं है। इस टेस्ट के अलावा डाक्टर अस्कल्टेशन, व्हाइट ब्लड सेल डिफरेन्शियल, नेसोफारेनजील कल्चर और चेस्ट एक्स-रे भी करते हैं। यदि पीड़ित ज्यादा बीमार हो उसका हार्ट, किडनी और लीवर फंक्शन टेस्ट भी किया जाता है।

कैसी जटिलताएं संभव?

इसके कॉम्प्लीकेशन संक्रमण की गम्भीरता और वायरस की वजह से हुए इन्फ्लूएंजा के अनुसार होते हैं। एच5एन1 से संक्रमित होने वाले व्यक्तियों की मृत्यु दर सबसे ज्यादा है बाकियों की नहीं। संक्रमित व्यक्ति के इलाज में देरी से कान में संक्रमण, ब्रोन्काइटिस, सेप्सिस, निमोनियां, मल्टीपल आर्गन फेलियर और एक्यूट रेसपिरेटरी डिसीस जैसे कॉम्प्लीकेशन हो सकते हैं।

इलाज क्या इसका?

बर्ड फ्लू वायरस की अनेक किस्में होने से इसके लक्षण भी अलग-अलग होते हैं और इन्हीं लक्षणों के आधार पर इलाज किया जाता है। अधिकतर केसों में एंटीवायरल दवायें देते हैं जिसमें टेमीफ्लू या जेनमवायर मुख्य है। इन दवाओं से बीमारी की गम्भीरता कम होती है, लेकिन इसके लिये जरूरी है कि ये दवायें, पहला लक्षण दिखाई देने के 48 घंटों के अंदर दी जायें।

बर्ड फ्लू वायरस के जिन दो स्ट्रेन्स में मनुष्यों को संक्रमित करने की क्षमता है उन्होंने दो सबसे कॉमन एंटीवायरल दवाओं के प्रति रजिस्टेंट पॉवर हासिल कर ली है, ये दवायें हैं एमान्टाडाइन और रिमान्टाडाइन (फ्लूमाडाइन)। यही कारण है कि अब इन दवाओं को बर्ड फ्लू के इलाज में प्रयोग नहीं किया जाता। यदि आपके परिवार में कोई व्यक्ति इससे संक्रमित हुआ है तो परिवार के उन सदस्यों को भी एंटीवायरल दवा का कोर्स कर लेना चाहिये जो संक्रमित नहीं हैं। संक्रमित व्यक्ति को आइसोलेशन में रखें और उसके पास बिना मास्क के न जायें और न ही उसकी छुई किसी वस्तु को छुएं। सांस लेने में ज्यादा दिक्कत होने पर मरीज को ऑक्सीजन सपोर्ट पर भी रखा जाता है।

रोकथाम कैसे हो?

यह बहुत संक्रामक वायरस है और संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने व बात करने से उत्पन्न ड्रॉपलेट्स से फैलता है। इसके अलावा पीड़ित से हाथ मिलाने और गले मिलने से भी फैल जाता है। इसकी रोकथाम के लिये फ्लू शाट एक अच्छा तरीका है, ऐसा करने से इन्फ्लूएंजा का ह्यूमन स्ट्रेन आपको बीमार नहीं करेगा। यदि किसी को एवियन फ्लू और ह्यूमन फ्लू एक साथ हो जाये तो इससे फ्लू की बहुत घातक फार्म पैदा हो जाती है। इसलिये बर्ड फ्लू से संक्रमित जगहों पर जाने से बचें और जाना भी है तो बिना मास्क के न जायें। संक्रमित व्यक्ति के बर्तन और वस्तुएं तब तक शेयर न करें जब तक उसे ठीक हुए एक सप्ताह या इससे ज्यादा न हो जाये। यदि बर्ड फ्लू की आहट सुनाई दे रही है तो खुले बाजारों और उन दुकानों पर जाने से बचें जहां चिकन बिकता है। संक्रमित पक्षियों के सम्पर्क में न आयें और कोई भी पोल्ट्री उत्पाद अच्छी तरह पकाये बिना न खायें। अंडे को तब तक उबालें जब तक उसके अंदर का योक अर्थात पीला भाग ठोस न हो जाये। साफ सफाई की आदत अपनायें और साबुन से हाथ धोयें।

निष्कर्ष

हालांकि हमारे देश में किसी मनुष्य के इससे संक्रमित होने का कोई मामला सामने नहीं आया है लेकिन यह बहुत घातक बीमारी है विशेष रूप से सामान्य जुकाम के साथ यह और ज्यादा खतरनाक हो जाती है। इसलिये पहला लक्षण नजर आते ही इलाज शुरू करें, इलाज में देरी न करें और इसकी पुष्टि होते ही अपने आप को आइसोलेट कर लें। एंटीवायरल दवाओं का पूरा कोर्स करें। घर से बाहर तभी निकलें जब आपको ठीक हुए एक सप्ताह हो गया हो। सुनने में आया है कि इसकी वैक्सीन बन चुकी है लेकिन अभी आम पब्लिक के लिये उपलब्ध नहीं है ऐसे में एतियात बरतना ही इससे बचाव का सबसे आसान तरीका है।

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